बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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त्सेनशाब सेरकोँग रिंपोछे का जीवन-परिचय

अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन, 1998

भाग छह : बौद्ध उपासकों के लिए रिंपोछे का सामान्य उपदेश

रिंपोछे सदैव इस बात पर बल देते थे कि लामाओं का लिहाज़ रखा जाना चाहिए और उनका समय व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए। उनका सुझाव था कि स्‍पीति के भक्तों जैसा आचरण करने से बचना चाहिए। रिंपोछे को आनुष्ठानिक स्कार्फ़ (कााता) भेंट करने के लिए कतारबद्ध खड़े होते समय उनके भक्तजन उस समय तक प्रतीक्षा करते रहते थे जब तक कि वे सीधे उनके सामने न पहुँच जाएं और फिर प्रत्येक भक्त अपनी बारी आने पर उन्हें साष्टांग प्रणाम करता था। इस प्रकार की प्रक्रिया को पूरा होने में कई घंटों का समय लग सकता है। इसके अलावा, रिंपोछे का कहना था कि किसी लामा से प्रश्न पूछते समय कोई लम्बी कथा नहीं कहनी चाहिए और न ही नाटकीय प्रदर्शन करना चाहिए। दरअसल, उन्होंने मुझे निर्देश दिया था कि ऐसे प्रश्नों का शाब्दिक अनुवाद न किया जाए, बल्कि सीधे मूल विषय का उल्लेख किया जाए।

इसके अलावा रिंपोछे यह पसन्द नहीं करते थे कि आगन्तुक उन्हें सदा ही आनुष्ठानिक स्कार्फ़ भेंट करें और वह भी “घटिया” बिस्कुटों के डिब्बों के साथ। उनका कहना था कि जो लोग किसी लामा को भेंटस्वरूप कुछ देना चाहते हैं उन्हें किसी ऐसी वस्तु का चुनाव करना चाहिए जो भेंट पाने वाले के लिए उपयोगी हो या उसे रुचिकर लगे। इसके अलावा, जब कोई व्यक्ति बार-बार उनसे मिलने के लिए आता, जैसा कि मैं किया करता था, तो वे उस व्यक्ति को उपहार लाने के लिए मना कर देते थे। उन्हें कुछ पाने की न तो लालसा थी और न आवश्यकता।

रिंपोछे सदा लोगों को व्यावहारिक बुद्धि का प्रयोग करने की सलाह देते थे। इसलिए उन्हें यह बात पसन्द नहीं थी कि लोग साधारण विषयों पर सलाह माँगने के लिए उनसे शकुन विचार करने का अनुरोध करें। शकुन विचार के लिए अनुरोध करना केवल उसी स्थिति में युक्तिसंगत है जब, विशेष तौर पर आध्यात्मिक विषयों के मामले में, सामान्य उपायों से समस्या का समाधान न हो पा रहा हो। एक बार मेरे सामने किराए को लेकर एक समस्या थी जिसके बारे में मैंने उनसे शकुन विचार करके यह बताने के लिए अनुरोध किया कि मुझे क्या करना चाहिए। रिंपोछे ने मुझे यह कहते हुए अपने पास से खदेड़ दिया कि मैं किसी वकील से जाकर मिलूँ।

इसके अलावा, किसी भी प्रकार के कार्यक्रम की योजना बनाते समय रिंपोछे हमेशा कम से कम तीन सम्भावित योजनाएं बनाने की सलाह देते थे। इस प्रकार की रणनीति से मिलने वाली लचीलेपन की सुविधा किसी एक योजना के विफल हो जाने की स्थिति में असहाय हो जाने के भय से बचाव करती है। एक से अधिक विकल्प उपलब्ध रहने की स्थिति में इस विश्वास के कारण सुरक्षा का भाव बना रहता है कि कम से कम कोई एक योजना तो सफल होगी।

लेकिन कभी-कभी शिष्य शकुन-विचार पर निर्भर हो जाते हैं और अपने निर्णय स्वयं करना बंद कर देते हैं। अपने जीवन की ज़िम्मेदारियों से बचने वाले ऐसे लोग चाहते हैं कि कोई दूसरा उनके जीवन के निर्णय ले। हालाँकि प्रमुख निर्णयों के लेते समय आध्यात्मिक गुरु से परामर्श लेना अक्सर उपयोगी होता है, लेकिन संतुलित तरीका यही है कि आध्यात्मिक गुरु के गुणों को आत्मसात कर लिया जाए। फिर चाहे लामा शिष्य के सम्मुख उपस्थित न भी हों, तब भी ये सद्गुण सबसे उपयुक्त मार्ग का चुनाव करने में सहायता करेंगे।

रिंपोछे लोगों की इस प्रवृत्ति के भी विरुद्ध थे जिसके वशीभूत होकर वे अनेक लामाओं से एक ही विषय पर अलग-अलग तब तक शकुन विचार करवाते रहते हैं जब तक कि उन्हें मनोवांछित उत्तर न मिल जाए। शकुन-विचार के लिए किए जाने वाले अनुरोध में यह बात निहित होती है कि आप लामा पर विश्वास और भरोसा करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि शकुन बताने वाले व्यक्ति की सलाह के अनुसार ही कार्रवाई करनी चाहिए। इसके अलावा रिंपोछे यह सलाह भी देते थे कि किसी लामा के पास जा कर यह नहीं कहना चाहिए कि किसी दूसरे गुरु ने अमुक-अमुक राय दी है, लेकिन इस सम्बंध में आपका क्या विचार है? क्या मुझे वैसा करना चाहिए? किसी लामा को ऐसे असमंजस की स्थिति में डालना जहाँ उसे किसी दूसरे आध्यात्मिक गुरु को गलत बताना पड़े, लोगों की असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

दरअसल, पश्चिम जगत के अधिकांश लोगों को लामाओं से प्रश्न पूछने की सही रीति मालूम ही नहीं होती है। जब वे आकर उनसे अज्ञानतापूर्ण प्रश्न पूछते तो रिंपोछे सामान्य तौर पर उनकी गलती को सुधार देते। उदाहरण के लिए जब किसी व्यक्ति को यह न मालूम हो वह किसी अभिषेक अनुष्ठान में शामिल हो या नहीं, तो इस प्रकार का प्रश्न पूछना हास्यास्पद होगा, “क्या इस दीक्षा अनुष्ठान में शामिल होना हितकर होगा?” ज़ाहिर है कि यह हितकर होगा, हम यह नहीं कह सकते कि यह अहितकर होगा। और यदि कोई पूछता है, “मैं इस अनुष्ठान में भाग लूँ या न लूँ?” तो आशय होता है “क्या मेरे लिए भाग लेना बाध्यकारी है या नहीं?” अनुष्ठान में भाग लेना किसी के लिए भी बाध्यकारी नहीं होता है। ऐसे मामलों में किसी आध्यात्मिक गुरु की सलाह माँगते समय सबसे अच्छा प्रश्न होगा, “इस विषय पर आपकी क्या राय है, मुझे क्या करना चाहिए?”

इसके अलावा, अभिषेक अनुष्ठान सम्पन्न करा रहे किसी लामा के समक्ष पहुँच कर यह पूछना मूर्खतापूर्ण होगा, “क्या मैं दीक्षा प्राप्त कर सकता हूँ या नहीं?” इसका निहितार्थ होगा, “क्या मैं सक्षम हूँ अथवा नहीं?” जो कि एकदम बेतुकी बात है। इस बात को कहने का सही ढंग होगा, “क्या मैं आपकी कृपा से अभिषेक ग्रहण कर सकता हूँ?” जैसे किसी दूसरे देश में वीज़ा की अवधि बढ़ाए जाने का अनुरोध करते समय कोई मूढ़ व्यक्ति ही यह प्रश्न पूछेगा, “क्या मैं इस देश में और अधिक समय तक रह सकता हूँ या नहीं?” कोई परिपक्व व्यक्ति इस प्रकार अनुरोध करेगा, “आपकी अनुमति से मैं यहाँ कुछ और समय तक रहना चाहूँगा।“

एक बार टर्नर ने कई महीनों तक बार-बार अनुरोध करके रिंपोछे को परेशान कर दिया कि वे उसे षट्बाहु देवात्मा महाकाल का आह्वान करने के लिए अनुज्ञा प्रदान करें। आखिरकार जब रिंपोछे इसके लिए सहमत हो गए तो टर्नर ने उनसे पूछा कि उनकी दैनिक सस्वर पाठ करने की प्रतिबद्धता क्या होगी। रिंपोछे ने उन्हें यह कहते हुए बहुत लताड़ा कि ऐसी स्थिति में उन्हें प्रतिबद्धता के रूप में कुछ भी करने के लिए तैयार होना चाहिए।

जब किसी दीक्षा के बदले में प्रतिबद्धता को लेकर पश्चिम के अनुयायी सौदेबाज़ी करते तो रिंपोछे बहुत नाराज़ होते थे। वे हमेशा इस बात पर ज़ोर देते थे कि दीक्षा केवल किसी बुद्ध स्वरूप की उपासना के लिए ही ली जाए क्योंकि उसके पीछे सभी के हित के लिए ज्ञानोदय प्राप्त करने की भावना होती है। रिंपोछे मानते थे कि केवल “सद्भावनाओं” की खातिर, या हर कोई वहाँ जा रहा है, इस कारण से किसी दीक्षा समारोह में शामिल होना बेतुकी बात है। इसके अलावा, केवल अनुभव के लिए थोड़ा सा एकान्तवास करने और फिर साधना को भुला देने के लिए जाना भी अनुचित है। किसी तंत्र साधना के लिए प्रतिबद्धता पूरे जीवन काल के लिए होती है।

रिंपोछे इस बात पर बल देते थे कि किसी आध्यात्मिक साधना को शुरू करने से पहले उस साधना और सम्बंधित गुरुओं के बारे में छानबीन कर लेनी चाहिए, इस काम को बाद में किए जाने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। रिंपोछे को पश्चिम के अनुयायियों में यही सबसे बड़ी कमी दिखाई देती थी। हम लोग जल्दबाज़ी करते हैं। रिंपोछे सावधान करते हुए कहते थे कि हमें उस मूर्ख व्यक्ति की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए जो बिना विचारे एक जमी हुई झील में दौड़ता चला गया और फिर पलट कर एक लकड़ी की सहायता से यह जाँच करने लगा कि जमी हुई बर्फ़ इतनी मज़बूत है कि नहीं कि उसके वज़न को सहन कर सके।

रिंपोछे कहते थे कि लोग चाहें तो किसी भी गुरु के उपदेश में शामिल हो सकते हैं, गुरु के सभावस्त्र को, या गुरु के कमरे में रखे बुद्ध के चित्र को भी साष्टांग प्रणाम कर सकते हैं। किन्तु उस गुरु का शिष्य बनना एक अलग बात है। उन्होंने मुझसे भी कहा कि मैं किसी भी लामा के लिए अनुवाद कर सकता हूँ, लेकिन किसी के लिए काम करने से वह व्यक्ति मेरा आध्यात्मिक गुरु नहीं बन जाएगा। किसी के लिए यदि मैं किसी तांत्रिक दीक्षा का भी अनुवाद करूँ, तब भी वही बात लागू होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरु के प्रति हमारा रवैया कैसा है।

रिंपोछे का यह भी विचार था कि कुछ पाश्चात्य लोग बौद्ध भिक्षु या भिक्षुणियाँ बनने में बहुत जल्दबाज़ी करते हैं। वे यह विचार नहीं करते कि क्या वे वास्तव में जीवन भर भिक्षु या भिक्षुणियाँ बन कर रहना चाहते हैं या नहीं। अक्सर वे यह नहीं सोचते कि उनके दीक्षा ग्रहण कर लेने से उनके माता पिता पर क्या प्रभाव पड़ेगा, या माता पिता भविष्य में अपने जीवन का निर्वाह किस प्रकार करेंगे। निःसंदेह यदि कोई व्यक्ति प्राचीन काल के महान त्यागी साधकों के जैसा हो तो फिर उसे परिवार या धन-सम्पत्ति जैसे विषयों की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन हम स्वयं जानते हैं कि हम महान योगी मिलारेपा जैसे हैं या नहीं।

इस सम्बंध में रिंपोछे अक्सर द्रुबकांग गेलेग-ग्यात्सो का उदाहरण दिया करते थे। युवावस्था में इस महान तिब्बती आचार्य की इच्छा थी कि वह भिक्षु बने, लेकिन उसका परिवार इस निर्णय से बहुत नाखुश था। इसलिए जब तक उसके माता पिता जीवित रहे, द्रुबकांग ने उनकी भली प्रकार से सेवा की, और फिर जब उनका देहांत हो गया तो उसने उत्तराधिकार में मिली सम्पत्ति को भलाई के कार्यों के लिए दान कर दिया। इसके बाद जाकर ही वह भिक्षु बना।

रिंपोछे सदा माता-पिता का सम्मान और सेवा किए जाने पर बल देते थे। हम पश्चिम के बौद्ध अनुयायी धाराप्रवाह रूप से हर किसी को अपने पूर्व जन्मों के माता-पिता के रूप में पहचानने और उनकी भलाई का बदला भलाई से चुकाने की बात करते हैं। लेकिन अपने व्यक्तिगत जीवन में हममें से बहुत से लोग अपने इस जीवन के माता पिता के साथ भी अच्छे सम्बंध नहीं रख पाते हैं। रिंपोछे सिखाते थे कि अपने माता पिता की सेवा करना और उनके साथ अच्छा व्यवहार करना एक महान बौद्ध परम्परा है।

यदि कोई व्यक्ति भिक्षु या भिक्षुणी बनने से पहले अच्छी तरह से छानबीन कर लेता है, या यदि कोई व्यक्ति मठवासी होने की दीक्षा ले चुका हो तो ऐसे लोगों को किसी चमगादड़ की भांति आधे-अधूरे ढंग से साधना नहीं करनी चाहिए। जब कोई चमगादड़ पक्षियों के बीच होता है और पक्षियों का अनुसरण नहीं करना चाहता है तो कहता है, “अरे! मैं ऐसा नहीं कर सकता। मेरे तो दाँत हैं।“ चूहों की संगत में होने पर वह कहता है, “नहीं, मैं वैसा नहीं कर सकता। मेरे तो पंख हैं।“ इस उदाहरण जैसा व्यवहार करना भिक्षु के चोगे का अपनी सुविधा के लिए इस्तेमाल करने जैसा है। ऐसे लोगों को जब आर्थिक रूप से अपना भरण-पोषण करने जैसे गृहस्थ जीवन के दायित्व रास नहीं आते हैं तो वे अपने लबादे की आड़ लेते हैं। जब उन्हें क्षिक्षु के वस्त्र धारण करके यात्रा करने जैसे मठ सम्बंधी नियम कायदों को मानने की इच्छा नहीं होती तो वे पश्चिमवासी होने का बहाना बनाते हैं। वही बात है जो रिंपोछे कहा करते थे, “आखिर आप किसे मूर्ख बना रहे हैं?”

रिंपोछे कहते थे कि इसका अर्थ यह नहीं है कि बौद्ध साधकों को काम नहीं करना चाहिए। चाहे गृहस्थ हो या दीक्षा प्रात्त साधक, सभी को व्यावहारिक और वास्तविकता पर आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। रिंपोछे की शिक्षा थी कि हम अपने शरीर में किस प्रकार से जीते हैं उससे कहीं महत्वपूर्ण है कि हम अपने चित्त और वाणी में किस प्रकार का जीवन जीते हैं। इसलिए वे सलाह देते थे कि गहन साधना करने वाले जिन साधकों को अपना गुज़ारा चलाने की आवश्यकता होती हैं उन्हें छोटे काम करने चाहिए। इस प्रकार काम करते हुए हम मंत्रों का उच्चार करते रहें और सद्भावना और हितकारी विचारों का प्रसार करते रहें। यदि काम करते समय बुद्ध की शिक्षाओं का चिन्तन करना कठिन हो और यदि हमने तंत्र की दीक्षा ले रखी हो तो कम से कम हम अपने मन में अपनी छवि को बदल सकते हैं। दिन भर हम यह कल्पना करने का प्रयास कर सकते हैं कि हम एक बोधिसत्व हैं और हम एक ऐसी पुण्य भूमि पर हैं जहाँ का वातावरण आध्यात्मिक संवर्धन के लिए सर्वथा उपयुक्त है। और फिर तड़के सुबह या रात्रि के समय हम साधनाओं के विस्तृत मानस दर्शन का अभ्यास कर सकते हैं। रिंपोछे सदा इस बात पर बल देते थे कि बुद्ध धर्म का पालन जीवन से पृथक होकर नहीं करना चाहिए।

टर्नर कई वर्षों तक इंग्लैंड में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ सामाजिक कल्याण के नाम पर मिलने वाली सरकारी सहायता से अपना गुज़ारा चलाते रहे। उन्होंने अपना लगभग पूरा समय गहन एकांतवास की साधनाओं में व्यतीत किया। उन्हें लगता था कि जब वे बुद्ध की शिक्षाओं की साधना कर सकते हैं तो फिर कोई कारोबार करने में समय व्यर्थ क्यों गँवाया जाए। पूर्व वे रिंपोछे से धन-सम्पत्ति से जुड़े संरक्षक दूत श्वेत महाकाल की साधना की अनुज्ञा प्राप्त कर चुके थे और हर दिन प्रार्थना करते थे कि उनकी वित्तीय समस्याएं हल हो जाएं। रिंपोछे इस सबसे बिल्कुल भी खुश नहीं थे। रिंपोछे कहते कि यह तो ऐसी स्थिति है जैसे कोई रोगी बुद्ध नाम की औषधि से प्रार्थना करता हो कि वह रोगमुक्त हो जाए लेकिन ओषधि का सेवन न करता हो। उन्होंने टर्नर को सलाह दी कि वे कोई काम-धंधा कर लें और सुबह और रात को कम समय के लिए गहन साधना का अभ्यास किया करें। तब श्वेत महाकाल का आह्वान करने से उनका कारोबार आर्थिक दृष्टि से सफल होगा।

रिंपोछे चाहते थे कि साधक व्यावहारिक और कार्यकुशल बनें और हतबुद्धि हो कर न रहें। इसलिए वे हमेशा यही चाहते थे कि साधना और मंत्रोच्चार का कार्य शीघ्रता से किया जाए। एक बार मिलान, इटली स्थित घेफेलिंग विहार के शिष्यों ने रिंपोछे से आग्रह किया कि वे मार्ग के क्रमिक चरणों (लाम-रिम) और अवलोकितेश्वर की साधना के पाठ्यक्रम के समापन के अवसर पर ध्यान साधना सत्र का सम्पादन करें। रिंपोछे इसके लिए सहमत हो गए और उन्होंने शिष्यों को स्वयं को छह-गुना वाली प्रक्रिया की सहायता से अवलोकितेश्वर के रूप में प्रस्तुत करने और फिर लाम-रिम के कई दर्ज़न बिन्दुओं पर ध्यान केन्द्रित करने का निर्देश दिया, और यह सब उन्हें दो मिनट की अवधि के लिए करना था। जब शिष्यों ने अविश्वास और नाखुशी ज़ाहिर की कि रिंपोछे ने उन्हें इस कार्य के लिए बहुत थोड़ा समय दिया है, तो रिंपोछे ने उन्हें रियायत देते हुए कहा, “ठीक है, आप इस प्रक्रिया को तीन मिनट तक कर सकते हैं।“ फिर रिंपोछे ने इसे समझाते हुए कहा कि एक अच्छा साधक लाम-रिम की पूरी प्रक्रिया को उतनी ही देर में पूर्ण कर सकता है जितना समय उसे घोड़े पर सवार होते समय रकाब में अपना पैर रखने में लगता है। जब मृत्यु आती है तो धीमी और क्रमिक प्रक्रिया के माध्यम से मानस दर्शन करने के लिए समय उपलब्ध नहीं होता है।

रिंपोछे बौद्ध धर्म के पालन में व्यावहारिक बने रहने की आवश्यकता पर बल देते थे। यह बात तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब हम दूसरों का हित करने के अभिलाषी बोधिस्त्व की भांति व्यवहार करने की कामना रखते हैं। हालाँकि अपनी ओर से हमें सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए, लेकिन हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि हमारी सहायता को ग्रहण करने के लिए दूसरे लोगों की ग्रहणशीलता और हमारे प्रयासों की सफलता अन्ततोगत्वा उन लोगों के कर्म ─ उनकी चित्तवृत्ति को निर्मित करने वाली पिछली परिस्थितियों पर पर निर्भर करेगी। इसलिए रिंपोछे सावधान करते थे कि हम ऐसे मामलों में सहायता करने की पेशकश न करें जो हमसे सम्बंधित नहीं हैं या जब दूसरे लोग हमारी सहायता को ग्रहण करने के लिए इच्छुक न हों। ऐसी स्थिति में हमारी दखलंदाज़ी लोगों की नाराज़गी का कारण बनेगी और, यदि हमारी सहायता नाकाम रहती है, तो उस नाकामी का सारा दोष भी हमारे सिर ही मढ़ा जाएगा।

बेहतर तो यही है कि हम दूसरों के मामले में संयत व्यवहार करें। हम दूसरों को कह सकते हैं कि हम उनकी सहायता करने के लिए तैयार हैं, और यदि वे हमारी सहायता माँगते हैं, तब निश्चित तौर पर हम उनके मामलों में दखल दे सकते हैं। लेकन हमें अपने आप को “भाड़े के बोधिसत्व” के रूप में प्रचारित करने से बचना चाहिए। सबसे अच्छा व्यवहार तो यही है कि हम अपनी दैनिक ध्यान साधना करते रहें और अपने जीवन में विनम्रता का व्यवहार करें। रिंपोछे विशेष तौर पर इस बात के प्रति आगाह करते थे कि हम जितना कर सकते हैं उससे अधिक का वचन न दें और ऐसा प्रचार न करें कि हम भविष्य में अमुक-अमुक कार्य करेंगे या कर देंगे। इससे सिर्फ बाधाएं ही उत्पन्न होती हैं, और अन्त में जब हम अपनी घोषणाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर पाते हैं तो हम स्वयं को मूढ़ सिद्ध करते हैं और हमारी साख़ भी चली जाती है।

अपनी क्षमता से अधिक करने का वचन न देने की यह शिक्षा हमारे आध्यात्मिक गुरु के साथ हमारे सम्बंध के मामले में विशेष तौर पर लागू होती है। रिंपोछे सदा अश्वघोष द्वारा रचित आध्यात्मिक गुरु को समर्पित पचास छंद, जिसका वे अपनी साधना के अभ्यास के अंग के रूप में दैनिक उच्चार किया करते थे, में दिए गए दिशानिर्देशों का पालन करने की शिक्षा देते थे। यदि हमारे गुरु हमें कोई ऐसा करने का दायित्व सौंपते हैं जिसे हम किसी कारण से सम्पादित नहीं कर सकते तो फिर हमें बहुत विनम्रतापूर्वक और आदरपूर्वक स्पष्टीकरण देना चाहिए कि हम क्यों उस कार्य को कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। रिंपोछे इस बात पर ज़ोर देते थे कि आध्यात्मिक गुरु के प्रति पूरे मन से समर्पण का अर्थ गुलाम या रोबोट बनना नहीं है, बल्कि उद्देश्य तो यह है कि हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें, स्वतंत्र चिन्तन कर सकें, और प्रबुद्ध बन सकें। यदि हम अपने गुरु की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर पाते हैं, तो यह सोचना सरासर गलत होगा कि हमने अपने अनुभवी परामर्शदाताओं को निराश किया है और हम अच्छे शिष्य नहीं हैं। कोई भी योग्य आध्यात्मिक गुरु इतना निर्दयी नहीं होता है कि वह शिष्यों से अव्यावहारिक अपेक्षाएं रखे।

चाहे हमारे गुरुजन हों या कोई अन्य, जब हम किसी के लिए कुछ करना स्वीकार करते हैं, तो ऐसी स्थिति में रिंपोछे की सलाह होती थी कि प्रारम्भ में ही सब बातों को स्पष्ट कर लेना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि हम किसी भोले-भाले परोपकारी व्यक्ति की भांति किसी कार्य को करना स्वीकार कर लें, और फिर उस कार्य को करते समय या कर लेने के बाद हम घोषणा करें कि हम बदले में कुछ पाने की अपेक्षा करते हैं। रिंपोछे सिखाते थे कि यदि हम व्यावहारिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाएं और दूरदृष्टि से काम लें तो अपने सांसारिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों को बखूबी प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम अव्यावहारिक और अयार्थवादी बनेंगे और बिना विचारे जल्दबाज़ी में निर्णय करेंगे, तो दोनों प्रकार के उद्देश्य विफल हो जाएंगे।

रिंपोछे पश्चिम के बौद्ध केन्द्रों को भी यही दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देते थे। इन केन्द्रों को उनकी सलाह थी कि वे इतने बड़े बनने से बचें कि वे ऋणों के बोझ से दब जाएं ऐसी परियोजनाओं के वादे न करें जिन्हें वे सम्भवतः लागू या पूरा न कर सकें। वे कहते थे कि ये केन्द्र छोटे पैमाने पर सादगीपूर्ण शुरुआत करें और दूरदराज़ के देहाती क्षेत्रों में केन्द्रों की स्थापना करने से बचा जाए। बौद्ध केन्द्र इस प्रकार स्थित हों कि शहरवासियों को वहाँ तक पहुँचने में सुविधा हो और मठवासी केन्द्र के आसपास अपने लिए कामकाज तलाश सकें। मठवासियों का समूह जब भी चाहे केन्द्र को बेच कर बड़ी जगह खरीद सकता है, लेकिन यह कार्य उचित समय पर किया जाना चाहिए।

बौद्ध केन्द्रों का उद्देश्य किसी सर्कस की भांति दिखावे के विज्ञापन से भारी भीड़ को अपनी ओर आकर्षित करना नहीं है। रिंपोछे सदा केन्द्रों में शिष्यों के छोटे समूह ही पसन्द करते थे। इसके अलावा आध्यात्मिक गुरु का चुनाव करने का मुख्य आधार यह नहीं होना चाहिए कि वह व्यक्ति कितना दिलचस्प है या उसके सुनाए किस्से कितने दिलचस्प होते हैं। यदि हास्य-विनोद या कुछ आकर्षक देखना ही हमारा मकसद है तो इसके लिए हम सर्कस के विदूषकों को या किसी और प्रकार के प्रदर्शन को देखने के लिए जा सकते हैं।