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डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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आधुनिक विश्व में दलाई लामा की भूमिका की प्रासंगिकता

अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन
रीगा, लातविया, अगस्त 2013
असंपादित प्रतिलेख

आज शाम मैं आधुनिक विश्व में दलाई लामा की भूमिका की प्रासंगिकता के विषय में चर्चा करूँगा, क्योंकि यदि आज के विश्व में दलाई लामा की कोई भूमिका है तो उसे प्रासंगिक होना चाहिए, सार्थक और अधिक से अधिक लोगों के लिए उपयोगी होना चाहिए, उसे सिर्फ मनोरंजन की दृष्टि से ही या हमारी जिज्ञासा को तृप्त करने के साधन के रूप में इसलिए ही प्रासंगिक नहीं होना चाहिए कि वे किसी सुपरस्टार की भांति एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। दलाई लामा की प्रासंगिकता दरअसल इतनी मात्र नहीं है। दलाई लामा के जीवन का एकमात्र उद्देशय दूसरों के काम आना है।

परोपकार भाव से सेवा

हालाँकि दुनिया भर में बहुत से लोग दूसरों के कल्याण के लिए पूर्ण समर्पण भाव से कार्य करने का दावा करते हैं, लेकिन मैं मानता हूँ कि परम पावन ─ हम सामान्यतया उन्हें परम पावन के संबोधन से बुलाते हैं ─ के बारे में बड़ी अद्भुत बात यह है कि उनका व्यवहार एकदम निष्कपट है। जब लोग उनके सान्निध्य में होते हैं और उनके वचन सुनते हैं तो यही निष्कपटता लोगों तक पहुँचती है और लोग जान पाते हैं कि वे वास्तव में क्या करते हैं। वे हमेशा तीन प्रमुख उद्देश्यों की चर्चा करते हैं जिन्हें वे अपनी जीवनचर्या के माध्यम से बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत रहते हैं। पहला उद्देश्य तो धर्मनिरपेक्ष नैतिकता है, दूसरा धार्मिक सौहार्द है, और तीसरा, चूँकि उन्हें यह भूमिका दी गई है, तिब्बत और तिब्बती लोगों की भलाई के लिए कार्य करना।

नीतिशास्त्र

दलाई लामा अक्सर धर्मनिरपेक्ष नैतिकता और धार्मिक सौहार्द के विषयों की चर्चा करते हैं, और इसका कारण यह है कि दुनिया को नैतिकता की बहुत अधिक आवश्यकता है। नैतिकता के अभाव के कारण लोगों में बहुत अधिक भ्रष्टाचार, बहुत अधिक बेईमानी का भाव है और आपसी सहमति का बहुत अधिक अभाव है। दलाई लामा बहुत उदार चित्त से विश्वव्यापी दृष्टिकोण रखते हैं और उनकी उक्तियाँ और विचार इस बात के दृष्टिगत होते हैं कि इस ग्रह के सात बिलियन लोगों का कल्याण किस प्रकार हो सकता है। इन सात बिलियन लोगों में कुछ लोग ऐसे हैं जो किसी न किसी प्रकार के धर्म में विश्वास करते हैं, और कुछ लोगो ऐसे हैं जो नास्तिक हैं, और ऐसी स्थिति में हमें किसी ऐसी नैतिक व्यवस्था ─ किसी नैतिक आधार ─ की आवश्यकता है जो सभी को स्वीकार्य हो। इसी को वे “धर्मनिरपेक्ष नैतिकता” कहते हैं, जिसका अर्थ किसी धर्म या पद्धति का विरोध करना नहीं है, बल्कि सभी मतों के प्रति सम्मान का भाव रखना है। बकौल उनके, यह मान्यता “आधारभूत मानव मूल्यों” पर आधारित है। कभी-कभी यह कहने के बजाए कि उनका मुख्य विषय धर्मनिरपेक्ष नैतिकता है, वे कहते हैं कि उनका मुख्य विषय आधारभूत मानव मूल्यों का संवर्धन करना है, और ये मूल्य बुनियादी जीवविज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित हैं। अपने नवजात शिशु के प्रति माता का स्नेह और देख-रेख, दूसरों का खयाल रखने के ये भाव न केवल मनुष्यों में, बल्कि पशुओं में भी बेहद बुनियादी और आदिम भावों के रूप में पाए जाते हैं। दलाई लामा की जीवनचर्या में यही भाव दृष्टिगोचर होता है, यही बात दलाई लामा के संदेश को हृदय-स्पर्शी बनाती है।

यात्रा कार्यक्रम

यदि आप विचार करें तो दुनिया भर में परम पावन के यात्रा दौरों का कार्यक्रम एकदम विस्मय में डाल देने वाला है। वे 78 वर्ष के हैं और वे यहाँ लातविया जैसे अनेक स्थानों की प्रायः यात्रा करते हैं, और वे एक स्थान पर एक दिन के लिए ही ठहरते हैं। उनके कार्यक्रम बहुत कठोर और थका देने वाले होते हैं। मैंने संपर्क अधिकारी, अनुवादक आदि की हैसियत से परम पावन के साथ यात्राएं की हैं, और इसलिए मुझे जानकारी है कि उनका कार्यक्रम कितना व्यस्त होता है। यह आश्चर्यजनक है : दिन भर में कई व्याख्यान, फिर प्रैस वार्ताएं, फिर कई लोगों से निजी मुलाकातें करना ─ उन्हें खाना खाने के लिए बमुश्किल समय मिलता है। इसके अलावा, यात्रा के कारण बदलते समान-समय क्षेत्रों या इस प्रकार की दूसरी बातों से बेपरवाह वे हर दिन सुबह 3:30 बजे जाग जाते हैं और रोज़ाना सुबह लगभग चार घंटे गहन ध्यान साधना का अभ्यास करते हैं। उनकी ऊर्जा देखते ही बनती है और वे जिस किसी से भी मिलते हैं उसके प्रति सद्भाव और सहानुभूति का भाव रखते हैं। यह देख कर सचमुच हैरत होती है कि वे जिस किसी से भी मिलते हैं, उससे मिलकर वे बेहद प्रसन्न होते हैं, “एक और मानव मित्र से मुलाकात का अवसर, क्या बात है!”

प्रेम

बौद्ध धर्म में हम हृदय में उत्साह का संचार करने वाले प्रेम की चर्चा करते हैं जो किसी से मिलने पर हमारे हृदय को गर्मजोशी से भर देता है ─ उनसे मिलकर आप कितने खुश होते हैं और उनके कल्याण के लिए फिक्रमंद होते हैं। इस खूबी को आप किसी भी व्यक्ति के साथ दलाई लामा की मुलाकात में देख सकते हैं जब वे लोगों की भीड़ से होकर या और कहीं से गुज़र रहे होते हैं, तब वे जिस ढंग से लोगों की ओर देखते हैं और जिस ढंग से वे अपना पूरा ध्यान हर उस व्यक्ति पर केंद्रित करते हैं जिसे वे देख रहे होते हैं, वह देखते ही बनता है। उससे वास्तव में यह संदेश जाता है कि दूसरों के कल्याण में सचमुच उनकी रुचि है और वे सभी के कल्याण में समान रुचि रखते हैं। इसलिए उनका मानना है कि मानव मूल्यों को बढ़ावा देने, धर्मनिरपेक्ष नैतिकता को बढ़ावा देने आदि का यह विचार सभी के कल्याण के लिए सर्वाधिक हितकारी है। वे “केवल बौद्धों के लिए” जैसे संकीर्ण विचार नहीं रखते हैं। वे इस बात को लेकर बहुत फिक्रमंद हैं कि दुनिया भर में शिक्षा प्रणालियों में धर्मनिरपेक्षता के स्तर पर शिक्षाओं को किस प्रकार शामिल किया जाए ताकि बच्चे ईमानदारी, दया और दूसरे बुनियादी मानव मूल्यों के लाभों के बारे में सीख सकें जिससे कि विश्व का बहुत कल्याण हो सकता है।

धार्मिक सौहार्द

धार्मिक सौहार्द का जहाँ तक सम्बंध है, उन्होंने पाया है कि विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच के झगड़ों के कारण बड़ी कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। कितना अविश्वास है; भय है ─ और इन्हीं सब कारणों से समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उनका कहना है कि हमें शिक्षित होने की आवश्यकता है ─ वे शिक्षा पर बल देते हैं ─ सिर्फ धर्मनिरपेक्ष नैतिकता पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे को जानने-समझने की शिक्षा पर बल देते हैं। हम दरअसल अज्ञात के कारण भयभीत रहते हैं, और फिर हम इन दूसरे समूहों, दूसरे धर्मों के बारे में अपनी कल्पनाओं से भयभीत रहते हैं। वे कहते हैं कि धार्मिक नेताओं की जिन बैठकों में वे भाग लेने के लिए जाते हैं, वहाँ सभी एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं, एक दूसरे को देखकर मुस्करा भर देते हैं, एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और एक साथ मिलकर कुछ प्रार्थनाएं करते हैं या मौन रहकर ध्यान साधना करते हैं या ऐसा ही कुछ करते हैं। यह सब बहुत अच्छा है, लेकिन यह सब कोई विशेष लाभकारी नहीं है। सिर्फ यह कहना कि “हम सभी समान चीज़ों के बारे में बात कर रहे हैं। इसलिए हम सब एक हैं” और हर समय समानताओं की बात करते रहना, उससे भी एक-दूसरे को जानने-समझने में कोई खास मदद नहीं मिलती है।

इसी वर्ष जून में परम पावन ने सूफ़ी मत की मुस्लिम परम्परा के कुछ सूफ़ी विद्वानों से मुलाकात की थी, और उस बैठक में परम पावन ने कहा था कि वे धार्मिक परम्पराओं के बीच सिर्फ समानताओं के बारे में ही नहीं, बल्कि भिन्नताओं के बारे में जानकारी हासिल करने के इच्छुक हैं। उन्होंने कहा कि हमें आपसी भिन्नताओं को लेकर लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इन भिन्नताओं से हम एक-दूसरे के बारे में कुछ न कुछ सीख सकते हैं जो सम्भवतः आत्मसुधार के हमारे प्रयासों में हमारी मदद कर सकें। वे कहते हैं कि सभी धर्मों का एक ही लक्ष्य है, कि उस धर्म को मानने वाले अनुयायी अधिक सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें। यह लक्ष्य निश्चित तौर पर समान है, लेकिन इसकी प्राप्ति के तरीके अलग-अलग होंगे, और ऐसा होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि लोग एक-दूसरे से भिन्न हैं।

उनका कहना है, “यदि हम सभी अपने-अपने अनुयायियों को प्रेम और दया आदि के भावों को विकसित करने की शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं, तो उसके लिए क्या विधि अपनाई जाए? हम कौन सा तरीका अपनाएं? यह एक चीज़ है जो हम आपसे सीख सकते हैं। इन भिन्नताओं को देखिए और सीखने के अवसरों के रूप में इन भिन्नताओं का सम्मान कीजिए। प्रत्येक धर्म के बड़े-बड़े साधकों की बैठक बुलाइए जहाँ वे अपने अनुभव बाँट सकें, बड़ी-बड़ी सार्वजनिक सभाओं में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ बैठकें करें ताकि हम साधकों के स्तर पर गम्भीरतापूर्वक विचार-विनिमय कर सकें। ऐसा करना बहुत उपयोगी रहेगा।“

विज्ञान

देखिए, सभी के हित के लिए कार्य करना उनकी प्रमुख प्रतिबद्धता है। बेशक तिब्बती लोगों के प्रति उनका विशिष्ट उत्तरदायित्व है, तिब्बती बौद्ध परम्पराओं में उनका विशिष्ट उत्तरदायित्व है, लेकिन यह उनका एकमात्र सरोकार नहीं है। विज्ञान के प्रति उनके दृष्टिकोण से यह बात स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। बचपन से ही विज्ञान, मशीनों और उनकी कार्यप्रणाली में उनकी बेहद दिलचस्पी रही है। कितने ही वर्षों से, और निश्चित तौर पर अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों से वे वैज्ञानिकों के साथ मुलाकातें करते रहे हैं, और उनमें वैज्ञानिकों से सीखने की ललक है।

बौद्ध धर्म के एक बुनियादी सिद्धांत के अनुसार जीवन में हमारी समस्याओं का कारण यह है कि हम यथार्थवादी नहीं हैं, हमें सही बोध नहीं है, हम वास्तविकता को नहीं देख पाते हैं, और इसलिए हम अनेक प्रकार की कल्पनाएं कर लेते हैं। मुख्य उद्देश्य यह है कि हम यथार्थवादी बनें, जिसके परिणामस्वरूप करुणा का भाव उत्पन्न होता है, क्योंकि यदि व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो हम सभी को एक-दूसरे के साथ मिलकर रहना है, और यदि हमें मिलजुल कर रहना है ─ इस ग्रह के सभी जीवों के साथ मिलकर रहना है ─ तो हमें एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठाना होगा। यही बुनियादी यथार्थवादिता है।

वे कहते हैं कि यदि वैज्ञानिक कुछ ऐसा सिद्ध करके दिखा सकते हैं जो बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का खण्डन करता हो, उदाहरण के लिए ब्रह्माण्ड का विवरण, किस प्रकार ब्रह्माण्ड की रचना हुई, आदि, तो वे उसे बौद्ध शिक्षाओं से हटाने के लिए एकदम तैयार हैं। मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, उसके अंदर होने वाली सभी रासायनिक क्रियाएं, उस कार्यप्रणाली को संचालित करने वाले मस्तिष्क के विभिन्न भागों आदि के बारे में पश्चिम जगत की वैज्ञानिक जानकारी बौद्ध धर्म के ज्ञान में वृद्धि करने का अच्छा साधन हो सकती है। इसमें परस्पर कोई विरोध नहीं है।

इसी प्रकार बौद्ध धर्म के पास भी बहुत सा ऐसा ज्ञान है जो वह वैज्ञानिकों के साथ बाँट सकता है। यह ज्ञान बौद्ध विज्ञान, बौद्ध ज्ञान, और बौद्ध दर्शन की श्रेणियों में बंटा हुआ है। उदाहरण के लिए मनोभावों का विस्तृत खाका ─ मनोभावों की पूरी आंतरिक प्रक्रिया किस प्रकार संचालित होती है, और किस प्रकार उन पर नियंत्रण किया जाए ─ बौद्ध विश्लेषण में इन बातों को बड़े वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पश्चिम जगत के वैज्ञानिकों के लिए भी यह विश्लेषण बहुत मददगार साबित हो सकता है। उन्होंने मठों में विज्ञान के अध्ययन की व्यवस्था की है, और इस विषय को भिक्षुओं और भिक्षुणियों की पाठ्यचर्या में शामिल किया है। उन्होंने विज्ञान के सभी विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित पाठ्यपुस्तकों को अंग्रेज़ी से तिब्बती भाषा में अनुवाद किए जाने की व्यवस्था की है। इस प्रकार विश्व के एक प्रमुख धर्म के मुखिया के नाते उनका दृष्टिकोण बहुत उदार और व्यापक है, और वे इस दिशा में बहुत ईमानदारी से प्रयास कर रहे है। उनके द्वारा की गई कार्रवाइयों और उनके द्वारा उठाए गए कदमों से यह बात स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।

अन्य परम्पराओं के साथ संवाद

परम पावन की इच्छा है कि इस्लामी जगत के साथ संवाद कायम किया जाए। इसलिए वे प्रोत्साहन और आर्थिक संरक्षण देते रहे हैं कि बुनियादी बौद्ध शिक्षाओं और आधारभूत मानव मूल्यों, नीतिशास्त्र आदि के विषय से सम्बंधित उनके संदेश संबंधी सामान्य सामग्री का मैं एक अभिलेख तैयार करूँ जिसका इस्लामी भाषा में अनुवाद किया जाए, और हम इस कार्य को कर रहे हैं। इस्लाम की बुरी छवि प्रस्तुत करने के लिए कितना कुछ किया जाता है, लेकिन यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्हें खतरा मान कर अलग-थलग करने के बजाए उन्हें भी इस दुनिया के वासियों के साथ शुमार किया जाना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि हम उन्हें बौद्ध मान्यताओं के बारे में कुछ जानकारी दें ─ निःसंदेह हम उन्हें धर्मांतरित करने आदि का प्रयास न करें ─ लेकिन उन्हें बुनियादी जानकारी दें और साथ ही हम उनके बारे में भी जानकारी हासिल कर सकते हैं। शिक्षा : आपसी समझ-बूझ बढ़ाने का यही मार्ग है। आपसी समझ-बूझ से विश्वास बढ़ता है और मित्रता विकसित होती है।

खुद बौद्ध धर्म में ही जहाँ एक ओर भारत से आई बौद्ध धर्म की तथाकथित “महायान” परम्परा है तो दूसरी ओर थेरवादी परम्पराएं हैं जो दक्षिण-पूर्व एशिया में प्रचलति हैं। दुर्भाग्य से दोनों ही परम्पराओं को एक-दूसरे की बहुत कम जानकारी है। परम पावन, मेरी एक मित्र, जो एक अमेरिकी बौद्ध भिक्षुणी हैं, को इस विषय पर एक विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए नियुक्त कर रहे हैं और आर्थिक संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। विभिन्न प्रक्रियाओं में से प्रत्येक प्रक्रिया महायान परम्परा में किस प्रकार सम्पादित की जाती है, थेरवाद परम्परा में किस प्रकार से सम्पादित की जाती है? और उनकी इच्छा है कि इस जानकारी का दक्षिण-पूर्व एशियाई भाषाओं में अनुवाद किया जाए। वे चाहते हैं कि जानकारी को साझा किया जाए; यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।

महिलाओं को दीक्षा दिया जाना

अब हम तिब्बतियों की मठीय परम्परा की विकास यात्रा को देखेंगे। भिक्षुणियों, पूर्ण दीक्षित भिक्षुणियों की परम्परा विभिन्न कारणों ─ मुख्यतः भौगोलिक कारणों ─ से तिब्बत तक नहीं पहुँच सकी। प्राचीन काल में भारतीय भिक्षुणियों के पूरे समूहों का पैदल तिब्बत तक की यात्रा करना एक बेहद कठिन कार्य था। इसलिए परम्परा का प्रसार नहीं हो सका, और इसलिए गुरु परम्परा टूट गई। गुरु परम्परा को आगे प्रेषित करने के लिए पूर्ण दीक्षा प्राप्त दस भिक्षुणियों के समूह की आवश्यकता होती है, और ऐसा हो नहीं सका।

यहाँ भी, दलाई लामा ने ऐसे अध्ययनों और परियोजनाओं को आर्थिक संरक्षण प्रदान किया है जो यह पता लगा सकें कि इस गुरु परम्परा को एक बार फिर कैसे शुरू किया जा सकता है ताकि तिब्बती परम्परा में पूर्ण दीक्षा प्राप्त करने की इच्छुक महिलाओं को ऐसा करने का अवसर मिल सके। आप देख सकते हैं कि दूसरों का खयाल रखने की उनकी प्रवृत्ति सिर्फ उनके शब्दों में ही नहीं, बल्कि आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन के रूप में और सुविधाएं उपलब्ध कराने के रूप में झलकती है ताकि उन सभी क्षेत्रों का विस्तार किया जा सके जो बड़ी संख्या में लोगों के लिए लाभदायक हो सकते हैं।

“मैं तो सिर्फ़ एक साधारण भिक्षु हूँ”

मैं मानता हूँ कि परम पावन का सबसे बड़ा गुण जो उन्हें दूसरों का चहेता बनाता है वह यह है कि वे बड़े ही व्यावहारिक और सादगीपूर्ण हैं, आडंबर और घमंड का उनमें नामो-निशान तक नहीं है। वे हमेशा कहा करते हैं, “मैं तो सिर्फ़ एक साधारण भिक्षु हूँ। मैं भी आपके जैसा सामान्य मनुष्य हूँ।“ जब भी वे किसी से मिलते हैं तो वे कहते हैं, “मैं जब भी किसी व्यक्ति से मिलता हूँ तो मैं उस व्यक्ति को भी अपने जैसा मनुष्य ही मानता हूँ। इस प्रकार हमारा संवाद एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ संवाद होता है, दलाई लामा और किसी सामान्य व्यक्ति के बीच का संवाद नहीं। न ही यह मुलाकात किसी तिब्बती की किसी विदेशी के साथ मुलाकात होती है। गौण भिन्नताओं के आधार पर नहीं, बल्कि मनुष्य की मनुष्य के साथ मुलाकात के आधारभूत स्तर पर।“
वे लोगों के मन की ऐसी कल्पनाओं के भ्रम को तुरन्त दूर कर देना चाहते हैं कि वे किसी प्रकार की ईश्वरीय शक्तियों के स्वामी हैं, कोई राजा हैं, या उनके पास कोई जादुई शक्तियाँ हैं, या वे कोई देवता हैं। वे बड़ी-बड़ी सभाओं में शामिल होते हैं ─ वे हमेशा दसियों हज़ार लोगों की बड़ी-बड़ी सभाओं को सम्बोधित करते हैं ─ और वहाँ वे पूरी तरह तनाव मुक्त होते हैं, पूरी तरह निश्चिन्त। उनके व्यवहार में बिल्कुल भी संकोच नहीं होता है। यदि उन्हें खुजली अनुभव होती है, तो वे खुजलाते हैं, किसी भी सामान्य मनुष्य की तरह। वे किसी तरह का दिखावा नहीं करते हैं। यदि वे किसी देश के राष्ट्रपति से मिलने जा रहे हों, और यदि उन्होंने रबड़ के शावर सैंडल पहन रखे हों, तो वे उन्हें ही पहन कर जाएंगे। वे न तो किसी को प्रभावित करना चाहते हैं और न ही किसी पर अपना प्रभाव जमाने का प्रयास करते हैं; वे वही पहनेंगे जो वे पहनते हैं।

विनोदप्रियता

उनकी हर बात में हास-परिहास होता है। यह सचमुच बड़ी हैरत की बात है कि वे बातों को विनोदपूर्ण ढंग से कुछ इस तरह कह पाते हैं कि... हमें कहना पड़ता है कि “वे अपनी बात कह जाते हैं और किसी को बुरा नहीं लगता!” यह बड़े कमाल की बात है। एक बार वे किसी जगह व्याख्यान दे रहे थे और वहाँ उनके बैठने के लिए दिया गया आसन बहुत बेआराम था; इसलिए व्याख्यान खत्म होने के बाद उन्होंने आयोजकों ─ और श्रोताओं के रूप में मौजूद सभी लोगों से भी ─ कहा कि सभी व्यवस्थाएं आदि बहुत अच्छी हैं, लेकिन अगली बार मेरे लिए कृपया बेहतर आसन की व्यवस्था करें, यह कुर्सी तो बहुत ही तकलीफदेह थी! लेकिन उन्होंने इस बात को इतने हल्के और प्रेम भरे अंदाज़ में कहा कि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति हँस दिया और बात खत्म हो गई। किसी ने इस बात का बुरा नहीं माना। इसी तरह वे लोगों को डपट भी देते हैं, जो कि एक अद्भुत बात है।

वाक्लाव हावेल से मुलाकात

एक बार जब परम पावन को वाक्लाव हावेल की ओर से निमंत्रण मिला तब मैं उनके साथ था। मुझे याद नहीं कि हावेल उस समय चेक गणराज्य के प्रधानमंत्री थे या राष्ट्रपति थे। परम पावन दूसरे व्यक्ति थे जिन्हें उन्होंने आमंत्रित किया था, फ्रैंक ज़ाप्पा, जो आप जानते हैं एक रॉकस्टार थे, आमंत्रित किए जाने वाले पहले व्यक्ति थे; किन्तु दलाई लामा उनसे निमंत्रण पाने वाले दूसरे व्यक्ति थे। हावेल चाहते थे कि परम पावन उन्हें और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को ध्यान साधना सिखाएं क्योंकि उनका कहना था कि, “हमें कोई अनुभव नहीं है; हमें नहीं मालूम कि सरकार किस तरह चलाई जानी चाहिए और हम सभी मानसिक तौर पर बहुत थक चुके हैं और हमें नींद भी नहीं आती। क्या आप कृपा करके हमें सिखाएंगे कि हम अपने चित्त को किस प्रकार शांत रखें? नहीं तो हम कभी भी कामयाब नहीं हो पाएंगे, हमें सरकार चलानी है, और देश नया-नया है।“

वाक्लाव हावेल एकदम ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति थे, बिल्कुल सहज। उन्होंने परम पावन को और अपने मंत्रियों को ग्रीष्म प्रासाद में आने के लिए कहा ─ मैं नहीं कह सकता कि आप उसे क्या नाम देंगे, लेकिन यह एक प्रकार की एकांत विश्रामस्थल, प्राग शहर से बाहर स्थित एक प्रकार का दुर्ग या गढ़। वे स्वयं यहाँ पहले कभी नहीं आए थे। यह एक बहुत बड़ी इमारत थी और हर कोई उसके भवनों और दालानों में भटक जाता था क्योंकि किसी को भी इस जगह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने दलाई लामा से कहा, “यह जगह साम्यवादी नेताओं का वेश्यालय हुआ करती थी।“ दलाई लामा से बात करते समय न तो इस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया जाता है और न ही ऐसी बातें कही जाती हैं, लेकिन इस लिहाज़ से वे बड़े ही सहज व्यक्ति थे। फिर वहाँ जो घटित हुआ वह कुछ इस प्रकार था कि दलाई लामा सहित सभी लोग एक बड़े से कक्ष में व्यायाम की पोशाक पहन कर फर्श पर बैठे ─ दलाई लामा ने व्यायाम की पोशाक नहीं पहनी थी ─ लेकिन हावेल और उनके सभी मंत्रियों ने व्यायाम की पोशाक पहन रखी थी, और दलाई लामा ने उन्हें चित्त को शांत करने में सहायक प्राणायाम और ऊर्जा की ध्यान साधना सम्बंधी कुछ बुनियादी बातें सिखाईं।

सामान्यतया परम पावन रात के समय भोजन नहीं करते हैं, वे शाम को भोजन न करने की अपनी भिक्षु जीवन की प्रतिज्ञाओं का कड़ाई से पालन करते हैं, लेकिन उनका रवैया बड़ा लचीला है और इसलिए जब हावेल ने उनके लिए अपने ग्रीष्म प्रासाद में रात्रि भोज की व्यवस्था की तो परम पावन उनके साथ भोजन करने के लिए राज़ी हो गए। उन्होंने वहाँ मुझे भी मेज़ की एक ओर एक प्रकार के जीवंत शब्दकोष की हैसियत से बिठाया। वहाँ चर्चा अंग्रेज़ी भाषा में हुई, लेकिन उस चर्चा के दौरान एक सबसे खास बात यह रही कि दलाई लामा वाक्लाव हावेल को डपट रहे थे! वाक्लाव हावेल लगातार धूम्रपान करने के आदी थे और वे खाने की मेज़ पर बैठे धूम्रपान कर रहे थे और दलाई लामा उनके बराबर में बैठे थे, मेरा मतलब है कि ऐसी स्थिति में धूम्रपान करने की मनाही होती है। वह व्यक्ति एक देश का राष्ट्रपति था, लेकिन परम पावन इससे बेपरवाह उसे डपट रहे थे, “आप बहुत अधिक धूम्रपान करते हैं, इससे आपको कैंसर हो सकता है, आप बीमार हो सकते हैं, और इसलिए आपको अपनी इस आदत को कम करना होगा।“ मैंने महसूस किया कि ऐसा करके परन पावन ने दरअसल बहुत बड़ी कृपा की थी। दरअसल बाद में वाक्लाव हावेल को कैंसर हो ही गया। मैंने इस घटना का उल्लेख केवल यह बताने के लिए किया है कि परम पावन को इस बात की सबसे अधिक फिक्र रहती है कि कौन सी बात दूसरों के हित में रहेगी। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचेंगे।

बुद्धिमत्ता और स्मरणशक्ति

और इससे भी बढ़कर, मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि मैंने उनसे अधिक बुद्धिमान व्यक्ति नहीं देखा है। उनकी स्मरण शक्ति ऐसी विलक्षण है कि एक बार देखी हुई चीज़ को वे भूलते नहीं हैं। जब वे उपदेश देते हैं तब वे सभी परम्पराओं के सभी विद्वानों की बौद्ध शिक्षाओं पर अधिकारपूर्वक चर्चा करते हैं। वे किसी भी ग्रंथ से उद्धरण दे सकते हैं। तिब्बती साधक अपने शिक्षण-प्रशिक्षण के दौरान अध्ययन किए जाने वाले सभी प्रमुख ग्रंथों को कंठस्थ कर लेते हैं। अधिकांश लोग हज़ारों पृष्ठों वाले ग्रंथों को कंठस्थ कर लेते हैं, लेकिन दलाई लामा ─ यकीन करना कठिन लगता है कि उन्होंने सभी भाष्यों को कंठस्थ कर रखा है। जब वे उपदेश दे रहे होते हैं तब वे कोई बात किसी एक ग्रंथ से उद्धृत करते हैं तो कोई बात किसी दूसरे ग्रंथ से उद्धृत करते हैं, और यह सिलसिला चलता चला जाता है; ऐसा कर पाना बड़ा कठिन कार्य है। यदि आपने कोई ग्रंथ याद कर रखा हो तो अधिकांश लोगों के मामले में आपको उस पूरे पाठ को बोल कर दोहराना पड़ता है और तभी आप उसे याद रख पाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता कि आपको उस ग्रंथ के बीच में कहीं से कोई एक शब्द या कुछ शब्द बता दिए जाएं और फिर आप उसके बाद आने वाले अंश का बोल कर सुना सकें। दलाई लामा की विलक्षण स्मरण शक्ति ऐसा करने की क्षमता रखती है। निःसंदेह यह असाधारण बुद्धिमत्ता की पहचान है: आप अलग-अलग चीजों को एक साथ व्यवस्थित कर पाते हैं, उन विभिन्न चीज़ों के परस्पर संबंधों के पैटर्न को समझ पाते हैं। आइंस्टाइन जैसे लोग e = mc2 जैसे समीकरणों को कैसे समझ पाते हैं? ऐसा वे सभी चीजों को एक साथ रख कर उनके पैटर्न को समझ कर कर पाते हैं। दलाई लामा इस कार्य को तिब्बती ज्ञान और साहित्य की विपुल राशि की जानकारी के कारण कर पाते हैं।

ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ चीज़ों को ही एक बार देख कर याद रख पाते हों, वे लोगों को भी एक बार देखने के बाद नहीं भूलते हैं। मैंने इसके प्रमाण देखे हैं। वह सब अविश्वसनीय लगता है। जिन लोगों से वे मिल चुके हों, उन्हें वे याद रखते हैं। मैं उनके पास मौजूद था जब एक वृद्ध भिक्षु उनसे मिलने के लिए तिब्बत से धर्मशाला आए थे। परम पावन उन्हें देखते ही बोल पड़े, “अरे! मैं आपको जानता हूँ। तीस साल पहले जब मैं भारत आ रहा था तब हम लोग आपके मठ में ठहरे थे और वहाँ एक आयोजन किया गया था, और वहाँ आपने चढ़ावे की चीज़ों की थाली उठा रखी थी। मुझे याद है कि पूरी धर्मक्रिया के दौरान थाली को उठाए रखने में आपको कितनी तकलीफ हो रही थी। क्या आपको याद है?” तीस साल बाद वह भिक्षु परम पावन के समक्ष खड़ा था, और उन्होंने उसे पहचान लिया, उन्हें वह याद रहा। यह अविश्वसनीय है। मेरे मुख्य शिक्षक सरकाँग रिंपोशे परम पावन के शिक्षकों में से एक थे, और वे बताते थे कि बालक के रूप में परम पावन को जब भी कोई बात सिखाई जाती थी, जब वे स्वयं उन्हें कुछ सिखाते थे या दूसरे शिक्षक उन्हें कुछ सिखाते थे तो उन्हें कोई भी बात सिर्फ एक बार ही बतानी पड़ती थी, कभी उन्हें उस बात को दोबारा सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। परम पावन सब कुछ समझ लेते थे और उसे याद रखते थे।

उपलब्धियाँ

वे हमारे युग के सबसे विलक्षण लोगों में से एक हैं, और उनकी प्रासंगिकता क्या है? उनकी प्रासंगिकता इस बात में निहित है: देखिए एक मनुष्य के तौर पर क्या कुछ हासिल किया गया है। जैसाकि वे स्वयं बताते हैं, उन्होंने अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कड़ी मेहनत की और हम सब भी वैसा कर सकते हैं। अब विचार कीजिए कि वे विभिन्न समस्याओं को कैसे हल करते हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक बिलियन से अधिक लोगों का सबसे बड़ा दुश्मन समझा जाना कैसा लगता है? परम पावन इसे सुनकर बस हँस देते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह सच नहीं है, उनके सिर पर कोई सींग नहीं उगे हैं। लेकिन यदि हमें सबसे बड़ा लोक शत्रु कहा जाए, भिक्षु के भेष में दानव कहा जाए तो हमारी क्या प्रतिक्रिया होगी?

वे इस सब से उदास नहीं होते, दुखी नहीं होते। मैंने उन्हें कहते सुना है कि उन्होंने कभी भी अपने को उदास नहीं पाया है! उनके लिए यह समझ पाना बड़ा कठिन है कि उदासी का क्या मतलब होता है। यह बड़ी दिलचस्प बात है, है न? यह ऐसा है जैसे वे कह रहे हों ─ और जब उन्होंने यह बात कही तब मैं वहाँ मौजूद था, जब उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने कभी लोगों में हीनता बोध या आत्म-घृणा की बात नहीं सुनी है। उनके सामने कभी ऐसी स्थिति नहीं आई। निश्चित तौर पर स्वयं उन्हें कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ और न ही उन्होंने कभी इसके बारे में सुना है।

वे आशावादी, यथार्थवादी सोच बरकरार रखते हैं, और स्थितियों की वास्तविकता का सामना करते हैं। दुनिया में जो वर्तमान स्थितियाँ, समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, उनके बारे में वे कहते हैं, “दुनिया की समस्याएं मनुष्यों की बनाई हुई हैं और उनका समाधान भी मनुष्य ही कर सकते हैं,” और वे स्वयं इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत हैं। वे आधारभूत मानव मूल्यों का संवर्धन कर रहे हैं, बच्चों की शिक्षा में नैतिकता के बोध को शामिल किए जाने के लिए प्रयासरत हैं, विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के बारे में जानकारी हासिल करके, एक-दूसरे के बारे में सीख कर, ताकि किसी को दूसरे के प्रति भय न हो, धार्मिक सौहार्द स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। वे सम्पूर्ण जगत, प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से प्रयासरत हैं, और साथ ही वे पूरी नम्रता बरतते हुए, पूर्ण सहजता से साथ, विशिष्ट होने के अहंकार से पूरी तरह मुक्त सादगीपूर्ण रवैया अपनाते हुए इस कार्य को कर रहे हैं। यही गुण उन्हें लोगों का चहेता बनाता है। और इससे भी बढ़कर उनकी वह विनोदप्रियता और अविश्वसनीय ऊर्जा ─ अद्भुत है।

उनके सचिव और सलाहकार उनसे हमेशा यही कहते हैं, “परम पावन, थोड़ा आराम कीजिए। इतनी अधिक यात्रा मत कीजिए।“ परम पावन यात्रा करते हैं और उनका यात्रा कार्यक्रम अविश्वसनीय रूप से व्यस्त होता है: हर पल वे किसी न किसी से मुलाकात कर रहे होते हैं। सप्ताह या दस दिन तक वे विमान यात्रा करते हैं, और फिर वे विमान यात्रा करके भारत वापस लौट जाते हैं ─ और फिर या तो विमान से या फिर कार से यात्रा करते हैं ─ धर्मशाला तक कार की यात्रा बारह घंटे की होती है ─ और फिर वे वहाँ लगभग एक सप्ताह तक ठहरते हैं, और फिर अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यह सिलसिला अनवरत चलता है। इसीलिए वे लोग आग्रह करते हैं, “परम पावन, थोड़ा आराम कीजिए,” और परम पावन जवाब देते हैं, “नहीं।“ वे कहते हैं, “जब तक मुझमें ऐसा कर पाने की शक्ति है, मैं ऐसे ही यात्रा करना जारी रखूँगा, क्योंकि ऐसा करना दूसरों के लिए लाभदायक है।“

मेरे विचार से उनकी प्रासंगिकता इसलिए है कि वे हमारी आशा के स्रोत हैं। उन्होंने सचमुच बड़ी ईमानदारी से कार्य किया है और बहुत कड़ी मेहनत की है। जब वे इस विषय पर बात करते हैं कि मानव जाति की उन्नति किस प्रकार हो सकती है तो वे एकदम यथार्थ पर आधारित बात कहते हैं: शिक्षा, आपसी समझ-बूझ, और नैतिक आचरण के माध्यम से। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण है; यहाँ हम किसी प्रकार के चमत्कारिक उपायों की बात नहीं कर रहे हैं। जब वे हमारे देश, हमारे शहर, में पधारें तो निश्चित तौर पर यह एक अद्भुत अवसर होगा, और उपयोगी अवसर होगा जब हम परम पावन दलाई लामा के प्रत्यक्ष दर्शन का लाभ ले सकते हैं।

तो, अब आपके क्या प्रश्न हैं?

प्रश्न तथा उत्तर

प्रतिभागी : परम पावन कौन-कौन सी भाषाएं जानते या बोलते हैं?

अलेक्स : परम पावन अंग्रेज़ी भाषा बोलते हैं, जैसाकि वे कहा करते हैं कि उनकी अंग्रेज़ी टूटी-फूटी है, लेकिन वे अंग्रेज़ी बोलते हैं, और ज़ाहिर है कि वे अपनी तिब्बती भाषा भी बोलते हैं। वे थोड़ी-बहुत चीनी भाषा भी जानते हैं क्योंकि जिस जगह उनका जन्म हुआ वह स्थान एक बड़ी चीनी आबादी के नज़दीक है, और इसलिए छोटे बालक के रूप में उन्होंने थोड़ी-बहुत चीनी भाषा भी सीख ली, लेकिन वे उस भाषा के कुछ शब्द भर ही जानते हैं। मेरा ऐसा अनुमान है कि उन्होंने अब तक हिंदी के भी कुछ शब्द सीख लिए होंगे।
प्रतिभागी : तिब्बतियों के आध्यात्मिक नेता होने के नाते परम पावन अपने आध्यात्मिक दायित्वों के साथ-साथ शरणार्थियों के जीवन को व्यवस्थित करने जैसे व्यावहारिक कार्यों के बीच तालमेल कैसे बिठाते हैं?

अलेक्स : देखिए, मैं मानता हूँ कि एक बात तो यह है कि... जैसाकि आपने उल्लेख किया, उन्होंने न केवल बहुत अध्ययन किया है, बल्कि ध्यान साधना भी की है; इसके अलावा वे निर्वासित सरकार के प्रमुख भी थे, हालाँकि उन्होंने बड़े साहसपूर्वक और बड़ी सूझ-बूझ के साथ, बड़ी दूरदर्शिता के साथ उस पद का त्याग कर दिया और तिब्बत की निर्वासित सरकार में लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित की है। फिर भी, वे कई वर्षों तक शरणार्थियों को बसाने से सम्बंधित प्रयासों और कार्यक्रमों के प्रभारी थे, और उन्होंने विभिन्न संस्थाओं की स्थापना आदि का कार्य किया है। मैं समझता हूँ कि बेहद यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना उनकी रणनीति का मुख्य आधार रहा है। वे ऐसा हौआ खड़ा नहीं करते कि, “यह तो बहुत हुआ, मैं इसे नहीं कर सकता, यह असम्भव है।“ जैसे ही आप ऐसी स्थिति की कल्पना करने लगते हैं: “बेचारा मैं शायद इस काम को नहीं कर सकूँगा, यह मेरे बूते से बाहर है,” तो समझिए कि आप हार गए। जो काम आपको करना हो उसे सुव्यवस्थित ढंग से किए जाने की आवश्यकता होती है। उनकी बुद्धि असाधारण है और स्मरणशक्ति अविश्वसनीय, इसलिए वे किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के योग्य प्रमुख की तरह, जिसे सब बातों का ध्यान रखना पड़ता है, और जो अपनी बुद्धिमत्ता से यह तय कर पाता है कि विभिन्न लोगों को ज़िम्मेदारी कैसे सौंपी जाए और कार्य को कैसे सम्पादित किया जाए, अपने मार्गदर्शन में चलाई जा रही सभी परियोजनाओं को याद रख पाते हैं। वे काम को पूरा कर लेते हैं; उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है।

मैं अक्सर मज़ाक में कहा करता हूँ कि कालचक्र की व्यवस्था विभिन्न प्रकार के बड़े-बड़े कामों को कर पाने का प्रशिक्षण प्राप्त करने में बहुत सहायक है। कालचक्र मंडल में, यदि आप उसे थोड़ा समझते हैं, तो उसमें आप 722 रूपों का मानस दर्शन करते हैं। आप जानते हैं, दलाई लामा सम्भवतः 722 रूपों का दर्शन कर सकते हैं, मैं तो निश्चित तौर पर नहीं कर सकता, लेकिन इससे आपको सामान्य तौर पर अनुमान हो जाएगा कि आपके आस-पास समूहों में इतने सारे स्वरूप होते हैं और आपको ऐसा लगता है कि आपकी अपनी छवि इन सभी को घेर लेती है, पूरे दृश्य को ढँक लेती है। इनमें साल के 360 दिनों में से प्रत्येक दिन से सम्बंधित देवी-देवता होते हैं, जो समस्त ज्योतिष विन्यासों से जुड़े होते हैं, जो देह के विभिन्न पहलुओं और तंत्रों से जुड़े होते हैं, देवी-देवता जो सभी बातों को प्रभावित करते हैं। इतनी विस्तृत और जटिल प्रक्रिया से होते हुए अपने ऊपर ध्यान केन्द्रित करना होता है, और तभी कोई नया काम या नया मुद्दा उभर आता है, मंडल के किसी एक कोने में दस आकृतियों वाला कोई एक समूह हो सकता है; यह कोई बड़ी बात नहीं है। और फिर एक और समूह, फिर वहाँ एक और समूह। मैं इसे कर सकता हूँ क्योंकि मैं इस पूरी जटिल प्रक्रिया का अभ्यस्त हूँ और यह सब आपस में जुड़ा हुआ है और सब कुछ ठीक-ठाक चलता है; फिर आपको किसी बात का डर नहीं लगता, कोई नया कार्य जुड़ने से आप घबराते नहीं हैं। फिर आप किसी बात के लिए हाय-तौबा नहीं मचाते हैं।

यह सच है कि जीवन जटिलताओं से भरा है, और कुछ लोगों का जीवन दूसरे लोगों की तुलना में अधिक जटिल होता है, लेकिन हमारा जीवन जटिलताओं से भरा होता ही है। फिर आप जटिलताओं से घबराने के बजाए जटिलता को स्वीकार करने लगते हैं: जटिलता जितनी अधिक हो, उतना ही बेहतर है। मैं करके ही रहूँगा। इस सोच के साथ मैं स्वयं अपनी वैबसाइट पर 20 भाषाओं में काम को देख पाता हूँ। कोई मुश्किल नहीं है, आवश्यकता पड़ने पर मैं इससे भी ज़्यादा भाषाओं को संभाल सकता हूँ। एक और भाषा जोड़ दीजिए, क्या मुश्किल है? मैं इससे घबराता नहीं हूँ। दलाई लामा जैसी परियोजनाओं का काम संभालते हैं उनकी तुलना में यह तो छोटी सी परियोजना है। मैं समझता हूँ कि इस तरह इसे संभव बनाया जा सकता है। कोई शिकायत नहीं, कोई “बेचारा मैं” नहीं, कोई “यह नहीं हो सकता” नहीं, बस आप कर देते हैं। जैसा कि मेरी माँ कहा करती थीं, “सीधे काम की बात।“ बस कर डालो! कोई “इधर-उधर... क्या मैं इसे कर पाऊँगा?” नहीं और कोई फिक्र नहीं। बस कर डालिए!

प्रतिभागी : क्या आप कृपा करके बताएंगे कि दलाई लामा को परम पावन कह कर क्यों सम्बोधित किया जाता है, जबकि वे स्वयं ज़ोर देकर इस बात को कहते हैं कि वे तो एक सामान्य मनुष्य हैं?

अलेक्स : देखिए, दलाई लामा स्वयं अपने आप को परम पावन नहीं कहते हैं। मुझे नहीं मालूम कि अंग्रेज़ी भाषा में उनके लिए ‘हिज़ होलिनेस’ सम्बोधन की शुरुआत किसने की, लेकिन सम्भवतः इसे किसी ईसाई उपाधि से लिया गया होगा, और फिर यह अंग्रेज़ी में प्रचलित हो गया। लोग इसका प्रयोग एक सम्मानसूचक सम्बोधन के रूप में वैसे ही करते हैं जैसे किसी राजा के लिए “महामान्य” सम्बोधन का प्रयोग किया जाता है। तिब्बती भाषा में आध्यात्मिक गुरु के लिए अनेक सम्मानसूचक सम्बोधनों का प्रयोग किया जाता है, इसी प्रकार दलाई लामा के लिए भी विशेष सम्बोधनों का प्रयोग किया जाता है। परम पावन का अनुवाद क्या है? यह तो लोगों द्वारा अपनाई गई एक सामान्य परम्परा है और परम पावन लोगों को उनके लिए इस सम्बोधन का प्रयोग करने से रोक नहीं सकते हैं, लेकिन यह बात तय है कि वे इस बात को पसंद नहीं करते कि लोग किसी देवता के रूप में उनकी पूजा करें।

प्रतिभागी : आप तिब्बती भाषा जानते हैं, इसलिए सम्भवतः आप तिब्बती भाषा से कोई ऐसी अभिव्यक्ति सुझा सकते हैं जो अंग्रेज़ी भाषा के “हिज़ होलिनेस” की तुलना में अधिक उपयुक्त हो।

अलेक्स : उनकी मुख्य उपाधि “कुंदन” है जिसका अर्थ “परम सान्निध्य” होता है।

प्रतिभागी : परम सान्निध्य?

अलेक्स : जी हाँ। मैं नहीं जानता कि दूसरी भाषाओं में इसका अनुवाद किस प्रकार किया जाएगा; यह आसान नहीं है। आकृति का अर्थ है कि वे अवतार लेते हैं और सर्वोन्नत सत्वों के सभी सद्गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आपको ऐसा अनुभव होता है कि आप किसी सिद्धजन, किसी परम आकृति के सान्निध्य में हैं। मैंने इसके प्रयोग की शुरुआत करने का प्रयास किया, लेकिन किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई।
क्या आप कोई और प्रश्न पूछना चाहते हैं? ठीक है। फिर हम इस चर्चा को यहाँ समाप्त कर सकते हैं। यहाँ उपस्थित होने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, और आशा करता हूँ कि यह चर्चा आपके लिए उपयोगी रही होगी। धन्यवाद।