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डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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धर्मनिरपेक्ष नैतिक आचरण से चित्त की सुख प्राप्ति

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
क्लागेनफर्ट, ऑस्ट्रिया, 20 मई 2012
अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन द्वारा लिप्यंतरित और अल्पतः सम्पादित

आज मैं धर्मनिरपेक्ष विधियों के प्रयोग से चित्त की सुख प्राप्ति के विषय में चर्चा करूँगा। यहाँ बड़ी संख्या में एकत्र लोगों से बात करने का अवसर पाकर मुझे खुशी है। मेरे एक घनिष्ठ मित्र, डेविड लिविंगस्टोन, जो एक अमेरिकी वैज्ञानिक थे और अब वे हमारे बीच नहीं हैं, कहा करते थे कि जब कोई स्नेही प्रकृति का व्यक्ति दूसरे लोगों से मिलता है तो उसकी आँखें फैल जाती हैं और पुतलियाँ विस्फारित हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि जब वे मुझसे मिले तो उनकी आँखें फैल गईं और पुतलियाँ उसी प्रकार से विस्फारित हो गई थीं, और ऐसा उनके साथ केवल दो ही प्रसंगों में हुआ था, जब वे मुझसे मिले और जब वे अपनी पत्नी को देखा करते थे। लेकिन अब, मैं जहाँ भी जाता हूँ वहाँ के स्थानीय लोग वैसे ही होते हैं, वे मेरे प्रति सच्चा प्रेम भाव प्रदर्शित करते हैं और मैं उसकी बहुत कद्र करता हूँ। इसलिए, आप सभी को धन्यवाद।

“धर्मनिरपेक्षता से हमारा अभिप्राय क्या है? मैं इसका प्रयोग भारतीय परम्परा में किए जाने वाले प्रयोग के अनुसार करता हूँ। मेरे कुछ मुसलमान और ईसाई मित्र मानते हैं कि “धर्मनिरपेक्षता” शब्द में कुछ हद तक धर्म विरोधी होने का भाव निहित है, इसलिए वे मेरे इस शब्द के प्रयोग को नापसन्द करते हैं। इसके अलावा कुछ लोग मानते हैं कि “आचार नीति” धर्म पर आधारित होनी चाहिए, लेकिन भारतीय संविधान तो धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है; वह धर्म विरोधी तो नहीं है। भारत में लोग धर्म का बहुत सम्मान करते हैं। महात्मा गाँधी और भारत के संविधान के निर्माता बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के लोग थे। इस संदर्भ में “धर्मनिरपेक्ष” होने का अर्थ सभी धर्मों का सम्मान करना और किसी भी एक धर्म को बाकी धर्मों से बेहतर न समझना होता है; और हज़ारों वर्षों तक इस धर्मनिरपेक्षता ने भारत में गैर आस्तिकों के भी अधिकारों का सम्मान किया है। इसलिए मैं “धर्मनिरपेक्षता” शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में करता हूँ।

हम मनुष्य, और यहाँ तक कि पशु और कीड़े मकोड़े भी और अधिक शांति और स्थिरता की इच्छा रखते हैं। कोई भी परेशानी नहीं चाहता है; और हर किसी को किसी भी प्रकार की परेशानियों, समस्याओं और कष्टों पर जीत प्राप्त करने का अधिकार है। इस बात को तर्क या किसी प्रकार की जाँच-परख से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति का सहज नियम यही है; और सभी बोधक्षम जीव ─ पक्षी, पशु, मनुष्य ─ हम सभी इस लक्ष्य को हासिल करने का प्रयत्न करते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इस लक्ष्य को हासिल करने के का तरीका कैसा हो। यह तरीका व्यावहारिक होना चाहिए, और अव्यावहारिक तरीकों को अपनाने से तो हमें अपने लक्ष्य को हासिल करने में विफलता ही मिलती है। उदाहरण के लिए, कभी-कभी हम देखते हैं कि पशु इतने भयभीत हो जाते हैं कि वे गलत दिशा में दौड़ने लगते हैं; वे खतरे से दूर भागने के बजाए उसकी दिशा में ही भागने लगते हैं। लेकिन हम तो मनुष्य हैं और हमारे पास अद्भुत बुद्धि है और इसलिए हमारे पास तर्क और बुद्धि का प्रयोग करके व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की क्षमता अधिक होती है, जिसके कारण हम ज़्यादा सफल होते हैं। हम दूर-दृष्टि सम्पन्न हैं और इसलिए कभी-कभी हम लम्बी अवधि की सफलता की खातिर तात्कालिक लाभ का त्याग कर देते हैं। यह इस बात का संकेत है कि हम पशुओं की तुलना में अधिक बुद्धिमान हैं। और अपनी इस बुद्धि के कारण हम मनुष्य दीर्घकालिक लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं।

फिर प्रश्न यह उठता है कि अनुभव का कौन सा स्तर हमारे लिए सबसे ज़्यादा फायदेमन्द हो सकता है। इन्द्रियबोध मुख्यतः अस्थायी प्रकृति का होता है। उदाहरण के लिए जब आप कोई चित्र देखते हैं या कोई खेल-कूद का आयोजन देखते हैं या कोई पर्यटक नई-नई जगहें, वेश-भूषा, लोग आदि देखने के लिए जाता है तो इससे आपको, उदाहरण के लिए आँखों के जरिए, एक प्रकार के आनन्द की प्राप्ति होती है। उदाहरण के लिए दिल्ली में मेरा ड्राइवर, जो एक भारतीय है, क्रिकेट का बड़ा शौकीन है। जब मैंने उससे पूछा कि पिछली रात जब क्रिकेट का खेल दिखाया गया था तब वह कितने घंटे सोया। उसने जवाब दिया कि वह चार घंटे सोया। तब मैंने उसकी आलोचना करते हुए कहा कि खेल देखने के बजाए अच्छी नींद लेना कहीं ज़्यादा अच्छा है। यह हमारे चित्त के लिए बेहतर है। और इसके अलावा संगीत, और सुगंध और भोजन और आनन्ददायक शारीरिक संवेदन देने वाले साधन भी हैं। इन्द्रियों के स्तर के ये सुख केवल अस्थायी सुख होते हैं। जब ये खत्म हो जाते हैं तो हमारे पास इनकी स्मृति ही बाकी रह जाती है।

वहीं दूसरी ओर, कुछ अनुभवों का बोध मन के स्तर पर होता है और ये अनुभव इन्द्रियबोध पर आश्रित नहीं होते हैं : और इनसे मिलने वाला आनन्द कहीं ज्यादा समय तक टिकता है। इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि सुख और दुख के अनुभव के दो स्तर होते हैं। एक इन्द्रियग्राह्य स्तर होता है जो अस्थायी होता है और दूसरा, जो कि मानसिक स्तर है, कहीं ज़्यादा गहरा होता है।

आज के आधुनिक समय में लोग इन्द्रियग्राही अनुभवों में बहुत ज़्यादा लिप्त हैं और उन्हें ही सबसे ज़्यादा महत्व देते हैं। इसलिए लोग हमेशा बाहरी भौतिक साधनों में आनन्द की तलाश करते हैं और अपने अन्दर के गहरे स्तर को अनदेखा करते हैं। कई साल पहले एक बार मैं जर्मनी के बर्लिन शहर में था वहाँ मैं जिस होटल में ठहरा था वह एक नाइट क्लब के ठीक सामने था। रात को 7.30 या 8 बजे जब मैं सोने के लिए जा रहा था तो मुझे बाहर रंग-बिरंगी बत्तियाँ जलती हुई दिखाई दीं और तेज़ धमाकेदार संगीत की आवाज़ें आ रही थीं। मुझे नींद आ गई और जब मैं आधी रात को जागा तो जश्न जारी था, और उसके बाद करीब चार बजे मेरी आँख फिर खुली तो मैंने पाया कि वही सिलसिला जारी था। वहाँ मौजूद लोगों की ऊर्जा उस इन्द्रियग्राह्य स्तर में ही खप रही थी। मुझे लगता है कि अगले दिन सभी लोग पूरी तरह थक चुके होंगे।

हाल में एक भारतीय परिवार से मेरी भेंट हुई ─ परिवार में माता-पिता के साथ उनके कुछ बच्चे भी थे, और हमने कुछ अनौपचारिक बातें कीं। चर्चा के दौरान मैंने ज़िक्र किया कि पिछले दो-तीन सालों से मैं टेलीविज़न नहीं देखता हूँ; मैं सिर्फ बी.बी.सी. रेडियो पर समाचार सुनता हूँ। उस भारतीय परिवार के युवा सदस्यों ने मुझसे कहा, “टेलीविज़न देखे बिना तो आप बोर हो जाते होंगे!” निहितार्थ यह था कि वे स्वयं बहुत टेलीविज़न देखते थे। खास तौर पर अमेरिका और यूरोप में बच्चे बहुत ज़्यादा टी.वी. देखते हैं। यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं है क्योंकि इससे बच्चों की प्रखर बुद्धि का प्रयोग करके विश्लेषण करने की क्षमता घट जाती है। अतः आनन्द की प्राप्ति के मार्ग के रूप में मानसिक स्तर पर और अधिक प्रयत्न करना केवलमात्र इन्द्रियग्राह्य स्तर से कहीं बेहतर है।

एक और बात यह है कि वास्तविक भावनात्मक अशांति मुख्यतः मानसिक स्तर से ही उत्पन्न होती है; इसलिए आनन्दमय जीवन के लिए हमारे चित्त की शांति आवश्यक है। चूँकि अशांति का स्रोत मानसिक स्तर पर होता है, इसलिए हमें आनन्द की प्राप्ति के लिए मानसिक स्तर को नियंत्रित रखने की आवश्यकता है। इसलिए, सबसे पहले तो हमें अपने भीतर की दुनिया पर, अपने आन्तरिक मूल्यों पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। अपने मस्तिष्क के छोटे से प्रसार में हम मन के असीम विस्तार की खोज कर सकते हैं, लेकिन दरअसल हमें अपने भीतर के इस फैलाव के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी होती है। इसलिए हमें अपनी भावनाओं की जाँच करनी चाहिए। जब प्रबल भावनाएं जागृत होती हैं तो हमें अपने मन की क्षमताओं का उपयोग करते हुए उस भावना की जाँच करनी चाहिए, और हम देखेंगे कि शनैः शनैः उस भावना का आवेग खत्म हो जाएगा। हमारे अन्दर यह क्षमता है कि हम अपने क्रोधावेश से प्रभावित चित्त पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं; जैसे ही हम उस पर ध्यान देते हैं, भावावेग की तीव्रता घटने लगती है। चित्त की गहराई में झाँक कर देखना बहुत दिलचस्प होता है।

हम इक्कीसवीं शताब्दी में जी रहे हैं। बीसवीं शताब्दी, ऐसा लगता है कि मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शताब्दी थी। ऐसा इसलिए हैं क्योंकि इस शताब्दी में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में बहुत विकास हुआ। इस तरह हमारे ज्ञान में वृद्धि हुई, हमारा जीवन स्तर ऊपर उठा। लेकिन साथ ही साथ यह शताब्दी खून-खराबे की भी शताब्दी थी। आपके माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी ने बहुत अशांति और कष्ट के दौर देखे हैं। दो सौ मिलियन से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें से बहुत से लोग परमाणु अस्त्रों के प्रयोग से मारे गए। यदि इतनी व्यापक हिंसा के बाद कोई नई व्यवस्था जन्म लेती तो शायद हम उस हिंसा का कोई औचित्य तलाश कर सकते थे, लेकिन वैसा तो हुआ नहीं। अभी भी, इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ईराक में, ईरान में और अफगानिस्तान में कितनी सारी समस्याएं हैं, कितनी ज़्यादा हिंसा है; यह सब विगत की गलतियों और उपेक्षा भाव रखने के कारण है। विगत में बाह्य चीज़ों पर बहुत ज़्यादा बल दिया गया था। अब हमें केवल बाह्य परिस्थितियों के बारे में ही नहीं बल्कि अपने आन्तरिक मूल्यों के विषय में अधिक सोचना चाहिए।

हालाँकि भौतिक प्रगति सामान्य तौर पर ठीक-ठाक रही है, लेकिन अमीरों और गरीबों के बीच की खाई एक बड़ी समस्या है। यहाँ ऑस्ट्रिया में समानता का स्तर बहुत अच्छा है, लेकिन पिछले साल मैं मैक्सिको, अर्जेन्टिना, और ब्राज़ील गया था, और वहाँ मैंने अमीरों और गरीबों के बीच के अन्तर के बारे में पूछा था कि यह अन्तर बड़ा है या छोटा, और मुझे बताया गया कि यह अन्तर बहुत बड़ा है। यहाँ ऑस्ट्रिया में यह अन्तर शायद कम है।

मैंने यह सवाल भी पूछा, “यहाँ भ्रष्टाचार का स्तर बड़े पैमाने पर है या छोटे पैमाने पर?” जिन लोकतांत्रिक देशों में बोलने की आज़ादी है और जहाँ प्रैस की आज़ादी है, वहाँ भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो सकता है। ऐसा आत्मानुशासन के अभाव के कारण होता है, नैतिक सिद्धान्तों के अभाव के कारण होता है। उदाहरण के लिए भारत एक धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों का देश है, लेकिन वहाँ भी बहुत भ्रष्टाचार है। बहुत से भारतीय अपने घरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखते हैं, उन पर फूल चढ़ाते हैं और उन मूर्तियों के सामने धूप जलाते हैं, प्रार्थना करते हैं, लेकिन कभी-कभी मैं मज़ाक में कहता हूँ कि उनकी प्रार्थना होती है कि “मेरा भ्रष्टाचार सफल हो।“ यह बड़ी दुखद बात है। वे लोग धार्मिक प्रवृति के लोग हैं लेकिन फिर भी उनमें से कितने सारे लोग भ्रष्ट हैं। उन्हें आस्तिक माना जाता है, लेकिन वे लोग उस सीमा तक आस्तिक नहीं हैं जहाँ वे अपने धर्म के सिद्धांतों का वास्तविक अर्थ में पालन कर सकें और धर्मपरायण बन सकें।

कुछ साल पहले मैंने एक जानकार के साथ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बारे में चर्चा की थी कि किस प्रकार इन कम्पनियों के मुनाफों में पारदर्शिता नहीं बरती जाती है। हम इन विषयों पर चर्चा कर रहे थे और मैंने कहा कि “इन कम्पनियों को चलाने वाले लोग धर्मभीरु माने जाते हैं इसलिए उन्हें कुछ अनुशासन बरतना चाहिए” और उन्होंने जवाब दिया “यह तो अठारहवीं शताब्दी के विचार हैं।“ इसलिए, हालाँकि ये लोग ईश्वर से प्रार्थना करते होंगे, लेकिन ये लोग गम्भीर नहीं हैं। अगर ये लोग गम्भीर हों तो उन्हें ईश्वर की सुझाई ईमानदारी, दूसरों का खयाल रखने, और नैतिकता की राह पर चलना चाहिए। इसलिए हमें दूसरे लोगों का खयाल रखना चाहिए और पर्यावरण का भी खयाल रखना चाहिए। हमें नैतिक आचरण पर और अधिक बल देने की आवश्यकता है, और उसका अर्थ होगा आत्मानुशासन पर और अधिक बल देना। आत्मानुशासन जिसका पालन किसी कर्तव्यबोध के कारण या भय के कारण न किया जाए, बल्कि स्वेच्छा से किया जाए, इस समझ के साथ के साथ किया जाए कि, “यदि मैं ऐसा करता हूँ तो यह नैतिक सिद्धान्तों के विरुद्ध होगा।“

हमें नैतिक आचरण को बढ़ावा देने के लिए और अधिक प्रयत्न करने की आवश्यकता है, नहीं तो बढ़ती हुई जनसंख्या और घटते हुए संसाधनों के कारण समस्याएं और भी बढ़ेंगी। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम इस इक्कीसवीं शताब्दी को एक ऐसी शताब्दी बनाएं जिसमें हमारे प्रयास इसे करुणामय व्यवहार की शताब्दी बनाने के लिए लक्षित हों। नैतिक आचरण, धर्मनिरपेक्ष नैतिक आचरण का यही मूल सिद्धान्त है।

नैतिक आचरण का स्नेहमय आचरण के साथ गहरा सम्बंध है। इसका अर्थ दूसरे मनुष्यों का अधिक से अधिक खयाल रखना होता है। वे भी खुश रहना चाहते हैं; वे दुख नहीं चाहते, और हम सभी परस्पर सम्बद्ध हैं। उनकी खुशी ही हमारी खुशी का स्रोत है। जब हम इस बात को समझ लेंगे और दूसरों का सम्मान करने लगेंगे तो फिर झूठ बोलने, धोखा देने, दूसरों को डराने-घमकाने या उनका शोषण करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी। इस अर्थ में स्नेहमय आचरण आनन्द का स्रोत है; और यह हमें एक जैविक कारक से अपनी माताओं से प्राप्त होता है। हमारी माताओं के प्रेम-दुलार और उनके दूध से हमारे जीवन की रक्षा हुई है। वह अनुभव हमारे आनुवंशिक तत्वों, हमारे रक्तप्रवाह में समाहित हो चुका है। अब प्रश्न यह है: बच्चे दूसरों से धन और सांस्कृतिक विरासत पाने से कहीं ज़्यादा उनसे प्रेम और स्नेह पाने के लिए लालायित रहते हैं, लेकिन जब वे बड़े होते हैं, और यदि वे समझदार और सयाने न बन जाएं तो उनके जीवन-मूल्यों का ह्रास होने लगता है। ऐसा क्यों होता है, क्योंकि वे अधिक आत्म-केन्द्रित हो जाते हैं। यदि वे दूसरों की मदद करते भी हैं तो उनकी रुचि यह जानने में होती है कि “बदले में मुझे क्या मिलेगा?” इस प्रकार आत्म-केन्द्रित होने की प्रवृत्ति “मैं” के भाव को बढ़ावा देती है जो बड़ी समस्याओं का मूल है। हमें अपने आप को यूरोपीय संघ का या पूरे विश्व का हिस्सा मानते हुए पूरे मानव समाज को “हम” के नज़रिए से देखना चाहिए। हमें दुनिया भर के सात बिलियन लोगों को “हम” की दृष्टि से देखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि हम भी इस “हम” का हिस्सा हैं; हमें अपने छोटे से “मैं” को ही नहीं देखना चाहिए। तो, इस प्रकार हमें अमीर या गरीब, सभी का सम्मान करना चाहिए। सभी को समान अधिकार मिलने चाहिए, आर्थिक दृष्टि से भी और अन्य सभी प्रकार से भी। यदि हम दूसरों की भलाई का खयाल करने लगेंगे तो सम्मान का वह भाव स्वतः ही उत्पन्न हो जाएगा।

यह बात अनिवार्यतः धर्म का हिस्सा नहीं है; धर्म तो एक निजी विषय है; ये सरोकार तो सम्पूर्ण मानवता के सरोकार हैं। यदि हम दूसरे सभी लोगों का सम्मान करेंगे तो किसी का भी शोषण नहीं होगा। इसके अलावा स्नेहमय व्यवहार शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि लगातार विपत्ति और भय हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को कमज़ोर करते हैं, इसलिए जब हम आत्म-केन्द्रित होते हैं तो हमें अपनी ओर से बड़ा भय होता है और दूसरों को लेकर हमारे मन में बड़ा अविश्वास होता है। इससे अकेलेपन और भय का भाव जागृत होता है, जिससे कुंठा जन्म लेती है और अन्ततः क्रोध उत्पन्न होता है। लेकिन जब हम अपने हृदय के द्वार खोल देते हैं और मन में दूसरों का खयाल रखने का भाव रखते हैं तो हमारे भीतर आत्मविश्वास जागृत होता है। आत्मविश्वास के साथ हम ज़्यादा खुलेपन का और पारदर्शी व्यवहार कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में हम अपने आस-पास जिस किसी से भी मिलेंगे, जिस किसी को भी देखेंगे, उन सभी लोगों के साथ हम अपने भाइयों और बहनों जैसा व्यवहार करेंगे; और यदि हमारा व्यवहार स्नेहमय हो और हमारे मन में दूसरों के लिए खयाल हो तो अधिकांश लोगों की प्रतिक्रिया सकारात्मक होगी। लेकिन हमेशा ऐसा होता नहीं है। जब भी मुझे कार से कहीं ले जाया जाता है तो मैं हमेशा रास्ते में चलते लोगों को देखता हूँ और उन्हें देखकर मुस्कराता हूँ। एक बार जर्मनी में जब मैं फुटपाथ पर खड़ी एक महिला को देखकर मुस्करा दिया तो वह बड़ी संदेहशील हो गई, इस प्रकार मेरी मुस्कराहट ने उस महिला को खुशी देने के बजाए उसे भयभीत कर दिया और इसलिए मैंने अपना सिर दूसरी ओर घुमा लिया। लेकिन आम तौर पर ऐसा नहीं होता है।

स्नेहमय व्यवहार हम अपनी माताओं से सीखते हैं, और यह एक ऐसी चीज़ है जिसे हमें जीवनभर अपने साथ रखना चाहिए। विज्ञान सम्बंधी बैठकों में यह नारा दिया जाता है: “स्वस्थ मन, स्वस्थ शरीर”। इसके लिए हमें वास्तविकता को समझना होगा, हमें अपने चित्त को शांत करना होगा; यदि हम परेशान हों तो हम पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाते हैं और हम वास्तविकता को नहीं देख पाते हैं जिससे बहुत सारी समस्याएं जन्म लेती हैं। इस प्रकार स्नेहमय व्यवहार चित्त को शांत रखने में सहायक होता है।

यदि हमारा चित्त शांत न हो तो यह शिक्षा ग्रहण करने में समस्याएं उत्पन्न करता है। यदि हमारा चित्त शांत और प्रसन्न न हो तो कुछ भी सीखने में बड़ी कठिनाई होती है; इस प्रकार शांत चित्त सभी प्रकार के कार्यों को करने और राजनीति सहित सभी प्रकार के व्यवसायों को चलाने में सहायक होता है। संक्षेप में, चित्त की शांति से आत्मविश्वास जागृत होता है और आत्मविश्वास हमें वास्तविकता को और अधिक स्पष्टता से देखने में मददगार होता है जिसके आधार पर हम अपने व्यवहार को और अधिक स्नेहमय बना सकते हैं।

ये सब धर्मनिरपेक्ष नैतिक आचरण के मूल सिद्धांत हैं और सुखमय जीवन की कला की यही कुंजी है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मुझे तो ये सिद्धांत बहुत उपयोगी लगे हैं। यदि आपको यह उचित लगता है, तो आप इसका अभ्यास करने का प्रयास करें। यदि यह आपको उचित नहीं लगता है, तो इसे भूल जाइए। धन्यवाद।