बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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एक सत्य या एकाधिक सत्य में विश्वास

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
हैम्बर्ग, जर्मनी, 21 जुलाई, 2007
अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा प्रतिलिखित और अल्पतः सम्पादित

कुछ धर्म केवल एक सत्य को मानते हैं जबकि कुछ अन्य धर्म एकाधिक सत्य में विश्वास करते हैं। इस दुविधा का समाधान किस प्रकार किया जाए?

उदाहरण के लिए, कुछ लोग वस्तुतः यह मानते हैं कि उनका अपना धर्म सर्वश्रेष्ठ है, एकमात्र सच्चा धर्म है और दूसरे धर्म गलत हैं। किन्तु धर्म एक निजी और व्यक्तिपरक मामला है। इसलिए किसी व्यक्ति के लिए केवल वही धर्म है जिसमें उसकी आस्था हो और जिसका वह पालन करता हो। किन्तु मेरे जो मित्र ऐसा मानते हैं कि हर व्यक्ति के लिए केवल एक ही सच्चा धर्म होता है, उन्हें समझना चाहिए कि वास्तव में दुनिया में बहुत से धर्म हैं और बहुत से सत्य हैं। हमें वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए। इसलिए, बहुत से लोगों और समुदायों को देखते हुए, बहुत से धर्मों का होना एकदम सही है।

जो लोग ऐसा मानते हैं कि सत्य केवल एक है और धर्म भी एक ही है, वे उस धर्म का सहर्ष पालन करें। किन्तु मेहरबानी करके दूसरे धर्मों का सम्मान करें, क्योंकि इन धर्मों से मेरे भाई-बहनों का बहुत हित होता है। इसी कारण से मैं ईसाई, मुस्लिम, यहूदी, हिन्दू ─ सभी धर्मों की प्रशंसा, सराहना और सम्मान करता हूँ।

कुछ ईसाई मुझे अच्छा ईसाई बताते हैं, और कुछ ईसाइयों को मैं अच्छा बौद्ध मानता हूँ। मैं ईसाई धर्म की क्षमा, करुणा, दानशीलता आदि जैसी सभी प्रमुख साधनाओं को स्वीकार करता हूँ। मैं कार्य-कारण को धर्म का आधार मानता हूँ, जबकि ईसाई ईश्वर को धर्म का आधार मानते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि अवलम्बित उत्पत्ति और शून्यता की शिक्षाएं हम बौद्धों के लिए हैं, आपके लिए नहीं। आपको इन शिक्षाओं के विषय में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु जो दूसरी शिक्षाएं हैं, जैसे प्रेम और करुणा की शिक्षाएं हैं, ये हम सभी के लिए एक समान हैं। ये साझी शिक्षाएं ही हम सब के बीच सौहार्द का आधार हैं।