बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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बौद्ध धर्म के यथार्थवादी दृष्टिकोण के विषय पर दलाई लामा का चिन्तन: धर्मशाला में पश्चिम के पूर्व निवासियों के साथ वार्ताएं

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
धर्मशाला, भारत, 2-3 नवम्बर, 2010
स्यॉन जोंस तथा माइकल रिचर्ड्स द्वारा लिप्यंतरित
ल्यूक रॉबर्ट्स तथा अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा सम्पादित
[ स्पष्टीकरणों को वर्गाकार कोष्ठकों में बैंगनी रंग के अक्षरों में दर्शाया गया है]

भाग दो: पूर्व तथा पश्चिम का मेल

पूर्व का ज्ञान और पश्चिम का विज्ञान

जहाँ तक इस प्रश्न का सम्बंध है कि पूर्व और पश्चिम का मेल किन बातों को लेकर हो सकता है, मैं समझता हूँ कि लगभग तीस या चालीस वर्ष पहले किसी अवसर पर मैंने कहा था कि पूर्व का ज्ञान, मुख्यतः यहाँ भारत का ज्ञान ─ विशेष तौर पर मनोभावों और चित्त के अध्ययन सम्बंधी ज्ञान ─ बहुत विस्तृत है; और इसका कारण यह है कि यहाँ समाधि[तल्लीन एकाग्रता]और विपश्यना[असाधारण रूप से सूक्ष्मग्राही चित्त]की साधना के अभ्यास का प्रचलन है। ये साधनाएं धर्म या धर्मानुराग पर आधारित नहीं हैं; बल्कि इन साधनाओं का अभ्यास अपने चित्त को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। स्वाभाविक है कि समाधि और विपश्यना से सम्बंधित किसी भी शिक्षा में चित्त के बारे में व्याख्या शामिल होगी: हमारा चित्त कैसे काम करता है, मनोभाव किस प्रकार हमें प्रभावित करते हैं।

इसके अलावा बौद्ध धर्म में प्रज्ञा या ज्ञान [सविवेक बोध]की अवधारणा को माना जाता है और निःस्वार्थता या अनात्म के सिद्धान्त को बौद्ध धर्म के प्रमुख दृष्टिकोण के रूप में मान्यता दी जाती है। इस प्रकार अनात्म के सिद्धान्त पर बहस करने के लिए स्वाभाविक है कि अज्ञान और विरूपित दृष्टिकोण के विषय की व्यापक समझ का होना आवश्यक है। और विरूपित दृष्टिकोण का प्रतिसंतुलन केवल सही दृष्टिकोण से ही सम्भव है, प्रार्थना या केवल ध्यानसाधना से नहीं। इसके अलावा, तंत्रायन में मानसिक अवस्थाओं के विभिन्न स्तरों की चर्चा आती है ─ जाग्रत अवस्था, स्वप्नावस्था, गहन निद्रावस्था, या मूर्छावस्था। [ये सभी चित्त के विषय में पूर्व के ज्ञान के कुछ उदाहरण हैं।]

निःसंदेह पश्चिम जगत विज्ञान का दाता है। अधिकांश वैज्ञानिक यहूदी-ईसाई पृष्ठभूमि से आते हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर वे चित्त और मनोभावों आदि जैसी चीज़ों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते। यहूदी-ईसाई परम्परा में साधना का स्तर समान ही है [जैसाकि पूर्व के धर्मों में होता है] ─ करुणा, क्षमा, सहिष्णुता, और साथ ही साथ संतोष और आत्मानुशासन का अभ्यास। सभी प्रमुख धर्मों में ये बातें समान हैं। इन धर्मों में अन्तर इन आधारभूत मानव मूल्यों को बढ़ावा देने के स्तर पर होता है।

ऐसे भी धर्म हैं जो किसी सृष्टिकर्ता में आस्था पर आधारित हैं, जिनमें हिन्दू परम्पराएं [जो सृष्टिकर्ता को स्वीकार करती हैं] भी शामिल हैं; और चूँकि सब कुछ अन्ततोगत्वा सृष्टिकर्ता पर निर्भर होता है, इसलिए उन धर्मों में आस्था का होना ही पर्याप्त होता है। आप पूरी तरह ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं। इससे आत्म-केन्द्रित होने की प्रवृत्ति नियंत्रित होती है। किन्तु बौद्ध धर्म में सृष्टिकर्ता की अवधारणा नहीं है ─ इसके अलावा जैन धर्म में और सांख्य की एक शाखा में भी सृष्टिकर्ता की अवधारणा नहीं है ─ इसलिए आप अपने चित्त को नियंत्रित करने के लिए स्वयं प्रयत्न करते हैं। इन चीज़ों को पूजा-प्रार्थना के माध्यम से बदल पाना सम्भव नहीं है।

पिछले तीन या चार हज़ार वर्षों में धीरे-धीरे लोगों में धर्म के प्रति आस्था जाग्रत हुई। जब भी उनके सामने कोई मुसीबत या समस्या होती, तो वे प्रार्थना करते और सृष्टिकर्ता या ईश्वर से आस लगाते या फिर बुद्ध में अपनी आस्था व्यक्त करते। तिब्बती लोगों की भांति हम बुद्ध के प्रति आस्थावान तो रहे ─ लेकिन हम अपने मानवीय स्तर के आचरण के प्रति लापरवाह हो गए। यही वजह है कि हमने अपना देश तक गँवा दिया, नहीं क्या?

इस प्रकार पिछले कई हज़ार वर्षों से ─ शायद पिछले चार या पाँच हज़ार वर्षों से ─ लोगों ने ईश्वर को अपना अन्तिम आसरा और विश्वास माना है। लेकिन अब, पिछली दो शताब्दियों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है और उन्होंने हमारी कई आशाओं को पूरा करना शुरू कर दिया है। पिछले एक हज़ार वर्षों से हम धर्म पर पूरी तरह आश्रित थे, लेकिन अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी से हमें धर्म के बिना भी मूर्त परिणाम हासिल हो रहे हैं। लोग, जिनमें पूर्व के लोग भी शामिल हैं, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर भरोसा करने लगे हैं, सही भी है कि इतने सारे लोग इनकी ओर आकृष्ट हो रहे हैं।

लेकिन बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से बड़ी संख्या में लोग केवल भौतिक मूल्यों को महत्व दिए जाने की सीमाओं को अनुभव करने लगे हैं। भौतिक वस्तुएं हमें भौतिक सुख-साधन उपलब्ध कराती हैं, और इंद्रियानुभूत स्तर पर सचमुच एक प्रकार की संतुष्टि भी प्रदान करती हैं, किन्तु मानसिक स्तर पर कोई वास्तविक संतुष्टि नहीं प्रदान करतीं। यदि आप मानसिक के स्तर के अनुभवों की तुलना इंद्रियों के स्तर के अनुभवों के साथ करें, तो हम पाएंगे कि मानसिक स्तर के अनुभव कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। हम सभी ने यह अनुभव किया है कि जब हमारा चित्त प्रसन्न और शांत होता है, तो हमारी शारीरिक पीड़ा को कम किया जा सकता है। लेकिन जब हम गहन मानसिक पीड़ा में होते हैं, बहुत चिन्तित होते हैं, तो भौतिक सुख-साधन हमारी मानसिक पीड़ा को नियंत्रित या कम नहीं कर सकते हैं। इसलिए ज़ाहिर है कि हमारी मानसिक दशा कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

अब बड़ी संख्या में चिकित्सक और वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि हमारी मानसिक दशा हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। स्वस्थ चित्त का स्वस्थ शरीर से गहरा सम्बंध है। लेकिन दवाओं या शराब या नशीले द्रव्यों के उपयोग से चित्त को स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता है। स्वस्थ चित्त न तो इंजेक्शन लगाकर विकसित किया जा सकता है और न ही किसी सुपरमार्केट से खरीदा जा सकता है। स्वस्थ चित्त तो चित्त से ही विकसित किया जा सकता है ─ और कुछ हद तक धर्म या श्रद्धा से; बल्कि शायद नहीं। वास्तविक विश्वास तो अनुसंधान और अन्वेषण से ही उत्पन्न हो सकता है।

इसलिए मुझे लगता है कि पूर्व और पश्चिम के मिलन का विषय धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि चित्त के विज्ञान से उद्भूत है।

नालंदा की परम्परा के वैज्ञानिक पहलू

मैं पिछले तीस वर्षों से वैज्ञानिकों से मिलता रहा हूँ। शुरुआत में ─ मेरे विचार से चालीस वर्ष पहले ─ मैंने अपने कुछ मित्रों से इच्छा ज़ाहिर की थी कि मैं वैज्ञानिकों के साथ संवाद करना चाहता हूँ। एक अमेरिकी महिला ने मुझसे कहा था, “विज्ञान धर्म का हत्यारा है। आप सावधान रहिएगा।“ तब मुझे नालंदा की परम्परा का ख़याल आया। वे लोग शिक्षाओं की छानबीन और जाँच करते थे, और यदि उन्हें कोई अन्तर्विरोध दिखाई देता तो वे बुद्ध के शब्दों को ही ख़ारिज कर देते थे। स्वयं बुद्ध ने भी स्पष्ट कहा था: “मेरा कोई भी अनुयायी केवल श्रद्धावश मेरी शिक्षाओं को स्वीकार न करे, या भक्तिवश स्वीकार न करे, बल्कि पूरी छानबीन और जाँच-परख करके ही स्वीकार करे।“ ये महान आचार्य स्वयं बुद्ध के शब्दों की भी जाँच किया करते थे। इसीलिए तिब्बती भाषा में दो शब्दों ड्रेंग्डॉन और न्गेडॉन का प्रयोग किया जाता है ─ अर्थात अनन्तिम शिक्षाएं [व्याख्या-सापेक्ष शिक्षाएं]और निश्चायक शिक्षाएं। इस प्रकार मैंने जाना कि नालंदा परम्परा का बल आस्था की तुलना में अन्वेषण पर अधिक था।

बौद्ध मत की सम्पूर्ण व्यवस्था वास्तविकता, वर्तमान समय की वास्तविकता पर आधारित है। दोनों प्रकार के सत्य [सतही और गहनतम]वास्तविकता के स्पष्टीकरण हैं। फिर इस वास्तविकता के आधार पर हम सही और त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोणों के बीच भेद कर सकते हैं। और फिर उस वास्तविकता के आधार पर हम त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण और सही दृष्टिकोण के बीच भेद कर सकते हैं। कोई दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण है, यह सिद्ध करने के लिए हमें वास्तविकता का अन्वेषण करना होगा। प्रतीति और वास्तविकता के बीच हमेशा अन्तर होता है। बहुत सी गलत धारणाएं प्रतीति पर आधारित होती हैं, और अधिकांश विनाशकारी मनोभाव गलत धारणाओं से उत्पन्न होते हैं। इसी आधार पर हम चार आर्य सत्यों की बात करते हैं। बुद्ध की बात को मानते हुए यदि हम यह कह दें कि “ये चार आर्य सत्य तो बुद्ध के बताए हुए हैं,” तो यह गलत होगा। हमें उन चारों आर्य सत्यों को प्रमाणित करना होगा। हमें उन चार आर्य सत्यों की वास्तविक व्यवस्था या संरचना को समझना होगा।

इस प्रकार मैंने जाना कि विज्ञान भी वास्तविकता को, सत्य को खोजने का प्रयत्न कर रहा है, लेकिन एक अलग क्षेत्र में। बौद्ध जन भी सत्य की खोज कर रहे हैं। मैं समझता हूँ कि दोनों ही सच्चे अर्थ में डेंग ज़ियाओपिंग की इस प्रसिद्ध उक्ति पर अमल कर रहे हैं: “तथ्यों से सत्य का पता लगाओ।“ दोनों ही परम्पराएं अन्वेषण के माध्यम से सत्य को, तथ्यों को खोजने का यत्न करती हैं। इसलिए मैं मानता हूँ कि इसमें कहीं कोई अन्तर्विरोध नहीं है। अन्वेषण करने के वाला वैज्ञानिक नज़रिया चीजों को संशय की दृष्टि से देखता है। बौद्ध धर्म भी बिल्कुल यही करता है।

बौद्ध विज्ञान, बौद्ध दर्शन, और बौद्ध धर्म के बीच भेद करना

वैज्ञानिकों के साथ हमारी बैठकों और सम्मेलनों के बाद कुछ लोगों ने “विज्ञान और बौद्ध धर्म का मेल” जैसे शब्दों का प्रयोग किया है, किन्तु यह प्रयोग गलत है। हम वैज्ञानिकों के साथ बौद्ध धर्म के विषय में चर्चा नहीं कर रहे हैं, सिर्फ़ बौद्ध विज्ञान के विषय पर चर्चा की जा रही है। इसलिए मैंने बौद्ध विज्ञान [बौद्ध साहित्य में वर्णित विज्ञान], बौद्ध साहित्य में वर्णित दर्शन, और बौद्ध धर्म के बीच अन्तर किया है। इस प्रकार बौद्ध धर्म बौद्धों के लिए है; बौद्ध विज्ञान और बौद्ध दर्शन की प्रकृति सार्वभौमिक है।

मैं मानता हूँ कि एक अर्थ में पूर्व और पश्चिम का मिलन पहले ही हो चुका है। पश्चिम के बड़े-बड़े वैज्ञानिक अब चित्त के प्रशिक्षण पर बहुत ध्यान देते हैं, क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण है और, चाहे व्यक्ति हो, परिवार हो या व्यक्ति, हमारे स्वास्थ्य की दृष्टि से यह बहुत प्रासंगिक है। विस्कॉन्सिन विश्विविद्यालय में रिचर्ड डेविडसन के नेतृत्व में इसी प्रकार का शोध कार्य किया जा रहा है। उन्होंने चित्त के प्रशिक्षण के लिए कुछ विशेष कार्यक्रम किए हैं; स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में भी पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अध्ययन किए गए हैं। मैंने कुछ समय पहले इन स्थानों का दौरा किया था। उन्होंने अपने प्रयोगों के माध्यम से बहुत उपयोगी शोध कार्य किया है। इसके अलावा एमरी विश्वविद्यालय में भी शोध कार्य किया गया है। लेकिन इस शोध का धर्म से कोई सम्बंध नहीं है। इसका उद्देश्य तो बौद्ध ग्रंथों से प्राप्त जानकारी को चित्त को प्रशिक्षित करने के वैज्ञानिक तरीके के रूप में प्रयोग करना है, ताकि हमारे चित्त के कुछ जन्मजात सद्गुणों [जैसे करुणा और प्रेम]को और सुदृढ़ किया जा सके।

इस प्रकार, मैं मानता हूँ कि पूर्व और पश्चिम के मेल का यही सही आधार है। यही मेरी मान्यता है। धर्म नहीं, केवल विज्ञान।