बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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धर्म से परे नैतिक आचरण

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
फ्रिबर्ग, स्विट्ज़रलैंड, अप्रैल 2013
अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा अल्पतः सम्पादित

गौण असमानताओं पर बल देने से होने वाले नुकसान

प्रिय भाइयो और बहनो, आप सभी से बात करने का यह अवसर पा कर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। पहली बात तो यह कि मैं जब भी व्याख्यान देता हूँ तो लोगों से कहता हूँ कि आप स्वयं को केवल एक मनुष्य के रूप में देखें। कहने का तात्पर्य यह है कि आप यह न सोचें कि “मैं स्विस हूँ”, “मैं इटैलियन हूँ”, या “मैं फ्रैंच हूँ।“ मेरे भाषान्तरकार यह न सोचें कि वह फ्रैंच हैं! मुझे भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं तिब्बती हूँ। इससे भी बढ़कर मुझे यह भी नहीं सोचना चाहिए कि मैं बौद्ध हूँ, क्योंकि जैसा कि मैं अपने व्याख्यानों में अक्सर कहा करता हूँ, एक सुखी, चिन्ता-मुक्त जीवन जीने का आधार यह है कि हम स्वयं को मनुष्य मात्र समझें।

हम सात बिलियन मनुष्यों में से प्रत्येक सुखी जीवन चाहता है, और हममें से प्रत्येक को इस लक्ष्य को हासिल करने का पूरा अधिकार है। यदि हम “मैं तिब्बती हूँ” जैसे कम महत्व वाली भिन्नताओं पर अधिक बल देते हैं तो उससे मैं तिब्बत से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता हूँ। इसी प्रकार “मैं बौद्ध हूँ” कहने से दूसरे तिब्बतियों के साथ मेरी नज़दीकी तो दिखाई देती है, लेकिन स्वतः ही इससे दूसरे धर्मों के साथ एक छोटी सी दूरी कायम हो जाती है।

इस प्रकार का दृष्टिकोण ही दरअसल बहुत सारी समस्याओं और मानव जाति इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और इस इक्कीसवीं शताब्दी में जारी हिंसा जैसी समस्याओं का मूल कारण है। यदि आप दूसरों को अपने ही समान मनुष्य मान कर देखें तो फिर हिंसा कभी नहीं होती है। फिर आपस में मार-काट करने का कोई कारण नहीं है; लेकिन जब हम मानव जाति के एक होने के सिद्धान्त को भुला देते हैं और “मेरा देश” और “उनका देश”, “मेरा धर्म” और “उनका धर्म” जैसी महत्वहीन असमानताओं पर ध्यान देने लगते हैं तो हम फर्क करने लगते हैं और अपने लोगों और अपने धर्म के अनुयायियों के हितों को लेकर ज़्यादा फिक्रमन्द रहते हैं। ऐसी स्थिति में हम दूसरों के अधिकारों की अवहेलना करते हैं और दूसरों के जीवन तक का सम्मान नहीं करते हैं। आज भी हमारे सामने जो समस्याएं हैं, उनमें से बहुत सी समस्याएं गौण स्तर की असमानताओं पर आवश्यकता से अधिक ज़ोर और महत्व दिए जाने के कारण उत्पन्न होती हैं।

इसलिए इस समस्या का एकमात्र समाधान यह है कि हम तर्कसंगत ढंग से विचार करते हुए सीमा-बंधनों या अवरोधों के बिना स्वयं को केवल मनुष्य समझें। उदाहरण के लिए यदि मैं व्याख्यान देते समय स्वयं को तिब्बती बौद्ध मानता हूँ या इससे भी बढ़कर यदि मैं स्वयं को “परम पावन दलाई लामा” समझता हूँ तो मेरे और श्रोताओं के बीच एक प्रकार की दूरी उत्पन्न हो जाएगी, जोकि नासमझी होगी। यदि मैं ईमानदारी से आपके कुशल-क्षेम के लिए चिन्तित हूँ, तो मुझे आप सभी को अपने ही जैसे मनुष्यों के रूप में अपने भाइयों और बहनों के रूप में सम्बोधित करना होगा। वास्तविकता तो यह है कि हम सभी मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक तौर पर एक जैसे ही हैं। ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक मनुष्य सुखी जीवन चाहता है और कोई दुख नहीं चाहता, और मैं भी वैसा ही हूँ। अतः हम इसी स्तर पर बात करेंगे।

धर्मनिरपेक्ष नैतिकता

धर्मनिरपेक्ष नैतिकता का जैविक कारकों से गहरा सम्बंध होता है, लेकिन धार्मिक विश्वास तो केवल मनुष्यों में ही पाया जाता है। मानव समाज में धर्म विकसित हुआ, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कोई जैविक कारक नहीं है। धर्मनिरपेक्ष नैतिकता सात बिलियन मनुष्यों की पूरी जनसंख्या पर लागू होती है। जैसा कि मैंने कल ज़िक्र किया था, इन सात बिलियन लोगों में से एक बिलियन औरचारिक रूप से यह कह चुके हैं कि वे गैर-आस्तिक हैं, और अब यदि हम क छह बिलियन कथित आस्तिकों के बारे में सोचें तो उनमें से कितने ही लोग भ्रष्ट हैं। कितने ही बुरे उदाहरण हैं, शोषण, भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, झूठ और धौंसबाज़ी है। मैं मानता हूँ कि ऐसा नैतिकता के सिद्धांतों में ईमानदारी से विश्वास न करने के कारण होता है। इस तरह धर्म का प्रयोग गलत उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। मुझे स्मरण नहीं कि कल मैंने ऐसा कहा था या नहीं, लेकिन कभी-कभी मुझे सचमुच ऐसा लगता है कि धर्म हमें पाखण्ड का व्यवहार करना सिखाता है। हम “प्रेम” और “करुणा” जैसी अच्छी-अच्छी बातें तो करते हैं, लेकिन वास्तव में हमारा व्यवहार वैसा नहीं होता है, और इसीलिए इतना अन्याय होता है।

धर्म पारम्परिक तरीके से इन सद्विचारों की शिक्षा तो देता है, लेकिन यह नसीहत वैसी नहीं होती जो वास्तव में दिल को छू जाए। ऐसा लोगों में नैतिक सिद्धांतों के अभाव के कारण, या नैतिक सिद्धांतों की उपयोगिता में दृढ़ विश्वास के अभाव के कारण होता है। हम चाहे आस्तिक हों या गैर आस्तिक, हमें गम्भीरतापूर्वक इस विषय पर विचार करना चाहिए कि लोगों को इन नैतिक सिद्धांतों के बारे में किस प्रकार शिक्षित किया जाए। ऐसा करने के बाद यदि आप उसमें धर्म को भी जोड़ दें तो वह धर्म सही मायने में धर्म हो जाएगा। जैसा मैंने कल कहा था, सभी धर्म इन नैतिक मूल्यों की शिक्षा देते हैं।

अपने कार्य क्षेत्र के प्रति अनासक्त बने रहना

पिछली शताब्दी में जब लोग एक दूसरे को कत्ल कर रहे थे, तो दोनों ही पक्षों के लोग ईश्वर के उपासक थे। क्या मुश्किल है! आज भी हम देखते हैं कि धर्म के नाम पर झगड़े हो रहे हैं, और मैं समझता हूँ कि झगड़ने वाले दोनों ही पक्ष ईश्वर के उपासक होते हैं। मैं कभी-कभी मज़ाक में कहता हूँ कि ऐसा लगता है कि ईश्वर भी असमंजस में है! वह कैसे निर्णय करे, जब झगड़ने वाले दोनों ही पक्ष उससे आशीष पाने के लिए प्रार्थना करते हों? बहुत कठिन है। एक बार अर्जेंटिना में वैज्ञानिकों और कुछ धार्मिक नेताओं के साथ एक चर्चा के दौरान, हालाँकि यह कोई विभिन्न धर्मों की सभी नहीं थी, मेरी मुलाकात मातुराना नाम के एक भौतिक विज्ञानी से हुई। वे स्वर्गीय वारेला के शिक्षक रह चुके थे और मैं उनसे पहले स्विट्ज़रलैंड में मिल चुका था, और फिर बाद में अर्जेंटिना में मिल चुका था, लेकिन उसके बाद उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई थी। अपने भाषण के दौरान उन्होंने कहा कि भौतिक विज्ञानी के रूप में उन्हें विज्ञान के अपने कार्य क्षेत्र के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। इस तरह मैंने एक अद्भुत और ज्ञान की बात सीखी।

मैं एक बौद्ध हूँ, लेकिन मुझे बौद्ध धर्म के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए क्योंकि आसक्ति एक नकारात्मक मनोभाव है। जब हम आसक्त होते हैं तो हमारा दृष्टिकोण पक्षपातपूर्ण हो जाता है। एक बार चित्त में भेदभाव की भावना घर कर जाए तो फिर आप निष्पक्ष हो कर निर्णय नहीं कर सकते हैं।

यही कारण है कि जो लोग धर्म के नाम पर झगड़ों में शामिल होते हैं उनमें से अधिकांश मामलों में मेरे विचार से उनके लिए वास्तव में झगड़ा धार्मिक कारण से न हो कर आर्थिक या राजनैतिक हितों को साधने के लिए होता है।

लेकिन कुछ मामलों में, उदाहरण के लिए कट्टरपंथियों के मामले में, ये लोग अपने धर्म के प्रति इतने आसक्त होते हैं कि इसके कारण वे दूसरी परम्पराओं के महत्व को नहीं देख पाते हैं।

मातुराना का कथन मेरे लिए एक बड़ा उपदेश था। बहुत सारे लोगों से भेंट-मुलाकात के कारण मैं बहुत सी दूसरी परम्पराओं का समादर करता हूँ और आशा करता हूँ कि मैं कोई रूढ़िवादी या कट्टरपंथी नहीं हूँ। कभी-कभी मैं इस बात का ज़िक्र करता हूँ, एक बार मैं दक्षिण फ्रांस स्थित लोउर्देस गया था। वहाँ मैं तीर्थयात्री के रूप में गया था, और ईसा मसीह की एक प्रतिमा के सामने खड़े हो कर मैंने कुछ जल ग्रहण किया था। मैं उस प्रतिमा के सामने खड़ा था और उन लाखों-लाखों लोगों के बारे में सोच रहा था जो इतनी सदियों से सुकून की तलाश में वहाँ आते रहे होंगे, और मुझे बताया गया कि इन लोगों में बहुत से रोगी भी थे, जो अपनी आस्था और किसी प्रकार के आशीर्वाद के प्रभाव से चंगे हो गए। मैंने इस सब के बारे में विचार किया और मेरे मन में ईसाई धर्म के प्रति इतनी गहरी सराहना का भाव जाग्रत हुआ कि मेरी आँखें डबडबा गईं। एक अन्य अवसर पर फातिमा, पुर्तगाल में एक विचित्र घटना घटी। कैथोलिक और ईसाइयों के बीच हमें मैरी की एक छोटी सी प्रतिमा के सामने शांतिपूर्वक ध्यान लगाने के लिए हमें थोड़ा सा समय मिला। जब हम सभी वहाँ से उठकर चलने लगे तो मैंने पलट कर देखा और पाया कि मैरी की प्रतिमा मेरी ओर मुस्करा रही थी। मैंने बार बार मुड़कर देखा, और पाया कि वह मुस्करा रही थी। मुझे लगा कि कहीं न कहीं मैरी को मेरा असाम्प्रदायिक दृष्टिकोण पसन्द आया था! लेकिन यदि मैं दर्शन के विषयों पर चर्चा करने के लिए मैरी के पास कुछ समय और ठहरा होता तो कौन जाने उनकी कोई इससे भी जटिल प्रतिक्रिया हुई होती!

बहरहाल, खुद अपने धर्म से भी आसक्ति रखना कोई अच्छी बात नहीं है। कई बार धर्म के कारण झगड़े और मतभेद उत्पन्न होते हैं, और यह अपने आप में एक बहुत शोचनीय बात है। धर्म से अपेक्षा की जाती है कि वह क्रोध और घृणा को दूर करने वाली करुणा और क्षमाशीलता को बढ़ावा देने का साधन बने। लेकिन यदि धर्म स्वयं ही दूसरे धर्मों के प्रति घृणा को बढ़ावा देने लगे तो यह तो वही स्थिति होगी जैसे किसी रोग का उपचार करने के लिए दी गई दवा उल्टा रोग को बढ़ाने लगे। फिर क्या किया जाए? ये सभी दुखद बातें दरअसल नैतिक सिद्धांतों में दृढ़ विश्वास के अभाव के कारण होती हैं, और इसलिए मेरा मानना है कि हमें धर्मनिरपेक्ष नैतिकता को बढ़ावा देने की दिशा में ईमानदार प्रयास करने के लिए विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाएं और साधन विकसित करने चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता और दूसरों के प्रति सम्मान

अब हम धर्मनिरपेक्ष नैतिकता की कुछ बात करें। भारत के पूर्व उप-प्रधान मंत्री, आडवाणी से मेरा अच्छा परिचय है। एक बार उन्होंने मुझे बताया कि कनाडाई टेलिविजन की एक टीम ने उनका साक्षात्कार करते समय एक बार उनसे पूछा था कि भारत में लोकतांत्रिक पद्धति की सफलता का राज़ क्या है? उन्होंने अपने जवाब में कहा कि भारत में हज़ारों वर्षों से विवाद या मतभेद होने के बावजूद दूसरों का सदा सम्मान करने की परम्परा रही है। उन्होंने मुझे बताया कि भारत में लगभग तीन हज़ार वर्ष पहले चार्वाक या “शून्यवादी” दर्शन विकसित हुआ। दूसरे भारतीय दार्शनिक मतावलम्बी उनकी आलोचना करते थे और उनके विचारों की भर्त्सना करते थे। किन्तु फिर भी चार्वाक के मत को मानने वालों को “ऋषि” अर्थात ज्ञानी कहकर सम्बोधित किया जाता था। यह दर्शाता है कि मतभेदों और उत्तेजनापूर्ण वाद-विवाद के बावजूद सम्मान बरकरार था। कहने का आशय यह है कि हमें भी गैर-आस्तिकों का भी सम्मान करना चाहिए।

कल मैंने कहा था कि मेरे कुछ मित्रों, कुछेक ईसाई और कुछ मुसलमान मित्रों को “धर्मनिरपेक्षता” शब्द के प्रयोग को ही लेकर थोड़ी आपत्ति है। मेरे विचार से इसका कारण यह है कि फ्रांसीसी क्रांति या बोल्शेविक क्रांति के दौरान धर्म विरोधी प्रवृत्ति ने जन्म लिया था। लेकिन मैं यहाँ धर्म और धार्मिक संस्थाओं के बीच स्पष्ट अन्तर कर देना चाहता हूँ, ये दोनों अलग अलग हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति धर्म के विरुद्ध कैसे हो सकता है? धर्म का अर्थ प्रेम और करुणा है, और कोई भी इन गुणों की आलोचना नहीं करेगा। लेकिन धार्मिक संस्थाओं की बात अलग है। फ्रांसीसी और बोल्शेविक, दोनों ही क्रांतियों के मामले में शासक वर्ग ने जनसामान्य पर सचमुच बड़े अत्याचार किए थे। इसके अलावा शासक वर्ग को धार्मिक संस्थाओं का पूरा समर्थन हासिल था और इसलिए उस शासक वर्ग के खिलाफ होने की बात को सिद्ध करने के लिए धार्मिक संस्थाओं का भी विरोध किया गया। इस प्रकार धर्म या ईश्वर का विरोध करने की एक प्रकार की प्रवृत्ति ने जन्म लिया।

आज भी, यदि तिब्बती बौद्ध समुदाय सहित किसी भी धार्मिक संस्था में किसी प्रकार का शोषण होता है तो हमें उसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए। जहाँ तक मेरे अपने आचरण का सम्बंध है, दो वर्ष पहले मैंने उस चार सौ वर्ष पुरानी परम्परा को समाप्त किया जिसके तहत दलाई लामा स्वतः ही तिब्बतियों के सांसारिक और आध्यात्मिक नेता बन जाते हैं। मैंने उस परम्परा को स्वेच्छापूर्वक, सहर्ष और सगर्व समाप्त किया। ऐसी चीज़ें दरअसल धर्म के वास्तविक महत्व को नुकसान पहुँचाने वाल होती हैं। इसलिए हमें धार्मिक संस्थाओं और वास्तविक धार्मिक आचरण और संदेशों के अन्तर को समझना चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता के भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार धर्म के प्रति कभी भी नकारात्मकता का भाव नहीं रहा है, बल्कि सभी धर्मों के समादर का भाव रहा है, और यहाँ तक कि गैर-आस्तिकों के प्रति भी सम्मान का भाव रखा जाता है। मैं समझता हूँ कि यह दृष्टिकोण बड़ा बुद्धिमत्तापूर्ण है। हम इसे बढ़ावा कैसे दे सकते हैं? क्या उपदेश दे कर? नहीं। तो फिर प्रार्थना के माध्यम से तो कर ही सकते हैं? नहीं। लेकिन शिक्षा के माध्यम से, जी हाँ। हमें शारीरिक स्वच्छता के बारे में शिक्षा दी जाती है, तो फिर चित्त वृत्ति या मानसिक स्वच्छता के बारे में शिक्षा क्यों न दी जाए, स्वस्थ चित्त की देखभाल करने के बारे में सामान्य शिक्षा क्यों न दी जाए? इस शिक्षा में ईश्वर या अगले जन्म के बारे में या बुद्ध के बारे में या निर्वाण के बारे में शिक्षा देने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इस बात की सामान्य शिक्षा दी जाए कि स्वयं को एक स्वस्थ चित्त वाले खुशहाल व्यक्ति के रूप में कैसे विकसित किया जाए। एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति परिवार को खुशहाल बनाता है जिससे पूरा समुदाय खुशहाल बनता है। इसलिए मुझे लगता है कि हमें चित्त वृत्ति की स्वच्छता के बारे में किसी प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।

मनोगत स्वच्छता

मनोगत स्वच्छता क्या है? इसका अर्थ ऐसे कारकों को नियंत्रित करना है जो हमारे चित्त की स्थिरता या शांति को भंग करते हैं। इनमें मनोगत रोग जैसे कारक शामिल हैं क्योंकि ये नकारात्मक मनोभाव न केवल आपके शांतिपूर्ण, स्वस्थ चित्त को अस्थिर करते हैं बल्कि वास्तविकता को समझने की आपकी मानसिक क्षमता को भी नष्ट करते हैं। इससे इतना नुकसान इसलिए होता है क्योंकि जब आपके अन्दर क्रोध भरा होता है तो आप वास्तविकता को नहीं देख पाते हैं और आपका चित्त पूर्वग्रह हो जाता है। आसक्ति के कारण भी आप वास्तविकता को ठीक ढंग से नहीं देख पाते हैं। यह चित्त का रोग है। हमारे चित्त की मूल प्रकृति सचेतनता की है और इसलिए ऐसा कोई भी मनोगत कारक जो सचेतनता की इस क्षमता का ह्रास करता है, नकारात्मक है।

अतः मनोगत स्वच्छता ऐसे नकारात्मक मनोभावों के प्रभाव को कम करने और चित्त की निर्मलता और शांति को बनाए रखने की प्रक्रिया है जोकि स्वस्थ चित्त के लिए आवश्यक है। इस स्वच्छता को हासिल करने के लिए पहले हमें इसके प्रति रुचि जाग्रत करनी होगी। यदि रुचि न हो तो आप लोगों को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। कोई कानून या संविधान लोगों को ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। इसे तो व्यक्ति के उत्साह से ही हासिल किया जा सकता है और यह उत्साह तभी जाग्रत होता जब आप किसी कार्य को करने के महत्व को समझ पाते हैं। और इसी महत्व के बारे में हम शिक्षा दे सकते हैं।

चित्त और मनोभावों के बारे में वैज्ञानिक निष्कर्ष

अब हम विज्ञान को देखें। पहले आधुनिक विज्ञान पदार्थ पर ध्यान केन्द्रित करता था जिसकी माप की जा सकती है। लेकिन मुझे लगता है कि बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, और अब इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, और अधिक वैज्ञानिक चित्त और मनोभावों के विषय में रुचि दिखा रहे हैं क्योंकि स्वास्थ्य की दृष्टि से चित्त और मनोभावों के बीच गहरा सम्बंध होता है। कुछ वैज्ञानिक “स्वस्थ चित्त, स्वस्थ शरीर” की बात कहते हैं। चिकित्सा वैज्ञानिकों का भी कहना है कि लगातार क्रोध, भय और घृणा के भाव दरअसल हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देते हैं, जबकि अधिक करुणामय चित्त दरअसल शरीर के स्वास्थ्य को कायम रखता है और उसमें वृद्धि भी करता है। ज़ाहिर है कि जो लोग मानसिक रूप से सुखी हैं, उन्हें शारीरिक तौर पर भी इसके अनेकानेक लाभ प्राप्त होते हैं।

नकारात्मक स्थितियों में सकारात्मक पहलुओं को तलाश करना

स्वयं अपने जीवन में, जब मैं सोलह वर्ष का था, मैंने बहुत सारी ज़िम्मेदारियाँ उठाईं, और उस समय स्थिति बहुत विषम थी। और फिर चौबीस वर्ष की उम्र में मुझसे मेरा देश छिन गया और मैंने अपना अधिकांश जीवन एक शरणार्थी के रूप में बिताया है। इस दौरान तिब्बत में बहुत सी कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न हुईं हैं, और लोगों को मुझ से बड़ी आशा और उम्मीद है। लेकिन मैं असहाय हूँ। फिर भी, अपने चित्त की शांति के कारण मैं इस सबको एक यथार्थवादी दृष्टिकोण से देख सका हूँ। जैसा कि शांतिदेव ने कहा था, यदि कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की जा सकती है, तो फिर चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। और यदि विपत्ति ऐसी है जिस पर विजय पाने की कोई सम्भावना नहीं है, तो फिर इतनी चिन्ता करने से कोई लाभ नहीं है। यह बहुत ही यथार्थवादी दृष्टिकोण है, और मैं ऐसे दृष्टिकोण का अभ्यास करता हूँ।

घटनाओं को और अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखना और इस बात को समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि सभी चीज़ें परस्पर सम्बंधित हैं। जो भी घटित होता है, उसके कुछ सकारात्मक परिणाम भी होते हैं। जहाँ तक मेरी अपनी बात है, मैं शरणार्थी हो गया, लेकिन इसके परिणामस्वरूप मुझे बहुत सारे लोगों से मिलने और अनेक प्रकार के विचार सीखने का अवसर मिला। मैं भिखारियों, नेताओं, विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों, और धर्म-विरोधी लोगों तक से मिला हूँ। इससे बड़ा लाभ हुआ है, क्योंकि यदि मैं तिब्बत के अन्दर ही बना रहता तो मेरा ज्ञान इसका आधा होता। इसलिए एक नज़रिए से यह एक बड़ी त्रासदी हुई, लेकिन एक दूसरे नज़रिए से इससे बहुत से सुअवसर मिले हैं। यदि हम घटनाओं को अलग अलग नज़रियों से देखें तो हमें बेहतर महसूस होगा। अप्रिय घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन उनके अन्दर भी कुछ अच्छी बातें छिपी हो सकती हैं।

विगत में तिब्बती लोग थोड़ा अलग थलग रहे हैं, लेकिन अब उनकी सोच का काफी विस्तार हो चुका है। कई शताब्तियों तक तिब्बती लोग उनींदी सी अवस्था में जीते रहे, लेकिन अब वे जाग्रत हो गए हैं। यह बहुत अच्छी बात है! इस तरह यदि आप अलग अलग नज़रियों से देखें तो आपको चीज़ों के कुछ सकारात्मक पहलू भी मिलेंगे। इससे चित्त की शांति को बनाए रखने में बहुत मदद मिलती है। आज-कल जब मैं अपने पुराने मित्रों से मिलता हूँ तो उनमें से बहुत से कहते हैं कि मेरा चेहरा अभी भी कितना तरोताज़ा दिखाई देता है, और उनमें से कुछ ने मुझ से इसका राज़ जानना चाहा है। मैं अक्सर उन्हें जवाब देता हूँ कि दिन में आठ या नौ घंटे की नींद चित्त की शांति को बनाए रखने में बड़ी सहायक होती है। दरअसल यह तो एक कारण है ही, लेकिन असली लाभ तब है जब हमारा चित्त और चित्त की अवस्था अपेक्षाकृत शांत और स्थिर रहे।

शांत चित्त शल्यचिकित्सा के बाद की स्थिति में स्वास्थ्य लाभ के लिए भी सहायक होता है। जब मेरे पित्ताशय की शल्यचिकित्सा की गई उस समय स्थिति सचमुच गम्भीर थी। बाद में शल्यचिकित्सक ने मुझे बताया कि सामान्यतया ऑपरेशन में पन्द्रह से बीस मिनट का समय लगता है, लेकिन मेरे मामले में स्थिति इतनी गम्भीर थी कि लगभग तीन घंटे का समय लग गया, क्योंकि मेरे पित्ताशय का आकार बढ़कर लगभग दोगुना हो गया था, और उसमें ढेर सारा मवाद जमा हो गया था। लेकिन फिर भी मैं पाँच दिनों में ही स्वस्थ हो गया, बस यूँ ही। इस प्रकार एक शांत चित्त और आशावादी दृष्टिकोण शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में मददगार होता है, और यदि स्वास्थ्य सम्बंधी कोई समस्या उत्पन्न भी हो जाए तो आपको पुनःस्वस्थ होने में कम समय लगेगा। चित्त की शांति स्वास्थ्य की दृष्टि से सचमुच एक महत्वपूर्ण कारक है।

आन्तरिक सुन्दरता बनाम बाह्य सुन्दरता

मैं यहाँ यह भी कहना चाहूँगा, कुछ हद तक मज़ाक के तौर पर और कुछ हद तक चिढ़ाने के लिहाज़ से, कि कुछ युवतियों को सौन्दर्य प्रसाधनों पर बहुत सारा पैसा खर्च करने का शौक होता है। कुछ महिलाएं अपने चेहरे की सज्जा के लिए विभिन्न प्रकार के रंगों का प्रयोग करती हैं ─ नीला, हरा और न जाने क्या-क्या। यह सब बहुत अच्छा नहीं दिखाई देता, लेकिन उन्हें लगता है कि वे बड़ी सुन्दर लगती हैं! ऐसा लगता है कि बाहरी सुन्दरता पर लोगों का ध्यान अधिक है। एक दिन एक जनसभा में एक युवती के बालों का रंग नीला था, जो बड़ा ही असामान्य था। और इसलिए मैंने उसे खिजाने के विचार से कहा कि नीले बाल सुन्दर दिखें यह आवश्यक नहीं है! निसन्देह बाहरी सौन्दर्य महत्वपूर्ण है, लेकिन आन्तरिक सुन्दरता सबसे महत्वपूर्ण है। बाहरी सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए ढेरों पैसा खर्च करने वाली युवतियाँ कृपया अपने भीतर की सुन्दरता पर थोड़ा ध्यान दें तो ज़्यादा अच्छा होगा!

अकादमिक विषय के रूप में चित्त और मनोभाव

हम वैज्ञानिक निष्कर्षों के बारे में चर्चा कर रहे हैं। वास्तविक शांतचित्तता बहुत महत्वपूर्ण है। आत्म-विश्वास और आन्तरिक शक्ति चित्त की शांति के आधार हैं, और इनकी प्राप्ति दूसरों के प्रति सम्मान और उनके कल्याण का भाव रखते हुए प्रेम और करुणा के व्यवहार से होती है। यही धर्मनिरपेक्ष नैतिकता है।

स्कूल-पूर्व के स्तर से लेकर विश्वविद्यालय के स्तर तक हम चित्त के विषय में और मनोभावों को नियंत्रित करने के तरीकों के बारे में शिक्षा दे सकते हैं। यह विषय बड़ा व्यापक है और हमारे चित्त और हमारे मनोभावों तथा उनके अन्तर्सम्बंधों के बारे में अनेकानेक व्याख्याएं हैं। हम इसमें एक प्रकार से कारण और कार्य का प्रभाव देख सकते हैं, जहाँ चित्त के एक भाग में यदि कुछ घटित होता है तो अन्यत्र कुछ और घटित होता है। ऐसी स्थिति में हमें चित्त और पूरे मस्तिष्क के अन्तर्सम्बंध को गम्भीरतापूर्वक समझना होगा।

अकादमिक दृष्टि से इस विस्तृत विषय का अध्ययन दरअसल बड़ा उपयोगी है। अमेरिका में वैज्ञानिकों ने इस जानकारी के आधार पर कुछ प्रयोग किए हैं जिनके कुछ बड़े ठोस परिणाम सामने आए हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि अब ऐसे शैक्षिक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनमें धर्मनिरपेक्ष नैतिकता के बारे में पढ़ाया जाता है। हम भी धर्मनिरपेक्षता पर आधारित नैतिक आचरण का एक ऐसा मसौदा पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जिसे धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था में शामिल किया जा सके।

यहाँ उपस्थित श्रोतागण, और विशेषतः शिक्षाविदों और चिंतकों को इस सम्बंध में और अधिक गहराई से विचार करना चाहिए, और यदि अवसर मिले तो इस विषय पर कुछ चर्चाओं का आयोजन करना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में नैतिक आचरण से सम्बंधित शिक्षा का अभाव है, और इसलिए ज़्यादातर लोग इस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए धार्मिक शिक्षाओं पर निर्भर करते हैं। निःसंदेह यह बड़ी अच्छी बात है, लेकिन ऐसे भी लोग हैं जिन्हें धर्म में कोई रुचि नहीं होती है और जो धार्मिक अवधारणाओं को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। इससे कठिनाई बढ़ जाती है। इसलिए हमें कोई धर्मनिरपेक्ष तरीका तलाशना होगा जो सभी को स्वीकार्य होगा।

समाप्त। अब हम कुछ प्रश्नों के उत्तर देंगे।

प्रश्न

प्रश्न : परम पावन, अपनी अन्तिम टिप्पणी में आपने उस मुद्दे को छुआ जिसके बारे में मैं प्रश्न पूछने वाला था। लेकिन यदि आपको आपत्ति न हो तो उस प्रश्न का पूरा उत्तर पाने की दृष्टि से मैं उस प्रश्न को एक बार फिर पूछना चाहूँगा। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में धर्मनिरपेक्ष नैतिकता की शिक्षा दिए जाने के सम्बंध में क्या आप किसी के साथ मिलकर उपयुक्त शिक्षण कार्यक्रम तैयार कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो क्या कोई शैक्षिक या वित्तीय संस्थाएं इस कार्य में आपकी सहायता कर रही हैं?

परम पावन : जैसा मैंने पहले उल्लेख किया, भारत में दिल्ली के कुछ विश्वविद्यालयों की सहायता से हमने एक मसौदा पाठ्यचर्या तैयार करने का कार्य शुरू कर दिया है। इसके अलावा माइन्ड एण्ड लाइफ इंस्टीट्यूट हमारे साथ मिलकर कार्य कर रहा है। और अमेरिका में विस्काँसिन यूनिवर्सिटी, एमोरी यूनिवर्सिटी, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी आदि जैसी जगहों में अलग अलग लोग अपने अपने क्षेत्रों में धर्मनिरपेक्ष नैतिकता पर आधारित शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं। और यूरोप में भी हम इस संस्था का विस्तार कर चुके हैं। जल्दी ही हम दिल्ली में या उसके आसपास एक संस्थान स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। अभी तक हम केवल इतना ही कार्य कर रहे हैं। एक बार जब पाठ्यचर्या तैयार हो जाएगी तो सम्भवतः हम कुछ शिक्षकों को भी प्रशिक्षित कर सकेंगे, और तब इसका कुछ परिणाम हासिल होगा। आशा है कि यह सब उपयोगी साबित होगा, हमें परिणाम की प्रतीक्षा करनी होगी।

प्रश्न : परम पावन, मुझे इस ग्रह से और इसकी सब चीज़ों से, पेड़-पौधों और पशुओं, और हम मनुष्यों से प्यार है। लेकिन मनुष्य हमेशा कभी प्लास्टिक की बोतलों के प्रयोग जैसी छोटी-छोटी गलतियों से तो कभी वनों की कटाई जैसी बड़ी गलतियाँ करके इस ग्रह को नष्ट करने का काम करते रहते हैं। मैं समझता हूँ कि मुझे धैर्य से काम लेना चाहिए, लेकिन जब मैं यह सब होते हुए देखता हूँ, जब मैं देखता हूँ कि जीवन मर रहा है, तकलीफ में है, तो मेरे भीतर क्रोध का उबाल उठता है और मैं इस सबके खिलाफ लड़ना चाहता हूँ। तो मेरा प्रश्न यह है कि क्या स्वस्थ क्रोध जैसी कोई चीज़ होती है? क्या मैं प्रेम का भाव रखते हुए लड़ सकता हूँ?

परम पावन : क्रोध, जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, हमारी प्रेरणा के साथ जुड़ा होता है। इसलिए किसी बात के बारे में या दूसरों के हित की चिन्ता करते हुए क्रोध करना, और घृणा से प्रेरित होकर क्रोध करना दो बिल्कुल अलग अलग चीज़ें हैं।

प्रश्न : परम पावन, यहाँ पधारने के लिए आपको बहुत धन्यवाद। आपके दर्शन करके और आपके विचारों को सुनकर बहुत अच्छा लगा। मेरा प्रश्न बहुत सामान्य है। यदि कल आपके पास फुर्सत होती तो आप क्या करना पसन्द करते? धन्यवाद।

परम पावन : आम तौर पर जब भी मेरे पास समय होता है, मैं बौद्ध धर्मग्रंथों को पढ़ता हूँ जो मुख्यतः तिब्बती भाषा में हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म में ऐसे लगभग 300 ग्रंथ हैं। 100 ग्रंथ ऐसे हैं जिनमें बुद्ध की अपनी कही हुई बातें हैं, बाइबल के समान। इसके अलावा 200 ग्रंथ हैं जो टीकाएं हैं। इसलिए मैं तिब्बती लोगों से हमेशा यही कहता हूँ कि ये ग्रंथ केवल पूजा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि इनका पारायण किया जाना चाहिए। जब मैं दूसरों को ऐसा करने के लिए कहता हूँ तो स्वयं भी इनका अधययन करने का प्रयास करता हूँ। मुझे लगता है कि मैं इन 300 ग्रंथों में से सम्भवतः 30-40 ग्रंथों को पढ़ चुका हूँ। तो अभी बहुत से ग्रंथों को पढ़ना शेष है। और यदि मेरे पास दो दिन की फुर्सत हो तो मैं किसी ऐसी जगह जाना चाहूँगा जहाँ बर्फ से ढके पहाड़ हों। मैं बहुत सारी बर्फ देखना चाहूँगा!

प्रश्न : परम पावन, आप इस ग्रह पर रहने वाले छह बिलियन आस्थावान लोगों और सम्भवतः एक बिलियन नास्तिकों की बात करते हैं। मुझे लगता है कि लोगों का एक तीसरा वर्ग भी है जो पारम्परिक संस्थागत धर्म की व्यवस्था में सहज नहीं महसूस करते हैं, लेकिन ये लोग नास्तिक भी नहीं हैं, और संस्थागत धर्म की व्यवस्था के दायरे से बाहर आध्यात्मिकता की तलाश करते हैं। ऐसे लोगों को आप क्या सलाह देंगे?

परम पावन : बहुत साल पहले स्टॉकहोम में लोगों के एक छोटे से समूह से मेरी मुलाकात हुई। ये लोग प्रचलित परम्पराओं और धर्मों के पक्षधर नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्हें किसी न किसी रूप में आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश थी। जी हाँ, ऐसे लोग हैं। लेकिन मैंने यह पाया है कि जिसे आप नया युग कहते हैं, या यहाँ वहाँ से जोड़ तोड़ करके बड़ा सा घालमेल तैयार कर लेना कोई बहुत उपयोगी नहीं है।

मैं मानता हूँ कि सिर्फ अपनी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा कर लेना ही काफी नहीं है, बल्कि हमें आन्तरिक मूल्यों को तलाश करके हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। अपने जीवन का मूल्यांकन करना और इस बात को समझना लाभदायक होता है कि हमें जीवन में सुख किसी प्रकार की इन्द्रियग्राह्य संतुष्टियों से नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए जब संगीत बज रहा हो तो आपको संतुष्टि मिलती है, लेकिन जब संगीत बन्द हो जाए तो संतुष्टि भी खत्म हो जाती है। लेकिन मानसिक स्तर पर विश्वास या करुणा से जो संतुष्टि प्राप्त होती है वह कहीं अधिक स्थायी होती है।

प्रश्न : आपके विचार से किसी व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ क्या होती है?

परम पावन : मैं लोगों से हमेशा कहता हूँ कि हमारे जीवन का उद्देश्य सुख से जीना है। लेकिन जीवन में सुख या खुशी की प्राप्ति इन्द्रियग्राह्य साधनों और अनुभवों पर आश्रित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसकी प्राप्ति हमारी मनोदशा पर निर्भर होनी चाहिए। इसलिए, जैसाकि मैं अक्सर कहता हूँ, हमें अपने आन्तरिक मूल्यों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। बहुत बहुत धन्यवाद।