बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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अनवर सादात शांति व्याख्यान

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड, कॉलेज पार्क, मेरीलैंड, यू.एस.ए.
मई 2013
अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा अल्पतः सम्पादित

विषय प्रवेश

जब मैं सार्वजनिक भाषण देता हूँ तब औपचारिकता की कोई आवश्यकता नहीं होती है। दरअसल, इन्सान के तौर पर हम सभी एक जैसे ही हैं। मनुष्य के तौर पर जिस प्रकार हम जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं, प्रकृति में उसकी कोई औपचारिकता नहीं है। हम ऐसे ही आते हैं, और चले जाते हैं। इसलिए जब मैं अपने भाषणों की शुरुआत करता हूँ, तो मैं आपसे यह कहना पसंद करता हूँ, मेरे सम्मानित बड़े भाइयो और बहनो तथा सम्मानित छोटे भाइयो और बहनो, कि हम सभी मनुष्य एक समान हैं। हम सभी सात बिलियन मनुष्यों के परिवार के सदस्य हैं, और हममें से प्रत्येक जीवन में आनन्द प्राप्त करना चाहता है, और आनन्द का शांतिमय जीवन के साथ गहरा सम्बंध है। हर कोई चाहता है कि उसे समस्याओं का सामना न करना पड़े, और हर किसी को इस लक्ष्य को प्राप्त करने का अधिकार है। मैं समझता हूँ कि जो लोग संसार के लिए समस्याएं खड़ी करते रहते हैं, वे भी जब सुबह जागते होंगे तो स्वाभाविक रूप से ऐसी आशा करते होंगे कि “आज के दिन कम समस्याओं का सामना करना पड़े।“ मुझे लगता है कि सात बिलियन लोगों में से कोई भी सुबह जागने के बाद यह नहीं सोचता होगा, “आज मेरे सामने और अधिक समस्याएं उत्पन्न होनी चाहिए!”

महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य के तौर पर हम लोग एक जैसे ही हैं। जैसा कि मैं हमेशा कहा करता हूँ, मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक तौर पर हम लोग समान ही हैं। विशेष तौर पर जब मैं व्याख्यान देता हूँ, तो मैं आपको साथी मनुष्यों की दृष्टि से देखता हूँ, जिनमें और मुझमें कोई अन्तर नहीं है। यदि मैं इस बात पर ज़ोर देता हूँ कि “मैं बौद्ध हूँ”, “मैं तिब्बती हूँ” या “मैं दलाई लामा हूँ” या कोई विशेष व्यक्ति हूँ, तो यह बेतुकी बात होगी। इस प्रकार की सोच से एक अवरोध उत्पन्न होता है। निःसंदेह त्वचा के रंग या नाक की बनावट जैसे कुछ अन्तर होते हैं। लेकिन एक गहन स्तर पर हम भावनात्मक दृष्टि से एक जैसे हैं, और हमारे भीतर सकारात्मक और विनाशकारी भावनाओं की सम्भावना समान रूप से विद्यमान है। मानसिक तथा बौद्धिक स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर एक जैसी क्षमता है। इसलिए मनुष्यों की समानता के आधार पर बात करना ही बेहतर है।

आनन्द क्या है?

प्रत्येक मनुष्य आनन्दमय जीवन की कामना रखता है, इसलिए अब प्रश्न यह है कि आनन्द क्या है? वास्तव स्थायी और सच्चा आनन्द क्या है? हमें इस विषय पर गहनता से विचार करने की आवश्यकता है। इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव किया जाने वाला आनन्द या खुशी ─ जैसे कुछ अच्छा देखने, सुनने, सुस्वाद या सुगंध जैसी अनुभूतियाँ कुछ हद तक संतुष्टि प्रदान करती हैं। लेकिन इन इन्द्रियग्राह्य अनुभूतियों पर आधारित आनन्द बहुत ही सतही होता है। जब तक कुछ सुख-सुविधाएं बनी रहती हैं, आप को आनन्द या खुशी या हर्ष की प्राप्ति होती रहती है, लेकिन जैसे ही कोई बड़ा व्यवधान उत्पन्न होता है, खुशी नदारद हो जाती है। या कुछ ऐसे लोग होते हैं जो टेलीविज़न देख कर किसी प्रकार की खुशी हासिल करते हैं, लेकिन टेलीविज़न के बिना वे घंटे भर में ही ऊब जाते हैं। कुछ लोगों को मौज करने और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा करने, और निरन्तर नई-नई जगहों, संस्कृतियों, संगीत, और ज़ायकों का अनुभव करने में बड़ा आनन्द आता है। मुझे लगता है कि मानसिक अभ्यास के माध्यम से आन्तरिक शांति विकसित करने में अक्षम होने के कारण ऐसा होता है।

लेकिन जो लोग वास्तव में वर्षो-वर्ष तक एकान्तवासी जीवनशैली अपनाते हैं, वे सचमुच आनन्दमय जीवन का अनुभव करते हैं। एक बार बार्सीलोना में मेरी मुलाकात एक कैथोलिक मठवासी से हुई जिनकी अंग्रेज़ी मेरे जैसी ही थी, और इसलिए मुझे उनसे बात करने का अधिक साहस हुआ! वहाँ के आयोजक ने मुझे बताया कि इन मठवासी ने सन्यासी का जीवन जीते हुए पाँच वर्ष पहाड़ों में बिताए थे। मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने पहाड़ों में रहते हुए क्या किया, तब उन्होंने मुझे बताया कि उन्होंने प्रेम के विषय में चिन्तन किया और ध्यान साधना की। जब वे इस बात का उल्लेख कर रहे थे तो उनकी आँखों में एक विशेष प्रकार का भाव था जो इस बात का संकेत करता था कि उनका चित्त सचमुच शांत है। यह एक उदाहरण है जहाँ चित्त की शांति इन्द्रियग्राह्य अनुभवों पर आधारित न होकर कुछ गहरे जीवन मूल्यों को विकसित करके हासिल की जाती है। प्रेम के विषय पर निरन्तर चिन्तन करते रहने से उनके भीतर एक वास्तविक विश्रांति विकसित हो गई थी।

इसलिए अब मैं जब भी भाषण देता हूँ तो हमेशा इस बात पर बल देता हूँ कि भौतिक विकास भौतिक सुख के लिए बहुत आवश्यक हो सकता है, लेकिन उस भौतिक मूल्य से कभी भी वास्तविक मानसिक चैन नहीं मिलता है। कभी कभी जब लोग धनवान हो जाते हैं तो उनका लोभ भी बढ़ जाता है, और फिर वे और भी ज़्यादा तनावग्रस्त हो जाते हैं। नतीजा यह निकलता है कि व्यक्ति की खुशी छिन जाती है। इसलिए, यदि आप जीवन में आनन्द की कामना रखते हैं तो केवल भौतिक मूल्यों के भरोसे न रहें। भौतिक मूल्य आवश्यक हैं, लेकिन इसके अलावा हमें अपने आन्तरिक मूल्यों पर गम्भीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। धर्म में हमारा विश्वास हो या न हो, लेकिन एक मनुष्य के तौर पर हमारे लिए आन्तरिक शांति आवश्यक है।

मानसिक शांति और अच्छा स्वास्थ्य

अपने निष्कर्षों के आधार पर कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि बहुत अधिक तनाव रक्तचाप सम्बंधी और अनेक प्रकार की अन्य समस्याएं उत्पन्न करता है। कुछ चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि निरन्तर भय, क्रोध और घृणा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट कर देते हैं। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए चित्त की शांति सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है, क्योंकि स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर के बीच गहरा सम्बंध होता है। जहाँ तक मेरे अपने अनुभव की बात है, दो वर्ष पहले किसी प्रैस वार्ता के दौरान एक मीडियाकर्मी ने मुझसे मेरे पुनर्जन्म के बारे में प्रश्न पूछा। मैंने मज़ाक के अंदाज़ में उसे देखा, अपना चश्मा उतारा और पूछा, “मेरे चेहरे को देखते हुए आपको क्या लगता है, मेरा पुनर्जन्म अविलम्ब होना चाहिए या नहीं?” और उसने जवाब दिया कि इसकी कोई जल्दी नहीं है।

कुछ समय पहले मैं यूरोप में था और वहाँ कुछ पुराने मित्र मेरे बीस, तीस या चालीस साल पहले तक लिए हुए चित्रों की तुलना कर रहे थे, और सभी का कहना था कि मेरा चेहरा अभी भी युवा लगता है। अपने जीवन में, जैसा कि आप देख सकते हैं, मैं बहुत से कठिन दौरों से गुज़रा हूँ और मैंने अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना किया है, और ऐसी बहुत सी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं जो चिन्ता, अवसाद और एकाकीपन उत्पन्न कर सकती हैं। लेकिन मुझे लगता है कि मेरा चित्त अपेक्षाकृत शांत है। कभी कभी मुझे क्रोध भी आया है, लेकिन मूलतः मेरी मानसिक स्थिति शांतिमय है।

मुझे मज़ाक के तौर पर उन युवतियों को चिढाना अच्छा लगता है जो सौन्दर्य प्रसाधनों पर बहुत सा पैसा खर्च करती हैं। पहली बात तो यह कि उनके पतियों को इस बात की शिकायत हो सकती है कि उनका शौक बहुत खर्चीला है! ख़ैर, बाहरी सुन्दरता महत्वपूर्ण है, लेकिन आन्तरिक सुन्दरता कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है। आप अपने चेहरे को सुन्दर बना सकती हैं, लेकिन लेकिन यदि किसी असुन्दर चेहरे पर सच्ची मुस्कान और स्नेह का भाव हो तो वह चेहरा बनाव-श्रृंगार के बिना भी अच्छा लगता है। यही असली सौन्दर्य है; सच्चा मोल तो हमारे भीतर छिपा है। बाहरी सुविधाएं जुटाने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च करना पड़ता है ─ हमेशा बड़ी दुकानों, बड़े सुपरमार्केट्स में जाना पड़ता है। लेकिन आन्तरिक शांति के लिए कोई खर्च आवश्यक नहीं है! इन आन्तरिक मूल्यों के विषय में विचार कीजिए और स्वयं को इनसे परिचित कराइए, और आप पाएंगे कि हानिकारक भावनाएं धीरे-धीरे कम हो जाएंगी। ऐसा करने से आन्तरिक शांति मिलती है।

दूसरों के प्रति अधिक करुणामय दृष्टिकोण या उनकी भलाई के लिए फिक्रमन्द होने का भाव हमें आत्मविश्वास देता है। जब आपके भीतर आत्मविश्वास हो तो आप अपने सभी कार्य पारदर्शिता, सच्चाई और ईमानदारी के साथ कर सकते हैं। इससे दूसरों के मन में आपके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है, और विश्वास ही मित्रता का आधार है। हम मनुष्य ऐसे सामाजिक जीव हैं जिन्हें मित्रों की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक नहीं है कि लोग सत्ता या धन के कारण हमारे मित्र बनें, या हमारी शिक्षा या ज्ञान के कारण हमारे मित्र बनें, बल्कि मित्रता का महत्वपूर्ण आधार तो विश्वास है। इस प्रकार दूसरे लोगों के जीवन तथा कल्याण के प्रति सरोकार और सम्मान का भाव परस्पर संवाद का आधार है।

अनवर सादात शांति व्याख्यान

मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि मुझे बेहद खुशी है और अनवर सादात शांति व्याख्यान देना मेरे लिए सम्मान का विषय है। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने अपने क्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए सचमुच बड़े निर्णायक और साहसिक कदम उठाए, और मैं एक दूरी से उनका प्रशंसक बना रहा। आज उनकी विधवा से मेरी भेंट हुई और मुझे उनसे मिलकर बहुत खुशी हुई, यह एक बड़ा सम्मान था, और मैंने उन्हें बताया कि मैं उनके दिवंगत पति की कितनी सराहना करता हूँ। यदि उन्होंने अपने भीतर संदेह और घृणा का भाव रखा होता तो उनके लिए ऐसा साहस प्रदर्शित करना बड़ा कठिन रहा होता। दीर्घ अवधि के हितों पर केन्द्रित अधिक व्यापक और अधिक समग्र दृष्टिकोण सबसे अच्छा है ─ जिसमें आप अपने शत्रु का सम्मान कर सकें, उसके साथ संवाद कर सकें और उसके साथ हाथ मिला सकें और अपने बीच की भिन्नताओं और समानताओं को समझ सकें।

प्रत्येक व्यक्ति शांति की कामना करता है और कोई भी व्यक्ति समस्याएं या हिंसा नहीं चाहता है जो हमेशा दुख-तकलीफ का कारण बनती हैं। हिंसा का सबसे खराब पहलू यह है कि यह अप्रत्याशित होती है। एक बार हिंसा होने पर चाहे उसके पीछे की प्रेरणा भली ही क्यों न हो या उद्देश्य भला क्यों न हो, चूँकि हिंसा की विधि का प्रयोग किया गया, इसलिए उसके अप्रत्याशित परिणाम होंगे। हमेशा यही होता है। मैं मानता हूँ कि अनवर सादात के नाम पर इस आयोजन में बोलने का अवसर एक बड़े सम्मान की बात है, और मुझे यह अवसर प्रदान करने के लिए मैं विश्वविद्यालय को, और सम्बंधित आयोजकों को धन्यवाद देना चाहता हूँ।

धार्मिक मैत्रीभाव को प्रोत्साहन

व्याख्यान देते समय मैं सबसे पहले तो स्वयं को एक मनुष्य के रूप में देखता हूँ। हम चाहे आस्तिक हों या गैर-आस्तिक, मनुष्य के रूप में हम सभी एक समान हैं, और इसी आधार पर में आन्तरिक शांति की बात करता हूँ। एक दूसरे स्तर पर मैं बौद्ध हूँ और धार्मिक मैत्रीभाव को बढ़ावा देना मेरी प्रतिबद्धताओं में से एक है। विश्व की महत्वपूर्ण धार्मिक परम्पराओं की दो श्रेणियाँ हैं: एक तो ऐसे धर्म जो किसी सृष्टिकर्ता को मानते हैं, और एक दूसरी श्रेणी ऐसे धर्मों की है जिनमें ऐसी कोई संकल्पना नहीं है। ये आधारभूत अन्तर हैं। ईश्वरवादी धर्मों में भी पूर्वजन्म, और परलोक के जीवन आदि के आधार पर और भी विभेद हैं। इस प्रकार हिन्दू धर्म में सृष्टिकर्ता की मान्यता है, साथ ही कार्य-कारण के सिद्धांत के आधार पर इस जीवन के बाद परलोक के जीवन की भी मान्यता है। और ईसाई धर्म तथा इस्लाम धर्म के बीच भी कुछ गौण अन्तर हैं: एक ईश्वर, एकमात्र ईश्वर, त्रियेक परमेश्वर, आदि।

प्राचीन हिन्दू परम्परा में, कम से कम तीन हज़ार वर्षों तक एक ऐसा दर्शन अस्तित्व में रहा जिसमें किसी सृष्टिकर्ता की संकल्पना नहीं थी। जैन धर्म और बौद्ध धर्म इसी परम्परा को मानते हैं। और सृष्टिकर्ता की संकल्पना को न मानने वाली इन परम्पराओं में भी चिरस्थायी स्वतंत्र आत्मा या आत्मन् के अस्तित्व के होने या न होने को लेकर मतभेद हैं।

इन अलग अलग दार्शनिक मतों का प्रयोजन क्या है? ये सभी मत संवेदनशील और करुणामय व्यक्ति बनने के अलग अलग मार्ग हैं। यही कारण है कि सभी अलग-अलग धार्मिक परम्पराओं में प्रेम, करुणा, सहनशीलता और क्षमाशीलता का संदेश दिया गया है। कभी कभी ऐसी समस्याएं और स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनसे क्रोध उत्पन्न होता है, और ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए ही क्षमा और सहनशीलता के गुणों का अभ्यास करने की शिक्षा दी जाती है। सहनशीलता सीधे क्रोध का विरोध करती है और क्षमाशीलता सीधे घृणा का सामना करती है।

अतः सभी प्रमुख धार्मिक परम्पराएं एक जैसा ही संदेश देती हैं और उन सभी में प्रेम के संदेश के माध्यम से शांति की स्थापना करने की एक समान क्षमता है। ज़ाहिर है, तार्किक दृष्टि से शांति अन्ततोगत्वा घृणा, क्रोध और करुणा से जुड़ी है, उन पर विजय पाने के लिए। परिवार या व्यक्ति के स्तर पर भी शांति को आन्तरिक शांति के माध्यम से ही विकसित किया जाना चाहिए। करुणा और क्षमाशीलता आन्तरिक शांति के स्रोत हैं। और सभी धर्मों में विश्व शांति, पारिवारिक शांति और व्यक्तिगत शांति स्थापित करने की क्षमता समान रूप से विद्यमान है।

तो फिर इतने प्रकार के दर्शन क्यों हैं? मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। कुछ लोग ईश्वरवादी धार्मिक परम्पराओं को अधिक प्रभावशाली मानते हैं, तो कुछ लोगों की मान्यता है कि गैर-ईश्वरवादी दृष्टिकोण अधिक प्रभावशाली होता है। यह अलग अलग प्रकार की औषधियों के जैसा है: उनमें अलग अलग प्रकार के संघटक हो सकते हैं, लेकिन सभी अवयवों का उद्देश्य रोग को ठीक करना होता है। अलग-अलग शारीरिक दशाओं और अवस्था के कारण विभिन्न प्रकार के रोग होते हैं, और इसीलिए हमें अलग अलग प्रकार की ओषधियों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार मानसिक शांति के लिए दवाएं भी अलग अलग प्रकार की होनी चाहिए, और इसीलिए सभी प्रमुख धार्मिक परम्पराओं में एक जैसी ही क्षमता है और उनका उद्देश्य भी समान है, और इसी कारण ये धार्मिक परम्पराएं हम सभी सात बिलियन मनुष्यों के लिए बहुत प्रासंगिक हैं।

भिन्न मनोवृत्तियों के लिए भिन्न पद्धतियाँ

यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि बौद्ध धर्म में गौतम बुद्ध के प्रति पूर्ण आस्था है, हालाँकि उन्होंने विभिन्न प्रकार के दार्शनिक मतों की शिक्षा दी थी। ऐसा उन्होंने क्यों किया? उनके श्रोता समूह में अनेक प्रकार की मनोवृत्तियों वाले लोग थे और इसीलिए एक ही परम्परा में अलग अलग मार्ग सुझाने की आवश्यकता हुई। अलग अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने वाले कई बिलियन लोग हैं, जिनकी जीवन पद्धतियाँ एकदम भिन्न हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी मनोवृत्तियाँ भिन्न हैं, और इसीलिए उनके लिए अलग अलग पद्धतियों की आवश्यकता होती है। हम इस बात को समझ कर ही एक दूसरे के लिए सम्मान का भाव विकसित कर सकते हैं कि सभी प्रमुख धार्मिक परम्पराओं में प्रेम, करुणा और क्षमाशीलता का संदेश दिया गया है। एक बार जब हम आपस में एक दूसरे का सम्मान करने लगेंगे, तो हम एक दूसरे के बारे में सीखने भी लगेंगे, जिससे दरअसल हमारी अपनी परम्परा ही समृद्ध होती है।

मैं अपने निजी अनुभव से बता सकता हूँ कि ईसाइयों, मुसलमानों, यहूदियों और हिन्दुओं के साथ मेलजोल से मैंने उनसे नए नए विचार ग्रहण किए हैं जिससे मेरी साधना समृद्ध हुई है। इसलिए परस्पर आदर और सम्मान के आधार पर विभिन्न धार्मिक परम्पराओं के बीच सच्चा मैत्रीभाव स्थापित करना सम्भव है। इस प्रकार धार्मिक मैत्रीभाव को बढ़ावा देना मेरी दूसरी प्रतिबद्धता है।

हमारे दैनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन

जैसाकि मैंने पहले उल्लेख किया, इस अवसर पर यहाँ उपस्थित होना सचमुच एक बड़े सम्मान की बात है। यहाँ जब हम दिवंगत अनवर सादात के बारे में बात कर रहे हैं तो हमें उनकी महानता को याद भर करके अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं समझ लेनी चाहिए, बल्कि उनके जीवन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में ढालने का प्रयत्न करना चाहिए। अपनी संवाद की भावना से उन्होंने यह प्रमाणित किया कि परिस्थिति कितनी ही विकट क्यों न हो, समस्याओं को बातचीत के माध्यम से हल करना बहुत महत्वपूर्ण होता है। मैं अक्सर कहा करता हूँ कि बीसवीं शताब्दी रक्तपात की शताब्दी रही है, और हमें इक्कीसवीं शताब्दी को शांति की शताब्दी बनाना चाहिए। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि तब समस्याएं नहीं होंगी, क्योंकि समस्याएं तो हमेशा बनी रहेंगी। कहने का आशय यह है कि शांति की शताब्दी की स्थापना के लिए हमें समस्याओं के समाधान के लिए शांतिपूर्ण तरीकों और संवाद के आधार पर कोई पद्धति विकसित करनी होगी।

यहाँ पहुँचने से पहले मेरी मुलाकात गवर्नर महोदय के पुत्र से हुई, और मैंने उनसे कहा कि बीसवीं शताब्दी के मेरी पीढ़ी के बहुत से बुज़ुर्ग भाई बहन अब अलविदा कहने की तैयारी कर रहे हैं! इसलिए इक्कीसवीं शताब्दी की वह पीढ़ी, जो पन्द्रह से तीस वर्ष की उम्र के लोग हैं, वे ही सच्चे अर्थों में इक्कीसवीं शताब्दी की पीढ़ी हैं। इस शताब्दी के लगभग नौ दशक अभी शेष हैं, और नई पीढ़ी को अपने जीवन के शेष वर्ष इसी शताब्दी में बिताने होंगे, इसलिए आपके पास यह अवसर है और आप पर यह दायित्व है कि आप एक नए, बेहतर और ज़्यादा खुशहाल विश्व की स्थापना करें। और यह कार्य मनुष्य जाति की एकता में दृढ़ विश्वास के आधार पर किया जा सकता है।

धार्मिक विश्वासों और राष्ट्रीयताओं की भिन्नता एक गौण विषय है, और यह भिन्नता बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। जब हम गौण स्तर की भिन्नताओं को बहुत ज़्यादा महत्व देना शुरू कर देते हैं तो हम मानव जाति के एक होने की बात को भूल जाते हैं, और फिर समस्याएं उत्पन्न होती हैं। हमें इसके विपरीत क्रम में सोचने की आवश्यकता है। पहले हमें यह सोचना होगा कि मानव जाति एक है। भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि और वैश्विक अर्थव्यवस्था की आज की सच्चाई यह दर्शाती है कि राष्ट्रीय सीमाएं और धार्मिक अन्तर अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। इसलिए नई पीढ़ी को मानव जाति के बारे में और अधिक फिक्रमन्द होना चाहिए, वैश्विक स्तर पर समस्त मानव जाति को एक समझना चाहिए। गौण स्तरीय भिन्नताओं के आधार पर तात्कालिक लाभ हासिल करने के लिए मानव जाति की एकता के भाव को त्याग देना बहुत अनर्थकारी होगा। एक ऐसा दृष्टिकोण विकसित करें जिसकी सहायता से यह शताब्दी अन्ततः शांति की शताब्दी बन सके, जहाँ दुनिया भर से सैन्य जमावड़ों को खत्म किया जा सके। ऐसा कर पाना सम्भव है, इसलिए इसके बारे में और गम्भीरता से विचार करें।

धन्यवाद! अब हम कुछ प्रश्नों पर चर्चा करेंगे।

प्रश्न : परम पावन, वर्ष 2011 में अपने न्यूआर्क दौरे के समय आपने कहा था कि अमेरिकी शिक्षा पद्धति में नैतिक शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए। क्या आप नीतिशास्त्र की औपचारिक कक्षाओं की सिफारिश करेंगे? दुनिया भर में बहुत से स्थानों पर आधिकारिक तौर पर नीतिशास्त्र की कक्षाएं चलाई जाती हैं; आपके विचार से अमेरिकी शिक्षा प्रणाली में औपचारिक तौर पर नीतिशास्त्र का कोर्स चलाए जाने की सिफारिश करने में क्या बाधाएं हो सकती हैं?

परम पावन : मानव जाति को देख कर मुझे लगता है कि शिक्षा ने सचमुच एक अद्भुत नए संसार की रचना की है। मैं समझता हूँ कि दुनिया में हर जगह, सभी लोग शिक्षा को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। इन दिनों बहुत से देशों और समाजों में आधुनिक शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा है, लेकिन फिर भी समस्याएं और संकट उत्पन्न होते रहते हैं। और जहाँ तक उन लोगों की शिक्षा का सम्बंध है जो समाज के लिए बहुत सी समस्याएं खड़ी करते रहते हैं, तो उनकी शिक्षा भी बहुत उच्च स्तर की होती है। लेकिन जहाँ तक मानसिक शांति का सम्बंध है, मेरे बहुत से उच्च-शिक्षित मित्र हैं, लेकिन व्यक्ति होने के स्तर पर वे बहुत दुखी हैं। इससे स्वतः ही एक अस्वास्थ्यकारी मानसिक दृष्टिकोण उत्पन्न होता है, और उसके परिणामस्वरूप हत्या, झूठ, पाखंड, शोषण, डराने-धमकाने आदि जैसी प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं।

इसलिए मैं अक्सर इन लोगों से कहा करता हूँ कि सभी प्रमुख धार्मिक परम्पराएं हमें गहन मानव मूल्यों की शिक्षा देती हैं। यह बात सही है कि इन मूल्यों की शिक्षा देने वाले लोगों में ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो स्वयं ईमानदारी से इन मूल्यों का पालन नहीं करते हैं। और मैंने अनेक बार कहा है, कभी-कभी जो लोग धर्म के पक्षधर बनकर बात करते हैं, वे दरअसल पाखंड का जीवन जीते हैं, जहाँ वे अच्छी अच्छी बातें तो कहते हैं लेकिन उनका व्यवहार एकदम विपरीत होता है। यह आन्तरिक मूल्यों में सच्चा विश्वास न होने का स्पष्ट लक्षण है। केवल धर्म के माध्यम से सच्चा विश्वास जागृत करना दरअसल एक बहुत ही सीमित प्रयोजन है। लेकिन जैसाकि पिछले पोप ने कहा था, श्रद्धा और तर्क को मिलजुल कर आगे बढ़ना चाहिए।

मुझे लगता है कि यह बात बहुत सच है। हमें शिक्षा और ज्ञान के माध्यम से विवेक हासिल करने की आवश्यकता है। शिक्षा ही हमारी एकमात्र आशा है। यदि हम लोगों को स्नेहमय आचरण और दूसरों की परवाह करने के लिए शिक्षित करें तो वे उन्हें अपने कल्याण और स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम उपायों के रूप में देखने लगेंगे। परिवार और समाज में समस्याएं नैतिक सिद्धान्तों के अभाव के कारण उत्पन्न होती हैं। इसलिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली में हमें नैतिक सिद्धान्तों की शिक्षा को और अधिक स्थान देना चाहिए, क्योंकि अभी इन सिद्धान्तों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।

जहाँ तक चित्त और भावनाओं का सम्बंध है, प्राचीन भारतीय दर्शन में ऐसे बहुत से उपाय बताए गए हैं जिनकी सहायता से क्रोध, घृणा और भय जैसे विनाशकारी मनोभावों को नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए जहाँ तक आधुनिक वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों के साथ चर्चा करने का मेरा पिछले तीस वर्षों का अनुभव बताता है कि इनमें से बहुत से लोग बौद्ध धर्म सहित प्राचीन भारतीय परम्पराओं में उपलब्ध जानकारी के महत्व को स्वीकार करते हैं। ये वैज्ञानिक इन परम्पराओं में उपलब्ध जानकारी की सराहना मात्र नहीं करते हैं, बल्कि अब वे वैज्ञानिक प्रयोगों की सहायता से शोध भी कर रहे हैं जिनसे इस बात के समर्थन में बहुत से प्रमाण भी मिल रहे हैं। इस प्रकार पिछले दो वर्षों से हम गम्भीरता से इस बात पर विचार कर रहे हैं कि नैतिक आचरण, जो कि चित्त से सम्बंधित है, को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में किस प्रकार शामिल किया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि हमारे पास चित्त, या जिसे मैं “चित्त का मानचित्र” कहता हूँ, के सम्बंध में कोई शैक्षिक विषय होना चाहिए। तब छात्र अपने निजी अनुभवों से समझ सकेंगे कि क्रोध किस प्रकार उनके मन की शांति को भंग कर देता है।

छात्र अपनी माताओं और मित्रों द्वारा उनके प्रति प्रकट किए जाने वाले स्नेह की बहुत कद्र करते हैं। छोटी उम्र से ही उनके भीतर इस स्नेह का महत्व जीवित बना रहता है। जब वे लोग हमारी तरह बड़े हो जाते हैं तो कभी कभी कहने लगते हैं कि उन्हें स्नेह की आवश्यकता नहीं है, वे सब कुछ अपने आप कर सकते हैं। लेकिन ये आधारभूत मानव मूल्य एक प्रकार का आधारभूत जैविक कारक होते हैं, और ये हमें धर्म से प्राप्त नहीं होते हैं। अपने बच्चों के प्रति एक माता का स्नेह, और कभी कभी पशुओं में भी, अगाध होता है। यह एक जैविक कारक है, और इसकी प्राप्ति धर्म से नहीं होती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि बच्चे जब छोटे होते हैं, और इस स्नेह की अनुभूति उनके अन्दर जीवित बची होती है, उस समय हम उन्हें सिखाएं कि ये जीवन मूल्य बहुत महत्वपूर्ण हैं, और इनका महत्व जीवनपर्यन्त बना रहता है। यही मूल्य हमारी खुशी और आनन्द के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं।

हमें केवल धर्म पर निर्भर बने रहने की अपेक्षा अपनी व्याख्याओं और तर्कों में वैज्ञानिक निष्कर्षों का प्रयोग करना चाहिए। यदि हम धर्म पर आधारित व्याख्या देते हैं तो हमारा दृष्टिकोण सार्वभौमिक नहीं होता है। लेकिन चूँकि हम ऐसी समस्याओं की बात कर रहे हैं जो सभी जगहों में हमारे सामने पेश आती हैं, इसलिए इन समस्याओं का सामना करने का हमारा तरीका भी सार्वभौमिक स्वरूप का होना चाहिए। सामान्यतया मैं इस दृष्टिकोण को “धर्मनिरपेक्ष नैतिकता” के नाम से सम्बोधित करता हूँ। यहाँ मैं “धर्मनिरपेक्ष” शब्द के विषय में स्पष्टीकरण देना चाहूँगा क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि पश्चिमी जगत में इस शब्द का अर्थ धर्म को नकारात्मक या असम्मानजनक दृष्टि से देखने के रूप में ग्रहण किया जाने लगा है। लेकिन धर्मनिरपेक्षता के भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार इस शब्द का अर्थ सभी धर्मों और गैर-आस्तिकों के प्रति भी सम्मान का भाव रखना, और किसी भी एक धर्म को दूसरे धर्मों की तुलना में तरजीह न देना है। यही कारण है कि जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उसके संविधान की रचना धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना के आधार पर की गई।

चूँकि भारत एकाधिक धर्मों वाला देश है, अतः यह नहीं कहा जा सकता है कि कोई एक धर्म किसी दूसरे धर्म से ऊँचा है। वैश्विक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता ही एक ऐसा रास्ता है जो जिसकी स्वीकार्यता सार्वभौमिक है। इस लिए अब हम एक ऐसी पाठ्यचर्या तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं जो धर्मनिरपेक्ष शिक्षा जगत की आवश्यकताओं के अनुरूप हो। हम इस दिशा में काम कर रहे हैं और सम्भवतः एक वर्ष में इसे तैयार कर लिया जाएगा। लेकिन इसके लिए हमें वैज्ञानिकों, दर्शनशास्त्रियों, शिक्षाविदों आदि के साथ मिलकर विषय का और अध्ययन करने की आवश्यकता है, और भारत में हम ऐसा कर भी रहे हैं।

एक बार जब यह पाठ्यचर्या तैयार हो जाएगी, तब इस विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं प्रायोगिक तौर पर उस कार्यक्रम को लागू कर सकती हैं। किसी एक स्कूल में उस कार्यक्रम को चलाया जा सकता है और फिर दो वर्ष बाद उसके परिणामों की समीक्षा की जा सकती है। यदि उस प्रयोग के सकारात्मक परिणाम आते हैं तो हम पाठ्यचर्या को अन्तिम रूप दे कर उसका विस्तार दस स्कूलों में, सौ स्कूलों में, और फिर पूरे राज्य के स्तर पर कर सकते हैं। राज्य स्तर पर लागू किए जाने के बाद, और गम्भीर चर्चा करके हम उसे संघ के स्तर पर, और फिर संयुक्त राष्ट्र संघ के स्तर पर तब तक उसका विस्तार करते जा सकते हैं जब तक कि पूरा विश्व इससे प्रेरणा ग्रहण करके धर्म के स्थान पर धर्मनिरपेक्षता पर आधारित नैतिक आचरण सम्बंधी शिक्षा को शिक्षा व्यवस्था में शामिल न कर ले।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि कट्टरपंथी इस्लाम के कारण उत्पन्न चिन्ताओं और अमेरिका तथा मुस्लिम जगत के बीच तनाव के कारण विभिन्न धर्मों के बीच संवाद की प्रक्रिया के रास्ते में और अधिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई हैं? 11 सितम्बर की घटना के बाद के पूरे एक दशक की अवधि में क्या संवाद की स्थिति में कोई सुधार हुआ है?

परम पावन : स्थिति में कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है; हम पिछले तीस, चालीस वर्षों से संवाद कायम रखे हुए हैं। विभिन्न धर्मों की सभाओं में मेरा सदा यही प्रयास होता है कि ये बैठकें केवल छोटे-छोटे औपचारिक आयोजनों और प्रार्थना सभाओं में तब्दील हो कर न रह जाएं जहाँ लोग मुस्करा कर एक दूसरे का अभिवादन करते हैं और फिर विदा हो जाते हैं। बल्कि मैं तो इन सभाओं में गम्भीर विषयों पर चर्चाओं का पक्षधर हूँ। हमारे बीच किन बातों को लेकर मतभेद हैं, किन बातों में हमारे बीच समानताएं हैं, और हमारा उद्देश्य क्या है? और भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बैठकों में साधकों को दूसरे साधकों से भेंट करने का अवसर मिलता है। मैं सचमुच कुछ कैथोलिक सन्यासियों का प्रशंसक हूँ। दिवंगत थॉमस मर्टन, जोकि एक ट्रैपिस्ट भिक्षु थे, से मिल कर और कई अन्य ईसाई भिक्षुओं और भिक्षुणियों से मैंने बहुत सी साधनाओं के बारे में सीखा और उनके बहुत से अनुभवों की जानकारी हासिल की। एक बार सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में एक ईसाई पादरी ने मेरा परिचय देते हुए कहा कि मैं एक अच्छा ईसाई हूँ! फिर जब मेरे बोलने की बारी आई तो मैंने उनका उल्लेख एक अच्छे बौद्ध के रूप में किया! एक अर्थ में हमारी साधना एक जैसी है, हमारी क्षमता एक जैसी है। एक बार जब हम एक दूसरे को आत्मीयता के स्तर पर जानने लगते हैं तो परस्पर सम्मान और आदर का भाव स्वतः ही जाग्रत हो जाता है।

इसके अलावा, मैंने मुसलमान भाइयों और बहनों के साथ मुलाकातों के समय विशेष तौर पर प्रयास किए हैं। शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच के झगड़ों जैसे संघर्ष, जैसे कि उत्तरी आयरलैंड में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक ईसाइयों के बीच होते हैं, धर्म के कारण नहीं हैं; बल्कि इनका असली कारण राजनीति है। पुराने समय में भी धर्म के नाम पर हुए ऐतिहासिक संघर्ष सत्ता के लिए या आर्थिक कारणों से हुए हैं, लेकिन इनके लिए धर्म के नाम का प्रयोग किया जाता है। इसलिए हमें इन चीज़ों के बीच फर्क करके देखना चाहिए। राजनैतिक मुद्दों को हल करने के लिए धर्म का सहारा लेने के बजाए राजनैतिक तरीकों से ही सुलझाया जाना चाहिए। जहाँ तक धर्म का सम्बंध है, इसमें दूसरों को हानि पहुँचाने का कोई आधार नहीं है।

ये दुखद घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि हमें स्थिति में सुधार करने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए, क्योंकि धर्म के नाम पर हत्या करना सचमुच बहुत दुखद बात हैं, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। इन दिनों बर्मा और श्रीलंका के बौद्ध भी ऐसी घटनाओं में शामिल हो रहे हैं जहाँ बौद्ध भिक्षु मुसलमानों की मस्जिदों और घरों को तबाह कर रहे हैं। यह सचमुच बड़े दुख की बात है। एक बार मैंने अपने बौद्ध भाइयों और बहनों से कहा था कि जब उनके मन में मुस्लिम समुदाय के प्रति नकारात्मक विचार आएं तो वे बुद्ध के चेहरे को याद करें। इसमें कोई संदेह नहीं कि बुद्ध की भावना हमारे मुस्लिम भाइयों और बहनों की रक्षा करने की ही होती। इस प्रकार मुख्यतः आर्थिक कारण ही इन संघर्षों के लिए ज़िम्मेदार हैं, और जब इसमें धर्म भी शामिल हो जाता है तो लोगों की भड़की हुई भावनाओं के कारण ऐसी घटनाएं सामने आती हैं। एक बार जब कई भावनाएं भड़क उठती हैं तो हमें आसानी से अपनी इच्छा के अनुसार चलाया जा सकता है। यह बड़ी दुखद बात है, लेकिन फिर भी निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें अपने प्रयास निरन्तर जारी रखने चाहिए और परिणाम स्वतः ही आते रहेंगे। कभी कभी मुझे इस बात पर थोड़ा गर्व होता है कि मैंने भी धार्मिक मैत्रीभाव को बढ़ाने के लिए थोड़ा योगदान किया है।

जब लोग मेरे प्रयासों या विचारों के प्रति किसी प्रकार की सराहना या सहमति व्यक्त करते हैं तो उससे मुझे और भी प्रेरणा मिलती है। जब शांति के नोबल पुरस्कार की घोषणा की गई थी, तो मैंने तुरन्त अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि मैं तो एक साधारण बौद्ध भिक्षु हूँ, न उससे कुछ बढ़ कर, और न उससे कुछ कम। लेकिन यह पुरस्कार विश्व शांति को बढ़ावा देने और मानवता की स्थिति को सुधारने की दिशा में मेरे प्रयासों की मान्यता के रूप में दिया गया था।

मुझे लगता है कि यहाँ पन्द्रह हज़ार से अधिक भाई-बहन उपस्थित हैं, और यदि आपको ऐसा नहीं लगता है कि इन विषयों पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है, तब तो कोई बात नहीं। लेकिन यदि आपको थोड़ी सी रुचि हो और आप इस कार्य से और अधिक सम्बद्ध होना चाहते हैं तो कृपया अपने आन्तरिक मूल्यों के विषय में थोड़ा और विचार करें। पहले केवल बोध के स्तर पर, इन मूल्यों के प्रति सामान्य चेतना के स्तर पर अभ्यास करें। और फिर स्वयं को इन मूल्यों के प्रति सहज बनाएं, और तब ये मूल्य जीवन्त हो उठेंगे। उसके बाद आप इन मूल्यों को लागू करें तो ये आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाएंगे, और वास्तविक अर्थ में आपको इनसे लाभ मिलेगा। इसलिए, इस विषय पर थोड़ा और सोचिए। धन्यवाद!