बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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इस्लामी-बौद्ध संवाद

अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन
नवम्बर 1995, संशोधित नवम्बर 2006

व्यक्तिगत सहभागिता

इस्लामी-बौद्ध संवाद की प्रक्रिया में मेरी अपनी सहभागिता वर्ष दर वर्ष धीरे-धीरे बढ़ती गई। बौद्ध धर्म पर अपनी व्याख्यान यात्राओं के दौरान मैंने कई मुस्लिम देशों की यात्रा की है। इनमें से कुछ यात्राओं के दौरान मुस्लिम श्रोताओं के साथ मेरा सीधा सम्पर्क नहीं हुआ। उदाहरण के लिए मलेशिया और इंडोनेशिया में मैंने चीनी बौद्ध लोगों के समूहों को सम्बोधित किया, हालाँकि कभी-कभी मैंने इन चीनी बौद्धों के साथ उनके देशों में मुस्लिम बहुसंख्यक समुदायों साथ उनके सम्बंधों के बारे में चर्चा की थी। मैंने मध्य एशिया में कज़ाकिस्तान, किरगिस्तान, और उज़्बेकिस्तान जैसे इस्लामी गणतंत्रों में विश्वविद्यालयों के छात्रों, शिक्षकों और आध्यात्मिक साधकों के ऐसे समूहों से भी चर्चाएं की हैं जिन्हें अपने देश की इस्लामी विरासत के बारे में बहुत कम जानकारी थी। उनकी रुचि यह जानने में थी कि सोवियत संघ के विघटन के बाद उत्पन्न हुई समस्याओं से निपटने में बौद्ध धर्म और विश्व के दूसरे धर्म तथा दर्शन किस प्रकार सहायता कर सकते हैं। वर्ष 1994 में मध्य-एशिया भर में व्यापक दौरा करने के बाद जब मुझे वहाँ के देशों की सामाजिक समस्याओं से निपटने के लिए इस्लामी-बौद्ध सहयोग की सम्भावनाओं के बारे में और अधिक जानकारी हासिल हुई तो मैंने विशिष्ट रूप से इस्लामी-बौद्ध संवाद की शुरुआत की।

मॉरीशस

बाद में उसी वर्ष मैंने अफ्रीका के अपने दौरे के समय, विशिष्टतः मॉरीशस और ज़ांज़ीबार में, इस संवाद की शुरुआत की। ये दोनों ही द्वीप दक्षिण एशिया से अफ्रीकी मुख्य भाग में हेरोइन की तस्करी के सम्पर्क बिन्दु हैं। मॉरीशस के राष्ट्रपति, जो भारतीय मुस्लिम मूल के हैं, के साथ एक बैठक में मैंने तिब्बत के बेरोज़गार और हताश युवाओं के बीच नशीली दवाओं के प्रयोग की समस्या के बारे में चर्चा की और उनसे यह प्रश्न पूछा कि उनका धार्मिक समुदाय मॉरीशस में इस प्रकार की समस्याओं से निपटने के लिए क्या कर रहा है। उन्होंने भी इस बात पर चिन्ता व्यक्त की और इस बात पर सहमति जताई कि नशे की लत से प्रभावित लोगों के मन में आत्म-गौरव का भाव जाग्रत करने, सामुदायिक सहायता उपलब्ध कराने, और उनके उत्थान के लिए नैतिक बल प्रदान करने की दृष्टि से धर्म की भूमिका महत्वपूर्ण है। बाद में मैंने मॉरीशस विश्वविद्यालय में “आधुनिक युग में नैतिक मूल्यों की पुनःस्थापना : तिब्बती बौद्ध धर्म किस प्रकार सहायक हो सकता है” विषय पर व्याख्यान दिया। व्याख्यान के बाद की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक रही।

ज़ांज़ीबार

ज़ांज़ीबार में, जहाँ मुस्लिम आबादी 95% है, स्थानीय नेताओं से मुलाकात के बाद मुझे मालूम हुआ कि इस्लाम की सहायता से हेरोइन की लत छुड़ाने में मामूली सहायता ही हासिल हो सकी है। जब पुराने व्यसनियों को दिन में पाँच बार वुज़ू करने और नमाज़ पढ़ने के कार्यों में व्यस्त रखा जाता है तो उन्हें नशीली वस्तुओं के प्रयोग के लिए खाली समय नहीं मिलता है। इस उदाहरण से नशे की लत से प्रभावित बौद्ध व्यसनियों को साष्टांग प्रणाम जैसी शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से हो सकने वाले सम्भावित लाभ का सारगर्भित विचार जाग्रत होता है।

तुर्की

वर्ष 1995 की वसन्त ऋतु में इस्ताम्बुल, तुर्की के एक दौरे के समय मेरी मुलाकात मारमारा विश्वविद्यालय के इलाहियत इस्लामी धर्मशास्त्र संकाय के इस्लामी विधि और धर्म-दर्शन के संकायाध्यक्ष और प्राध्यापकों के एक समूह से हुई। मैंने सभा से इस विषय पर चर्चा करने का आग्रह किया कि हुइ (चीनी मुसलमान) निवासियों के तिब्बत में बड़ी संख्या में आकर बसने के कारण उत्पन्न स्थिति में बौद्ध-इस्लामी धार्मिक समरसता को बढ़ावा देने के उपाय के रूप में बौद्ध धर्म की भूमिका के बारे में इस्लामी विधि का क्या दृष्टिकोण है। सत्रहवीं शताब्दी से ही मुस्लिम समुदाय तिब्बत में रहता आया है, जो बौद्ध बाहुल्य वाले समुदाय के साथ पूरी तरह घुला-मिला हुआ है, और परम्परागत रूप से उस समुदाय को पाँचवें दलाई लामा द्वारा प्रद्त्त विशेष सुविधाएं प्राप्त हैं। लेकिन चीन के हान क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों के तिब्बत में आगमन से वर्तमान स्थिति काफ़ी तनावपूर्ण हो गई है।

वहाँ उपस्थित प्राध्यापकों का कहना था कि बौद्धों के साथ तालमेल के बारे में इस्लाम की तरफ से कोई बाधा नहीं है, और इसके लिए उन्होंने तीन कारणों का उल्लेख किया। कुछ आधुनिक इस्लामी विद्वानों का कहना है कि कुरान में धुल किफ्ल ─ किफ्ल का वासी ─ नाम के जिस पैगम्बर का दो बार उल्लेख आता है, वह दरअसल बुद्ध ही हैं जहाँ किफ्ल बुद्ध के गृहराज्य कपिलवस्तु के नाम का ही अरबी स्वरूप है। आगे उनका कहना है कि कुरान में वर्णित वटवृक्ष वही बोधिवृक्ष है जिसके नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। क़ुरान में ऐसा वर्णन है कि धुल किफ्ल के अनुयायी सदाचारी लोग हैं। दूसरे, अल-बरूनी और अल-शहरस्तानी नाम के दो इस्लामी विद्वान जो क्रमशः ग्यारहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में भारत आए थे, उन्होंने भारत के धर्मों का वर्णन करते हुए बुद्ध को भारतीयों की दृष्टि में “पैगम्बर” बताया है। और तीसरे, सत्रहवीं शताब्दी से तिब्बत में बसने वाले कश्मीरी मुसलमानों ने इस्लामी कानून के दायरे में रहते हुए तिब्बती बौद्ध मिहिलाओं से विवाह किए थे।

प्राध्यापकों ने स्पष्ट किया कि इस्लाम ऐसे सभी “ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायियों” के प्रति सहिष्णुता का भाव रखता है जो किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार करते हैं। इस्लामी कानून में, विशिष्टतः ईसा की आठवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक सिंध में अरबों के शासन काल के दौरान, वहाँ रहने वाले बौद्धों को भी “ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम धर्मानुयायियों” की श्रेणी में शामिल कर लिया गया और उन्हें वही दर्जा और अधिकार दिए गए जो अरब शासन के अधीन ईसाइयों और यहूदियों को दिए गए थे। मैंने इस बात का उल्लेख किया कि आठवीं शताब्दी में मध्य एशिया में अपने क्षेत्र का विस्तार करते समय मुसलमान अरब मौजूदा उज़्बेकिस्तान और उत्तरी अफगानिस्तान में पहली बार बौद्ध धर्म के सम्पर्क में आए। उस क्षेत्र में सर्वाधिक प्रचलित बौद्ध ग्रंथ प्राचीन तुर्की भाषा में थे, और बाद में सोग़दियाई भाषा में इनके अनुवाद किए गए। इन भाषाओं में “धर्म” शब्द का अनुवाद ग्रीक भाषा से लिए गए शब्द “नॉम” (“nom”) के रूप में किया गया था जिसका अर्थ “विधि” होता है। उइघर तुर्कों और मंगोलों ने यह शब्द सोग़दियाई भाषा से लिया था, और इसका प्रयोग “पुस्तक” के अर्थ में किया जाता है। अतः सम्भव है कि मध्ययुगीन एशिया के पूरे मध्य क्षेत्र में “धर्म के अनुयायी” बौद्धों को भी “ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम अनुयायियों” के रूप में ही देखा गया हो।

इंडोनेशिया

इंडोनेशिया, जो मुख्यतः एक मुस्लिम देश है, आधिकारिक तौर पर छह धर्मों ─ इस्लाम, कैथोलिक धर्म, प्रोटेस्टेंट धर्म, हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, और कन्फ़्यूशियसी धर्म ─ को इस आधार पर स्वीकार करता है कि ये सभी धर्म किसी सृजनकर्ता ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं। इस अपेक्षा की पूर्ति के लिए इंडोनेशियाई बौद्ध कालचक्र तंत्र के आदिबुद्ध को सृजनकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। कालचक्र की शिक्षाएं इंडोनेशिया में, विशेष तौर पर दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फली-फूलीं, जिसका उल्लेख अतिश ने अपने यात्रा वृत्तांत में किया है। वर्तमान समय में वहाँ लोगों को इन शिक्षाओं के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है।

वर्ष 1988 में इंडोनेशिया की व्याख्यान यात्रा के दौरान मैंने बौद्ध धर्म में ईश्वर के विषय पर बौद्ध भिक्षुओं के साथ अनेक बार चर्चाएं कीं। चूँकि आदिबुद्ध की व्याख्या निर्मल प्रकाशयुक्त आदिचेतना के रूप में की जा सकती है, और चूँकि संसार की समस्त माया और निर्वाण चित्त की लीला या “मनःसृष्टियाँ” हैं, इसलिए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह मानने में कोई उलझन नहीं होनी चाहिए कि बौद्ध धर्म एक सृष्टिकर्ता ईश्वर को स्वीकार करता है। बौद्ध धर्म द्वारा आदिबुद्ध को एक पृथक वैयक्तिक सत्व के रूप में स्वीकार किए जाने के बजाए प्रत्येक बोधक्षम जीव में विराजमान होने के रूप में स्वीकार किया जाना ईश्वर के स्वरूप के विषय में धर्मशास्त्रीय भिन्नता मात्र है। बहुत से यहूदी, ईसाई, इस्लामी, और हिन्दू विचारकों ने कहा है कि ईश्वर निराकार है और सभी जीवों में विद्यमान है। जैसाकि मुसलमान कहते हैं, “अल्लाह के अनेकानेक नाम हैं।“

अतः इंडोनेशिया यात्रा के अनुभव और आदिबुद्ध की धारणा के आधार पर मैंने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि बौद्ध धर्म सृष्टिकर्ता ईश्वर की सत्ता को स्वीकार तो करता है, लेकिन इन सम्बंध में उसकी अपनी एक अलग व्याख्या है। एक बार इस बिन्दु पर सहमति बन जाने के बाद मैं तुर्की में इस्लामी धर्मशास्त्रियों के साथ सहजतापूर्वक संवाद की शुरुआत कर सका। उन्होंने मुझे बाद में उसी वर्ष अपने विश्वविद्यालय में एक बार फिर आकर वहाँ के छात्र निकाय और प्राध्यापकों के समक्ष बौद्ध धर्म और इस्लाम तथा बौद्ध धर्म के बीच परस्पर सम्बंध के विषय पर व्याख्यान देने का न्योता दिया।

परम पावन दलाई लामा और एक पश्चिम अफ्रीकी सूफ़ी विद्वान के बीच संवाद

परम पावन दलाई लामा पिछले अनेक वर्षों से दुनिया भर के इस्लामी नेताओं के साथ सम्पर्क में रहे हैं। तुर्की से भारत लौटने के बाद मैं गिनी, पश्चिम अफ्रीका के पुश्तैनी सूफ़ी धार्मिक नेता डॉ. तिरमिज़ियु डिएलो के साथ परम पावन से भेंट करने के लिए धर्मशाला गया। परम पावन से भेंट करने से पूर्व हमने “ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम अनुयायियों” के विषय में आगे और विस्तार से चर्चा की थी। डॉ. डिएलो का कहना था कि इसका आशय उन लोगों से है जो “आदिम परम्परा” के मानने वाले हैं। इसे अल्लाह या ईश्वर का ज्ञान, या जैसा मैंने उन्हें बौद्ध दृष्टिकोण से सुझाव दिया, आदिम गहन प्रज्ञा कहा जा सकता है। इस प्रकार उन्होंने इस बात को सहर्ष स्वीकार कर लिया कि आदिम परम्परा के ज्ञान का उद्घाटन केवल मूसा, ईसा मसीह, और मुहम्मद ने ही नहीं किया, बल्कि बुद्ध ने भी किया था। जो लोग इस अन्तर्जात आदिम परम्परा और ज्ञान का अनुसरण करते हैं वे “ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले अनुयायी” हैं। लेकिन यदि वे मानवता और सृष्टि की इस नेक और विवेकपूर्ण प्रकृति के विरुद्ध आचरण करते हैं तो वे इस श्रेणी में गिने जाने के अधिकारी नहीं हैं।

इस अर्थ में यह बात स्वीकार की जा सकती है कि बुद्ध ईश्वर के दूत थे और यह बात तुर्की के प्राध्यापकों की उस व्याख्या के भी अनुकूल है कि “ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रंथ वाले गैर-मुस्लिम अनुयायी” वे लोग हैं जो ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं। निर्मल प्रकाश चित्त के रूप में आदिबुद्ध न केवल आदिम गहन प्रज्ञा हैं, बल्कि समस्त माया के सिरजनहार भी हैं। डॉ. डिएलो इस चर्चा से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने एक हदीस (हज़रत मुहम्मद के निजी वचन) का उद्धरण देते हुए अपने अनुयायियों को ज्ञान की तलाश में चीन तक जाने के लिए आदिष्ट किया।

डॉ. डिएलो ने स्वयं इस हदीस के सिद्धान्तों का पालन किया। वे शांतिदेव के बोधिचर्यावतार(बोधिसत्व जैसा आचरण करना), जिसमें परम पावन द्वारा दिए गए अवलोकितेश्वर का अभिषेक शामिल था, के बारे में परम पावन के व्याख्यान के अन्तिम दिन उपस्थित रहे। वे बोधिसत्व की प्रतिज्ञाओं से विशेष तौर पर प्रभावित हुए। पश्चिम अफ्रीका की सूफ़ी परम्पराओं में भी पूर्णता की प्राप्ति के लिए ऐसी निःशेष प्रतिबद्धता की बात की जाती है जो शब्दातीत है और समस्त सृष्टि की सेवा से सम्बंधित है।

अपने दौरे के अन्तिम दिन डॉ. डिएलो ने परम पावन से एकांत भेंट की। अपने सौम्य श्वेत परिधान में सज्जित तेजस्वी अफ्रीकी आध्यात्मिक गुरु परम पावन पहली बार परम पावन की उपस्थिति में इतने विह्वल हुए कि वे रोने लगे। अपने अनुचर को आदेश देने के बजाए, जैसाकि वे सामान्यतया करते, परम पावन स्वयं अपने उपकक्ष में गए और भीतर से एक टिशू पेपर लेकर आए जो उन्होंने सूफ़ी आचार्य को दिया ताकि वे अपने आँसू पोंछ सकें। डॉ. डिएलो ने परम पावन को एक पारम्परिक मुस्लिम शिरोपरिधान भेंट किया जिसे परम पावन ने निःसंकोच पहन लिया और पूरी मुलाकात के समय उसे पहने ही रहे।

परम पावन ने संवाद की शुरुआत करते हुए स्पष्ट किया कि यदि बौद्ध और मुसलमान दोनों ही अपनी सोच में लचीलापन रखें तो सार्थक और खुला संवाद सम्भव है। यह मुलाकात बेहद सौहार्दपूर्ण और भावनात्मक रूप से मन को छूने वाली थी। परम पावन ने सूफ़ी ध्यान परम्परा, विशेष तौर पर प्रेम, करुणा, और सेवा का आग्रह करने वाली पश्चिम अफ्रीकी परम्परा से सम्बंधित बहुत से प्रश्न पूछे। अपने देश पर वामपंथियों का कब्ज़ा हो जाने के बाद से डॉ. डिएलो अनेक वर्षों से जर्मनी में निर्वासित जीवन जी रहे थे। दोनों महापुरुषों में बहुत सी समानताएं थीं। परम पावन और डॉ. डिएलो दोनों ने ही इस्लामी-बौद्ध संवाद को भविष्य में जारी रखने की वचनबद्धता व्यक्त की।

तुर्की की पुनर्यात्रा

वर्ष 1995 के अन्त में एक बार फिर मैंने मध्य-पूर्व का दौरा किया। मारमारा विश्वविद्यालय, इस्तांबुल के इलाहियत इस्लामी संकाय के प्राध्यापकों और दर्शनशास्त्र विभाग के स्नातक छात्रों के समक्ष व्याख्यान दिया। इस विभाग में सम्पूर्ण तुर्की के लिए इस्लामी धार्मिक शिक्षकों और इस्लाम तथा बौद्ध धर्म सहित दूसरे धर्मों के माध्यमिक स्कूली शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जाता है। वहाँ के शिक्षक इस्लामी-बौद्ध संवाद स्थापित किए जाने के विचार को लेकर अत्यंत उत्साहित थे और हमने सृष्टि, इलहाम, और नीतिशास्त्र के स्रोत जैसे विषयों पर चर्चा की। इस्लाम मानता है कि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है बल्कि एक अमूर्त सृजनशील सिद्धांत है, और इस्लामी धर्मशास्त्र के कुछ निकायों की मान्यता है कि सृजन अनादि है। अनादि प्रकटनों को अनादि सृजनकर्ता के रूप में निर्मल प्रकाशवान चित्त की दृष्टि से और उच्चतर सत्यों के प्रकटनकर्ता के रूप में बुद्ध की चर्चा की दृष्टि से हमारे पास एक उत्साहपूर्ण और उपयोगी संवाद का आधार उपलब्ध था।

अपने पिछले दौरे के समय मैंने इस विश्वविद्यालय में जो साक्षात्कार दिया था उसे स्थानीय इस्लामी कट्टरपंथियों की एक लोकप्रिय पत्रिका में प्रकाशित किया गया था, जिसे न केवल तुर्की में, बल्कि मध्य एशिया के सभी इस्लामी गणतंत्रों में पढ़ा जाता है। मेरे दौरे के संकाय समन्वयक ने कहा था कि वे मेरे एक लिखित व्याख्यान, जो मैंने इस बार बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और इतिहास के बारे में, विशेष तौर पर मध्य एशिया के तुर्की समुदायों के बीच उसके इतिहास, और दुनिया भर में बौद्ध धर्म की स्थिति के बारे में दिया था, के तुर्की भाषा में अनुवाद को इसी पत्रिका में प्रकाशित करेंगे। मुझे 1996 के उत्तरार्ध में न केवल इस इस्लामी संकाय में लौट कर और व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया बल्कि कोन्या में सूफ़ी धार्मिक नेताओं के साथ इसी प्रकार की मुलाकातें करने और तुर्की के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी प्राध्यापकों और छात्रों के साथ मुलाकात करने के लिए आमंत्रित किया गया।

मिस्र

तुर्की के बाद में मिस्र की यात्रा पर गया, जहाँ मुझे काहिरा विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था। वहाँ सबसे पहले मेरी मुलाकात सेंटर फॉर एशियन स्टडीज़ के अर्थशास्त्र तथा राजनीतिविज्ञान संकाय के प्राध्यापकों के एक समूह से हुई। उन्होंने मुझे “एशिया के राजनीतिक तथा आर्थिक विकास पर बौद्ध चिंतन का प्रभाव” के विषय पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया था। उनकी रुचि खास तौर पर यह जानने में थी कि बौद्ध सिद्धांतों ने “एशियाई चीता” समूह के देशों के आर्थिक विकास में किस प्रकार सहयोग दिया है ताकि इसी तर्ज़ पर मिस्र को “अफ्रीकी और मध्य-पूर्व के चीते” के रूप में स्थापित करने के लिए इस्लाम की सहायता ली जा सके। उनकी यह भी इच्छा है कि वे एशिया और उसके धर्मों को समझें ताकि वे इस क्षेत्र के साथ बेहतर राजनीतिक और आर्थिक सम्बंध स्थापित कर सकें। वे इस मिथ्या धारणा के कारण अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते हैं कि सभी मुसलमान कट्टरपंथी, धर्मोन्मादी आतंकवादी होते हैं।

इस संकाय में बौद्ध चिंतन पर दिया गया यह पहला व्याख्यान था, और लोगों की रुचि और उत्साह देखते ही बनते थे। उन्होंने मुझे अपनी एशियाई मोनोग्राफ श्रृंखला, जिसे समूचे अरबी-भाषी क्षेत्र में वितरित किया जाता है, के लिए अंग्रेज़ी और अरबी भाषाओं में प्रकाशित किए जाने के लिए इस्लामी परिप्रेक्ष्य में आसानी से समझे जाने योग्य बौद्ध शिक्षाओं से सम्बंधित एक पत्र प्रस्तुत करने के लिए कहा। इसे जून 1996 में प्रकाशित किया गया।

[देखें: इस्लामी दृष्टिकोण से बौद्ध धर्म का परिचय]

अगले दिन मैंने कला संकाय में एशियाई दर्शन के स्नातकपूर्व पाठ्यक्रम के तीन सौ छात्रों को बौद्ध धर्म की बुनियादी शिक्षाओं के बारे में व्याख्यान दिया और फिर उसके बाद स्नातकों के लिए दर्शनशास्त्र के एक सेमिनार में व्याख्यान दिया। छात्रों और प्राध्यापकों के बीच एशिया के बारे में जानकारी का वैसा ही अभाव दिखाई दिया जैसा पूर्ववर्ती साम्यवादी जगत में हुआ करता था। लेकिन जानकारी की यह भूख, जैसाकि पूर्ववर्ती साम्यवादी देशों में होता था, किसी आध्यात्मिक खोज की दृष्टि से नहीं थी, बल्कि आपसी समझ-बूझ और परस्पर सम्मान के आधार पर शेष विश्व के साथ सम्पर्क बढ़ाने के लिए अधिक थी। जिस दिन ये आखिरी दो व्याख्यान दिए गए, उस दिन सुबह पाकिस्तान में मिस्र के दूतावास पर आतंकवादियों ने बम से हमला करके मिस्र के पन्द्रह राजनयिकों की हत्या कर दी और छात्रों ने विश्वविद्यालय में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। वहाँ भारी संख्या में सैनिक और पुलिसकर्मी तैनात थे और हम बख्तरबंद गाड़ियों, गिरफ्तारियों, आदि से बचते-बचाते परिसर में दाखिल हुए। बड़ी अद्भुत बात थी कि कक्षा-भवनों से बाहर के ऐसे माहौल के बावजूद बौद्ध धर्म में इतनी रुचि दिखाई जा रही थी।

जॉर्डन

इस दौरे में मेरा आखिरी पड़ाव मफरक़, जॉर्डन में था जहाँ मुझे अल-बायत विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया गया था। मुख्यतः जॉर्डन की सरकार द्वारा निर्मित इस अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना 1994 में की गई थी। यहाँ दो हज़ार छात्र पढ़ते हैं जिनमें से आधे दूसरे मुस्लिम देशों से हैं, और कुछ यूरोपीय और उत्तर अमरीकी ईसाई छात्र हैं, बड़ी संख्या में विदेशी कर्मचारी हैं। इस विश्वविद्यालय की स्थापना इस्लाम की सातों परम्पराओं के बीच परस्पर समझ-बूझ और इस्लाम तथा विश्व के दूसरे धर्मों के बीच तालमेल को बढ़ाने के लिए की गई थी। मेरी मुलाकात विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से हुई जो 1995 में बौद्ध-इस्लामी तालमेल के विषय पर आयोजित किए गए एक सेमिनार में मुख्य वक्ता और सह-आयोजक के रूप में जापान जाने वाले थे। उन्होंने भविष्य में जॉर्डन में भी ऐसे ही सेमिनार का आयोजन किए जाने के बारे में रुचि दिखाई। 1996 के उत्तरार्ध में उन्होंने मुझे बौद्ध धर्म और तिब्बत, इस्लाम के साथ उनके सम्बंध के विषय पर व्याख्यानमाला देने और संवाद को आगे जारी रखने के लिए पुनः आने का निमंत्रण दिया। उनकी इच्छा है कि विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एक बौद्ध खण्ड हो और इसके लिए उन्होंने मुझे एक पुस्तक-सूची तैयार करने के लिए कहा।

मैंने आधुनिक और प्राचीन एशिया में इस्लाम और बौद्ध धर्म के बीच के विनिमय के बारे में विश्वविद्यालय के बायत अल-हिकमाह हायर इन्स्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल साइंस के प्राध्यापकों के साथ संवाद में हिस्सा लिया। उनकी रुचि विशेष तौर पर मलेशिया और इंडोनेशिया क्षेत्र पर केन्द्रित है, लेकिन वे दूसरे क्षेत्रों से सम्बंधित जानकारी में भी रुचि रखते हैं। उन्होंने अपने अखिल-इस्लामी डाटाबेस सर्वे के लिए तिब्बती मुसलमानों से सम्बंधित जानकारी दिए जाने का अनुरोध किया और आर्थिक विकास में बौद्ध नीतिशास्त्र की भूमिका के बारे में चर्चा करने के लिए पुनः आने का निमंत्रण दिया। मेरी मुलाकात मोरक्को और सीरिया के विज़िटिंग प्रोफेसर्स के साथ भी हुई, और उन्होंने भी इस प्रकार के संवाद में गहरी रुचि दिखाई।

भविष्य की सम्भावनाएं

जैसा कि मेरा अनुभव रहा है, इस्लामी-बौद्ध संवाद का मुख्य उद्देश्य शैक्षिक है ─ ताकि प्रत्येक धर्म दूसरे धर्म की मान्यताओं और संस्कृतियों के बारे में और अधिक जानकारी हासिल कर सके। धर्मशाला, भारत स्थित तिब्बती ग्रंथों और अभिलेखों के पुस्तकालय ने इस उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में प्रमुख भूमिका निभाने का दायित्व उठाया है। इस पुस्तकालय ने इस्लामी देशों के उन विश्वविद्यालयों के साथ पत्रिकाओं और पुस्तकों के विनिमय का कार्यक्रम शुरू किया है जिनके साथ मैंने सम्पर्क स्थापित किया है। इसी प्रकार पुस्तकालय मध्य एशिया क्षेत्र में बौद्धों और मुसलमानों के बीच परस्पर विनिमय के इतिहास के विषय में और अधिक शोध के लिए पूर्ववर्ती सोवियत संघ के मध्य एशियाई इस्लामी गणतंत्रों की संस्थाओं के साथ सहयोग के कार्यक्रम तैयार कर रहा है। इस प्रकार सम्पर्क और सहयोग बढ़ाने की सम्भावनाएं व्यापक हैं।