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जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट उपाधि प्रदान किए जाने के अवसर पर परम पावन दलाई लामा का मानार्थ स्वीकृति भाषण

नई दिल्ली, भारत, 23 नवम्बर 2010
स्यॉन जोन्स और अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा अल्पतः संशोधित

[ऑडियो संस्करण के लिए: http://www.dalailama.com/webcasts/post/153-jamia-millia-islamia-university.]

भाषांतरकार के माध्यम से : मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, इस सभा के मुख्य अतिथि [भारत के मानव संसाधन विकास मंत्री] डॉ. कपिल सिब्बल और उपकुलपति, प्राध्यापकगण, संकायाध्यक्षों, और छात्रों तथा यहाँ एकत्र सभी अतिथियों को धन्यवाद देता हूँ। सबसे पहले मैं आप सभी का अभिनन्दन करता हूँ और मुझे यह सम्मान देने के लिए जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय को धन्यवाद देता हूँ।

परम पावन दलाई लामा : यह माइक्रोफोन प्राप्त करने के बाद अब मैं अंग्रेज़ी भाषा में अपनी बात को कहने का प्रयास करूँगा। किन्तु मैं श्रोताओं को बता दूँ कि अंग्रेज़ी भाषा में मेरी अभिव्यक्ति टूटी-फूटी है और इसलिए सम्भव है कि मैं कहीं-कहीं गलत शब्द का प्रयोग कर दूँ। अतः जब भी मैं टूटी-फूटी अंग्रेज़ी भाषा में अपनी बात कहता हूँ तो सामान्यतया अपने श्रोताओं को आगाह कर देता हूँ कि वे मेरी बात को सुनते समय “सावधानी बरतें”। मेरे भाषण में किसी शब्द के गलत चयन के कारण भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए मैं गलती से “आशावाद” के स्थान पर “निराशावाद” शब्द का प्रयोग कर सकता हूँ; यह अपने आप में एक गम्भीर चूक है। इसमें सचमुच जोखिम है, इसलिए मेरी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी को सुनते समय सावधानी बरतें।

मैं इस सम्मान को पा कर सचमुच स्वयं को सम्मानित अनुभव कर रहा हूँ। पहली बात तो यह है कि मुझे जब भी ये उपाधियाँ दी जाती हैं तो मैं सामान्यतया यह कह कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हूँ कि मैंने अध्ययन पर तो ऐसा कुछ ख़ास समय खर्च नहीं किया लेकिन बिना पढ़े ही मुझे ये उपाधियाँ मिल जाती हैं। जो छात्र अपनी डाक्टरेट उपाधियाँ प्राप्त कर रहे हैं, उनके लिए मैं कहना चाहूँगा कि आप लोगों ने अपना बहुत सा समय लगाया और परिश्रम किया है, जबकि मुझे ये उपाधियाँ विभिन्न विश्वविद्यालयों से बिना कोई विशेष मेहनत किए मिल जाती हैं, इसलिए मैं स्वयं को विशेष रूप से सम्मानित अनुभव कर रहा हूँ। और यहाँ, विशेष रूप से एक इस्लामी विश्वविद्यालय से उपाधि मिलना, इसकी मैं खास तौर पर इसलिए सराहना करता हूँ क्योंकि धार्मिक सौहार्द को बढावा देना मेरी प्रतिबद्धताओं में से एक है।

11 सितम्बर की घटना के समय से ही मैं दृढ़ता के साथ इस्लाम का समर्थन करता रहा हूँ क्योंकि मुस्लिम पृष्ठभूमि वाले चंद शरारती लोगों की करतूतों के कारण पूरे इस्लाम को सामान्य रूप से नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। यह बात एकदम गलत है। स्वाभाविक और वास्तविक बात यह है कि इस्लाम विश्व के बहुत महत्वपूर्ण धर्मों में से एक है। पिछली अनेक शताब्दियों से इस्लाम लाखों-लाख लोगों को आशा, विश्वास और प्रेरणा देता आया है, अभी भी दे रहा है और आगे भी देता रहेगा। यह एक सच्चाई है। बचपन से ही मेरे कई घनिष्ठ मुस्लिम मित्र रहे हैं। मेरे विचार से करीब चार शताब्दी पहले मुस्लिम व्यापारी तिब्बत, ल्हासा में आकर बसे थे, जहाँ उन्होंने एक छोटा सा मुस्लिम समुदाय स्थापित किया। इस मुस्लिम समुदाय की ओर से कभी किसी झगड़े की घटना का उल्लेख नहीं मिलता है, वे लोग बड़े ही भद्र लोग थे।

मैं इस देश में कुछ ऐसे मुस्लिमों को जानता हूँ जिन्होंने मुझे बताया है कि इस्लाम के सच्चे अनुयायी को सभी जीवधारियों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखना चाहिए। और उन्होंने मुझे यह भी बताया है कि यदि कोई मुसलमान रक्तपात करता है तो वह मुसलमान नहीं रह जाता है। और “जिहाद” का अर्थ “दूसरों पर हमला करना” नहीं है। “जिहाद” का गहरा अर्थ है हमारे अपने अन्दर का संघर्ष [हर्षध्वनि]: क्रोध, घृणा, आसक्ति जैसे नकारात्मक मनोभावों के खिलाफ़ संघर्ष : ये ऐसे मनोभाव हैं जो व्यक्ति की चित्तवृत्ति में विकृति उत्पन्न करते हैं, और फिर व्यक्ति की चित्तवृत्ति के माध्यम से परिवार में या समुदाय में और भी अधिक समस्याएं उत्पन्न करते हैं। इसलिए, इन नकारात्मक मनोभावों, इन ध्वंसात्मक भावनाओं के खिलाफ़ संघर्ष करना ही “जिहाद” का गूढ़ अर्थ है।

इसलिए अपने अलग दर्शन के बावजूद उस धर्म का सार भी वही है जो दूसरे धर्मों का सार है। दूसरे धर्मों के अनुयायियों के साध अधिक सम्पर्क और वैचारिक आदान-प्रदान के परिणामस्वरूप मैंने यह जाना है कि विभिन्न धर्मों के दर्शनों में बड़े अन्तर होने के बावजूद व्यवहार के स्तर पर उन सभी धर्मों में प्रेम, करुणा, क्षमा, सहिष्णुता, आत्मानुशासन और संतोष जैसे गुणों के अनुशीलन की बात कही गई है। इसलिए मुझे जब भी अवसर मिलता है, मैं लोगों से यही कहता हूँ कि हमें कुछ गिने-चुने शरारती मुस्लिमों के व्यवहार के कारण इस्लाम के बारे में सामान्यीकृत नकारात्मक राय नहीं देनी चाहिए। हिन्दू धर्म के अनुयायियों में भी कुछ शरारती तत्व हैं; यहूदियों में भी कुछ शरारती लोग हैं, ईसाइयों में भी हैं, बौद्धों में भी हैं ─ और छोटे से तिब्बती बौद्ध समुदाय में भी कुछ शरारती तत्व हैं, यह बात एकदम स्पष्ट है। इसलिए एक इस्लामी विश्वविद्यालय के द्वारा उपाधि प्रदान किया जाना मेरे लिए सचमुच एक बड़े सम्मान की बात है।

अब मैं अपनी प्रतिबद्धताओं के बारे में कुछ बातें कहूँ। जीवनपर्यन्त मेरी दो प्रतिबद्धताएं हैं। जैसा मैंने पहले उल्लेख किया, एक प्रतिबद्धता तो धार्मिक सौहार्द को बढ़ावा देने से सम्बंधित है; दूसरी प्रतिबद्धता, मानवीय स्तर पर आभ्यंतरिक मानवीय मूल्यों, जैविक दृष्टि से विकसित होने वाले मानवीय गुणों, मुख्यतः मानव के प्रति प्रेम को विकसित करना है। जन्म लेते ही माता की ओर से शिशु के रूप में हमें ढेर सारा प्रेम और स्नेह मिलता है। शिशु की ओर से भी, बिना यह जाने कि वह व्यक्ति कौन है, शिशु जन्म लेते ही उस व्यक्ति पर जैविक दृष्टि से पूरी तरह आश्रित हो जाता है। जब माँ बच्चे को इस प्रकार प्रेम करती है तो बच्चे को बड़े आनन्द का अनुभव होता है; लेकिन जब माँ और बच्चा बिछुड़ जाते हैं तो बच्चा स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। यहाँ तक कि पशुओं का अनुभव भी कुछ इसी प्रकार का होता है, और इस प्रकार हमारे जीवन की शुरुआत होती है। इसलिए जिस व्यक्ति को जन्म के समय आधिक से अधिक प्रेम और स्नेह मिलता है वह अगले कुछ वर्षों तक, बल्कि अपने पूरे जीवन काल में अधिक स्वस्थ और अधिक करुणामय जीवन जीता है। लेकिन जिन लोगों को अपने जीवन के उस समय में, अपनी छोटी उम्र में प्रेम-स्नेह नहीं मिलता है या उनके साथ दुर्व्यवहार होता है, तो वह अनुभव उनके साथ जीवन भर रहता है। ऐसे लोग बाहर से जैसे भी दिखाई दें, लेकिन उनके अन्तर्मन में भय और अविश्वास का भाव बना रहता हैं। मनुष्यों के बीच अविश्वास दरअसल बुनियादी मानव स्वभाव के प्रतिकूल है : स्वभाव से हम सभी सामाजिक प्राणी हैं। व्यक्ति समाज का अंग होता है और व्यक्ति का भविष्य पूरी तरह उसके समाज या समुदाय पर निर्भर करता है।

अब कुछ बातें आपके सफल जीवन के आधार के विषय में। यदि आपके अन्दर किसी प्रकार का अविश्वास और भय उत्पन्न हो जाए, यदि आप कटे-कटे रहें, तो फिर आप एक व्यक्ति के रूप में प्रसन्न कैसे रह सकते हैं? यह बहुत ही कठिन है। इसलिए सच्चे अर्थ में सहयोग की भावना विकसित करने के लिए मित्रता का भाव बहुत आवश्यक है। खुलापन और पारदर्शिता विश्वास का आधार है; तभी विश्वास विकसित हो सकता है। स्नेहशीलता, दूसरों के कल्याण के लिए फिक्रमंद होने का भाव इसका आधार है। जब मन में ऐसा भाव हो तो दूसरों का शोषण करने, उन्हें धोखा देने, उनके साथ बेईमानी करने या दूसरों को डराने-धमकाने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है क्योंकि आप ईमानदारी से उनका कल्याण करने के लिए फिक्रमंद होते हैं। यह भाव अनिवार्य रूप से धर्म से ही नहीं आता है, बल्कि जैविक तत्वों के माध्यम से आता है।

मेरी प्रमुख प्रतिबद्धताओं में से एक प्रतिबद्धता यह भी है कि मैं लोगों को बताऊँ, उन्हें इस बात की जानकारी दूँ कि “हम सभी सामाजिक प्राणी हैं।“ अब, विशेष तौर पर आजकल की दुनिया में, वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों के कारण, और इसलिए कि विश्व की जनसंख्या इस समय लगभग सात बिलियन हो चुकी है, सभी लोगों के हित एक दूसरे के हितों से जुड़े हुए हैं। तो इस वास्तविकता के दृष्टिगत “हम” और “वे” की संकल्पना अब प्रासंगिक नहीं रही है। अब हमें मानव जाति को एक मानव परिवार के रूप में देखना होगा। इसलिए मैं अक्सर लोगों से कहता हूँ कि अब हमें यह दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए कि यह पूरा संसार मेरा ही हिस्सा है, हमारा ही हिस्सा है। जब “हम” और “वे” के बीच की विभाजन रेखा बहुत स्पष्ट होती है तो हिंसा जन्म लेती है। लेकिन यदि हम यह भाव विकसित कर लें कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति “मैं” का ही हिस्सा है, “हम” का ही हिस्सा है, तो फिर हिंसा के प्रयोग के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाएगी।

इसलिए मैं और मेरे कई अन्य मित्र ऐसा समझते हैं कि पिछली शताब्दी, 20वीं शताब्दी, हिंसा की शताब्दी थी। पिछली शताब्दी में हुई हिंसा में 200 मिलियन से ज़्यादा लोग मारे गए। मैं हाल में जापान के हिरोशिमा शहर, जहाँ मानव जाति पर पहले परमाणु बम से हमला किया गया था, में नोबेल पुरस्कार विजेताओं की एक सभा में भाग लेकर लौटा हूँ। वह नरसंहार सचमुच भयावह था! उस शताब्दी में मानव जाति के खिलाफ़ परमाणु हथियारों तक का प्रयोग किया गया। इसलिए बहुत सारे विकास के बावजूद वह शताब्दी रक्तपात की शताब्दी बन गई। उस अपरिमित हिंसा और बड़े पैमाने पर हुए उस रक्तपात से यदि मानव जाति की कुछ समस्याओं को सचमुच हल किया जा सका हो या कोई लाभ हुआ हो तब तो ठीक है, उस हिंसा को उचित ठहराने का कोई आधार हो सकता है; लेकिन उसका कोई लाभ, उसके औचित्य का कोई आधार है ही नहीं। इसलिए अपने पिछले अनुभव के आधार पर हमें हरसंभव प्रयास करके यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 21वीं शताब्दी संवाद की शताब्दी बने। इसके लिए यह आवश्यक है कि समस्त मानव जाति में एकता का भाव जाग्रत हो। मैं समझता हूँ कि राष्ट्रीयता, संस्कृति, जाति, धार्मिक आस्था के अन्तर गौण हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि एक बुनियादी स्तर पर हम सभी इन्सान हैं।

इसलिए, कभी-कभी मुझे लगता है कि आज जितनी भी समस्याओं से हम जूझ रहे हैं, वे मुख्यतः हमारी अपनी बनाई हुई हैं। ये समस्याएं, जिनके लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार हैं, इसलिए उत्पन्न होती हैं क्योंकि हम बुनियादी स्तर को भुला कर गौण स्तर के मुद्दों को आवश्यकता से अधिक महत्व देते हैं। अब समय आ गया है कि दुनिया को खुशहाल बनाने के लिए, दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए, हम मानवीय दृष्टिकोण को महत्व दें। हमारी ही तरह प्रत्येक व्यक्ति को खुश रहने का अधिकार है; और प्रत्येक व्यक्ति के हित शेष अन्य लोगों के व्यवहार पर निर्भर करते हैं। इसलिए हमें दूसरों के हितों का ध्यान रखना चाहिए। अपने लिए अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने का यही उचित मार्ग है।

इस प्रकार यह मेरी दूसरी प्रतिबद्धता है। मेरी पहली प्रतिबद्धता धार्मिक सौहार्द को बढ़ावा देना है; मेरी दूसरी प्रतिबद्धता है आधारभूत मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना। इसलिए मैं जीवनपर्यन्त इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध हूँ।

इसलिए आप लोगों को, आप युवा लोगों को, जो छात्र हैं, पहले तो मैं आप सब को बधाई देता हूँ। आपने अपने कठोर परिश्रम से यह उपाधि प्राप्त की है। संभव है कि पिछले कुछ दिनों में आपको नींद न आई हो; बहुत उत्साह रहा होगा। अब अपनी उपाधि पाने के बाद मैं समझता हूँ कि आप लोग आराम की नींद सोएंगे। जो भी हो, मैं अपनी ओर से आप सभी को बधाई देता हूँ, और साथ ही आपसे यह बात कहना चाहता हूँ : जीवन आसान नहीं है; इसमें किसी बात की कोई गारंटी नहीं है। आपके सामने बहुत सी कठिनाइयाँ आएंगी; लेकिन स्मरण रहे, हम सभी मानव समाज का हिस्सा हैं। इसलिए चाहे जैसी भी समस्याओं से हमारा सामना हो, हमारे अन्दर समस्याओं को हल करने की क्षमता है। और इसके लिए आत्मविश्वास और आशावादी दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण हैं। आप युवा लोगों को और अधिक धैर्यवान भी होना चाहिए। युवाजन, कभी-कभी ऐसा होता है जो चीज़ें आप पाना चाहते हैं, उन्हें आप तुरन्त पा लेना चाहते हैं। जब आपके रास्ते में कोई बाधा या रुकावट आती है तो आप हतोत्साहित हो जाते हैं। एक तिब्बती कहावत है: “नौ बार नाकाम हों तो नौ बार प्रयास करें।“ यह बात महत्वपूर्ण है, आप इसे ध्यान रखिए।

एक और बात: आप उस पीढ़ी के लोग हैं जो सचमुच 21वीं शताब्दी की पीढ़ी है। मैं तो 20वीं शताब्दी का हूँ, और यहाँ मौजूद कुछ प्राध्यापकगण और मंत्रीगण भी 20वीं शताब्दी के हैं, हम लोग 20वीं शताब्दी के हैं। 21वीं शताब्दी के सिर्फ़ 10 साल ही बीते हैं, इस सदी को बीतने में 90 साल अभी बाकी हैं। इसलिए आप ही वे लोग हैं जो इस शताब्दी को एक नया आकार देंगे; और इसके लिए आपको अपने आप को तैयार करना होगा। और एक बेहतर विश्व के निर्माण के लिए, एक शांतिपूर्ण विश्व की स्थापना के लिए, एक खुशहाल दुनिया के लिए आपके पास एक दृष्टिकोण होना चाहिए, और इसके लिए सिर्फ शिक्षा ही काफी नहीं है बल्कि नैतिक सिद्धान्त भी होने चाहिए। इस प्रकार एक खुशहाल, शांतिपूर्ण विश्व की स्थापना के लिए शिक्षा और नैतिक आचरण को एक साथ लाना होगा।

जहाँ तक नैतिक आचरण का सम्बंध है, उसके कई स्तर हैं। एक स्तर धार्मिक विश्वास का स्तर है। एक बुनियादी स्तर पर, बिना किसी धार्मिक विश्वास के, सिर्फ सामान्य इंसानी तज़ुर्बे और सामान्य बुद्धि के आधार पर और फिर ताज़ा वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर भी हमें यह दृढ़ विश्वास हो जाता है कि स्नेह और अधिक खुलेपन के व्यवहार के बड़े फायदे हैं, यहाँ तक कि यह हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। हम सभी अपनी सेहत का ख़याल रखते हैं। मन की शांति अच्छे स्वास्थ्य की प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है। इसलिए और अधिक करुणा भाव विकसित करने के लिए अधिकाधिक प्रयास करना दरअसल हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है और परिवार की खुशहाली के लिए भी यह बहुत महत्वपूर्ण है।

जहाँ तक शिक्षा का सम्बंध है, आप उच्च शिक्षा की उपाधि पा ही चुके हैं। अब आप कृपया अपने आन्तरिक मूल्यों पर अधिक ध्यान दें: यानी वास्तविक मानवीय मूल्यों और नैतिक आचरण पर ध्यान दें। उपकुलपति महोदय आचारनीति, मानवीय दृष्टिकोण का उल्लेख कर ही चुके हैं; ये बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और यही मैं आप सबसे कहना चाहता हूँ। मुझे इतनी ही बात कहनी थी, आप सभी का हार्दिक धन्यवाद।