बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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बौद्ध धर्म और विज्ञान

अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन
सिंगापुर अगस्त 10, 1988
Berzin, Alexander and Chodron, Thubten.
Glimpse of Reality.
Singapore: Amitabha Buddhist Centre, 1999.
से संशोधित उद्धरण

प्रश्न : क्या आप बौद्ध धर्म और विज्ञान के बीच सम्बंध के विषय पर थोड़ा और प्रकाश डाल सकते हैं? कृपया कुछ ऐसी चीज़ों के बारे में विशिष्ट उदाहरण दें जो इन दोनों में समान रूप से पाई जाती हैं।

उत्तर : परम पावन दलाई लामा तथा अन्य बौद्ध आचार्यों के साथ वैज्ञानिकों की वार्ताएं अभी तक मुख्यतः तीन क्षेत्रों पर केन्द्रित रही हैं। उनमें से एक क्षेत्र खगोल भौतिकी का है, जो मुख्यतः इस बात का अध्ययन करता है कि ब्रह्माण्ड का विकास कैसे हुआ। क्या इसकी उत्पत्ति का कोई मूल है? क्या इसकी रचना की गई या यह किसी शाश्वत प्रक्रिया का हिस्सा है? दूसरा विषय कण भौतिकी का है, जो परमाणुओं तथा पदार्थ की संरचना से सम्बंधित है। तीसरा विषय तंत्रिका विज्ञान का है, जो यह अध्ययन करता है कि मस्तिष्क किस प्रकार काम करता है। ये प्रमुख क्षेत्र हैं।

विज्ञान और बौद्ध धर्म दोनों ही इस समान निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सृष्टि का कोई सृजनकर्ता नहीं है। विज्ञान में पदार्थ तथा ऊर्जा के संरक्षण का सिद्धान्त कहता है कि पदार्थ या भौतिक तत्व और ऊर्जा का न तो सृजन किया जा सकता है और न ही इन्हें नष्ट किया जा सकता है, ये केवल रूपान्तरित होते हैं। बौद्ध जन इससे पूरी तरह सहमत हैं और इस सिद्धान्त को चित्त के मामले में भी लागू करते हैं। बौद्ध धर्म में “चित्त” का अर्थ घटनाओं ─ चेतन या अचेतन ─ के प्रति अभिज्ञ होना है, और घटनाओं की अभिज्ञता का न तो सृजन किया जा सकता है और न उसे नष्ट किया जा सकता है, वह केवल रूपांतरित होती है। इस प्रकार पुनर्जन्म व्यक्ति की घटनाओं के प्रति अभिज्ञता के सातत्य का रूपांतरण मात्र होता है, वह एक अन्य देह के माध्यम से भौतिक आधार पर होता है।

अणु विज्ञानी किसी भी तथ्य को परिभाषित करने के लिए प्रेक्षक की भूमिका पर बल देते हैं। उदाहरण के लिए प्रकाश एक दृष्टिकोण से पदार्थ है तो दूसरे नज़रिए से वह ऊर्जा है। प्रकाश किस स्वरूप में विद्यमान है, यह बात बहुत से चरों, विशेषतः इस बात पर निर्भर है कि अन्वेषक इसका विश्लेषण करने के लिए किस प्रकार की वैचारिक मनोदशा का प्रयोग करता है। इस प्रकार घटनाएं उन्हें अनुभव करने वाली चेतनता से असम्बद्ध होकर अपनी अन्तर्जात प्रकृति के आधार पर ऐसी या वैसी नहीं होती हैं।

बौद्ध धर्म भी यही बात कहता है: चीज़ें किस स्वरूप में विद्यमान हैं यह प्रेक्षक पर और उन चीज़ों को देखने के लिए प्रेक्षक द्वारा प्रयोग की जाने वाली वैचारिक मनोदशा पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, कोई स्थिति भयानक समस्या के रूप में है या उसे हल किया जा सकता है, यह देखने वाले पर, उस स्थिति में अन्तर्लिप्त व्यक्ति पर निर्भर करता है। यदि किसी की वैचारिक मनोदशा ऐसी हो कि, “यह स्थिति नियंत्रणातीत है और इस स्थिति में कुछ नहीं किया जा सकता है,” तो फिर समस्या सचमुच गम्भीर है और उसे हल नहीं किया जा सकता है। किन्तु, यदि मनोदशा यह हो कि, “यह स्थिति जटिल और पेचीदा है, लेकिन यदि हम किसी अलग तरीके से प्रयास करें तो इसका समाधान हो सकता है,” तो ऐसे व्यक्ति के समाधान खोजने के प्रयास में अधिक खुलापन होगा। किसी एक व्यक्ति के लिए जो एक विकट समस्या है वही समस्या किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कोई बड़ी मुसीबत नहीं है। यह बात प्रेक्षक पर निर्भर करती है, क्योंकि हमारी समस्याएं अपने आप में विकराल समस्याओं के रूप में विद्यमान नहीं हैं। इस प्रकार विज्ञान और बौद्ध धर्म एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं: घटनाएं प्रेक्षक से स्वतंत्र स्वरूप में विद्यमान होती हैं।

इसी प्रकार तंत्रिका विज्ञानी और बौद्धजन दोनों ही प्रतीत्यसमुत्पाद सम्बंध को मानते हैं। उदाहरण के लिए, जब तंत्रिका विज्ञानी यह पता लगाने के लिए मस्तिषक की जाँच करते हैं कि हम निर्णय कैसे लेते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि मस्तिष्क में अलग से कोई “निर्णायक” नहीं है। हमारे मस्तिष्क में “मैं” नाम का कोई व्यक्ति नहीं बैठा है जो कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने बैठे किसी व्यक्ति की भांति आँख, कान आदि से सूचनाएं प्राप्त करता हो और फिर कोई बटन दबा कर निर्णय करता हो कि हमारा हाथ ऐसा करेगा या पाँव वैसा करेगा। बल्कि हमारे निर्णय तो स्नायु आवेगों और रासायनिक और वैद्युत प्रक्रियाओं के एक विशाल संजाल की जटिल परस्पर क्रियाओं का परिणाम होते हैं। ये सभी प्रक्रियाएं मिलकर किसी परिणाम या निर्णय में परिणत होती हैं। और यह सब किसी निर्णायक जैसी सत्ता के न होते हुए भी होता है। बौद्ध धर्म भी इसी बात पर बल देता है: ऐसा कोई “मैं” नहीं है जो स्थायी हो और मूर्तरूप में हमारे मस्तिष्क में विद्यमान होकर हमारे निर्णय लेता हो। पारम्परिक तौर पर हम कहते हैं कि, “मैं ऐसा अनुभव कर रहा हूँ। मैं अमुक कार्य कर रहा हूँ,” लेकिन वास्तव में जो घटित होता है वह बहुत से कारकों की एक बेहद जटिल परस्पर क्रिया का परिणाम होता है। इस दृष्टि से विज्ञान और बौद्ध धर्म एक-दूसरे के बहुत नज़दीक हैं।

प्रश्न: समय क्या है? छात्र के रूप में हमें समय पर व्याख्यान के लिए पहुँचना होता है और अपने अध्ययन के लिए या कार्यस्थल में अपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए पर्याप्त समय निकालना होता है। जीवन को सरल बनाने के लिए हम समय को कैसे समझ सकते हैं?

उत्तर: बौद्ध धर्म समय को “परिवर्तन के परिमाण” के रूप में परिभाषित करता है। हम परिवर्तन को ग्रहों की चाल या आकाश में सूर्य की स्थिति की तुलना से माप सकते हैं। हम परिवर्तन को यह तुलना करके माप सकते हैं कि हमने एक सेमेस्टर में कितने व्याख्यानों में भाग लिया ─ हम बारह व्याख्यानों में शामिल हो चुके हैं और दो अभी शेष हैं ─ या फिर हम परिवर्तन को भौतिक, दैहिक चक्रों ─ मासिक धर्म के चक्र या हमारे द्वारा ली जाने वाली श्वासों की संख्या आदि के आधार पर माप सकते हैं। परिवर्तन को मापने के ये विभिन्न साधन हैं और समय परिवर्तन की माप मात्र ही तो है।

समय का अस्तित्व है, लेकिन हम समय को किस नज़रिए से देखते हैं उसके आधार पर समय हमें अलग-अलग ढंग से प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, हम सोचते हैं, “मेरी परीक्षा में अब सिर्फ़ एक दिन बाकी है!” चूँकि हम समय के बारे में एक छोटी संख्या की दृष्टि से सोच रहे होते हैं इसलिए हम यह सोच कर चिन्तित हो जाते हैं कि हमारे पास ज़्यादा समय नहीं बचा है। यदि हम इसके बारे में अलग ढंग से सोचें कि, “अभी चौबीस घंटे बाकी हैं,” तो ऐसा प्रतीत होता है कि अभी तैयारी करने के लिए काफ़ी समय है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा दृष्टिकोण क्या है। यदि हम समय को किसी मूर्त दमनकारी रूप में देखते हैं तो हम समय के आगे पूरी तरह पराजित हो जाएंगे और हमारे पास समय का अभाव रहेगा। लेकिन यदि हम समय को एक खुले दृष्टिकोण से देखें कि हमारे पास कितना समय है, तो हम परेशान होने के बजाए सकारात्मक ढंग से उसका उपयोग करने का प्रयास करेंगे।

प्रश्न: बौद्ध धर्म तर्क और विवेक बुद्धि पर बल देता है। क्या, जैसा अन्य धर्मों में होता है, ऐसा कोई बिन्दु है जहाँ केवल आस्था के आधार पर विश्वास कर लेना आवश्यक होता है?

उत्तर: बौद्ध धर्म में उसकी आवश्यकता नहीं होती है। इसे हम किसी तत्व के अस्तित्व की बौद्ध परिभाषा से समझ सकते हैं। जिसका अस्तित्व है उसे “जिसे जाना जा सकता है” के रूप में परिभाषित किया गया है। जिसे जाना नहीं जा सकता, उसका अस्तित्व नहीं है, जैसे खरगोश के सींग, कछुए के बाल, मुर्गे के होंठ। हम मुर्गे में मनुष्य के होंठों की कल्पना कर सकते हैं; हम किसी कार्टून चित्र में मुर्गे के चित्र में होठों की कल्पना तो कर सकते हैं; लेकिन हम कभी किसी मुर्गे में मुर्गे के होंठ नहीं देख सकते क्योंकि ऐसी किसी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं है। उसका अस्तित्व नहीं है क्योंकि उसे ज्ञात नहीं किया जा सकता है।

इस बात का अर्थ यह हुआ कि हर उस चीज़ को जाना जा सकता है जिसका अस्तित्व है। हमारे चित्त अर्थात घटनाओं के प्रति हमारी अभिज्ञता के लिए हर चीज़ को अपने दायरे में लेना सम्भव है। धर्मग्रंथों में ऐसे उल्लेख हैं जिनमें कहा गया है कि परम तत्व चित्तातीत और शब्दातीत है। पहली बात तो यह कि मैं अंग्रेज़ी भाषा में इसका अनुवाद “ऐब्सॉल्यूट” के रूप में नहीं करना चाहूँगा क्योंकि इससे ऐसा भान होता कि जैसे यह हमसे परे है, जैसे यह कोई ऐसी चीज़ है जो ऊपर आकाश में स्थित है। इसके बजाए में इसका अनुवाद “घटनाओं के गूढ़तम तथ्य” के रूप में करना पसन्द करता हूँ। घटनाओं के बारे में गूढ़तम तथ्य का अस्तित्व है। वह चित्त, अवधारणाओं और शब्दों से परे इस अर्थ में है कि वह हमारी सामान्य बोध प्रक्रियाओं से परे है। भाषा और अवधारणा में यह बात निहित होती है कि घटनाओं का अस्तित्व काला या सफेद की स्पष्ट श्रेणियों में होता है। अच्छा व्यक्ति, बुरा व्यक्ति; मूढ़, विद्वान ─ भाषा का प्रयोग करने का निहितार्थ यह है कि घटनाओं का अस्तित्व सुस्पष्ट, स्वतंत्र श्रेणियों में होता है: “यह व्यक्ति निरा मूर्ख है। कोई काम ठीक से नहीं कर सकता।“ “यह व्यक्ति महान है।“ वास्तविकता का बोध होने का अर्थ यह देखना है कि घटनाओं का अस्तित्व इन काल्पनिक, असम्भव रूपों में काले या सफेद की श्रेणियों में नहीं होता है। घटनाएं इससे कहीं अधिक व्यापक और गतिमान होती हैं। हो सकता है कि कोई व्यक्ति इस समय किसी कार्य को कर पाने की स्थिति में न हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति पूर्णतः मूर्ख है। वह व्यक्ति और भी बहुत कुछ हो सकता है ─ एक मित्र, एक माता या पिता, इत्यादि।

इस प्रकार जब हम कहते हैं कि घटनाओं के बारे में गूढ़तम तथ्य यह है कि उनका अस्तित्व चित्त और शब्दों से परे होता है, तो हमारे कहने का अर्थ यह होता है कि घटनाएं अवधारणाओं और भाषाओं द्वारा व्यक्त अर्थों में ही अस्तित्व में नहीं होती हैं। हमारा चित्त उन्हें अपनी बोधक्षमता के दायरे में लेने के लिए सक्षम होता है।

ऐसा नहीं है कि चूँकि हमारा चित्त कुछ चीजों को अपनी बोधक्षमता की परिधि में नहीं ला सकता है इसलिए हमें केवल आस्था के आधार पर उनमें विश्वास कर लेना चाहिए। बौद्ध धर्म कभी हमसे अंधी आस्था की अपेक्षा नहीं करता है। इसके विपरीत, बुद्ध का कहना है कि, “मैं जो कहता हूँ उस पर मेरे प्रति सम्मान के कारण विश्वास मत करो, बल्कि स्वयं उसकी परख ऐसे करो जैसे आप सोना खरीद रहे हो।“ सभी स्तरों पर यही बात लागू होती है।

सम्भव है कि हम किसी दलील के पीछे के तर्क को तत्क्षण न समझ सकें। लेकिन हम किसी बात को इसलिए तुरन्त खारिज नहीं कर देते हैं क्योंकि शुरुआत में हमें उसका आशय समझ नहीं आ रहा है। धैर्यपूर्वक सीखने और जाँच करने से जो बात हमें पहले समझ में नहीं आ रही थी, उसका अर्थ स्पष्ट होने लगेगा।