बर्ज़िन आर्काइव्स

डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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त्सेनशाब सेरकोँग रिंपोछे का जीवन-परिचय

अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन, 1998

भाग चार : महान शिक्षक के प्रति रिंपोछे का दृष्टिकोण

पूरे मन से आध्यात्मिक गुरु के प्रति समर्पण बौद्ध आचरण की सबसे कठिन और उत्कृष्ट साधनाओं में से एक है। गुरु के साथ सम्बंध स्थापित करने और उसे बनाए रखने के लिए विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। लेकिन एक बार यह सम्बंध दृढ़ता से स्थापित हो जाए तो कोई शक्ति उसे तोड़ नहीं सकती है। सेरकोँग रिंपोछे ने यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किए कि उनके और मेरे बीच का सम्बंध इसी प्रकार का हो। मुंडगोड में महान मोनलाम महोत्सव की समाप्ति पर एक शाम रिंपोछे ने मुझे वहाँ उनकी सम्पत्ति की वित्तीय स्थिति के बारे में जटिल कथा सुनाई। हालाँकि उनके दूसरे अनुचर को यह बात अनावश्यक लगी, लेकिन रिंपोछे ने कहा मेरे लिए यह सब जान लेना आवश्यक है। वह यह सुनिश्चित कर लेना चाहते थे कि बाद में यदि मैं किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति से इस विषय पर कोई झूठी अफवाह सुनूँ तो मेरे मन में उनकी ईमानदारी या पूरे मन से उनके प्रति मेरी आस्था के विषय में कोई संदेह न रहे।

किसी आध्यात्मिक गुरु के प्रति पूरे मन से समर्पित होने के लिए यह आवश्यक होता है कि संभावित शिष्य और गुरु लम्बे समय तक एक दूसरे की परख कर लें। हालाँकि सावधानीपूर्वक जाँच-परख कर लेने के बाद शिष्यों को अपने लामाओं में बुद्ध का प्रतिरूप देखना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आध्यात्मिक गुरु अमोघ होते हैं। शिष्यों को सदा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उनके गुरु क्या कहते हैं और, यदि आवश्यक हो, तो विनम्रतापूर्वक उन्हें सुझाव देने चाहिए। सदा सजग रहते हुए उन्हें अपने लामाओं के असामान्य कथन या व्यवहार को विनयपूर्वक संशोधित करना चाहिए।

एक बार रिंपोछे ने फ्रांस स्थित नालन्दा मठ में पाश्चात्य भिक्षुओं के समक्ष इस शिक्षा का प्रदर्शन किया। एक उपदेश के दौरान उन्होंने जानबूझ कर किसी विषय की बिल्कुल गलत व्याख्या प्रस्तुत की। हालाँकि जो रिंपोछे ने कहा था वह एकदम चौंका देने वाला था, लेकिन सभी भिक्षु सम्मानपूर्वक उनके वचनों को अपनी पुस्तिकाओं में लिखते रहे। अगले सत्र में रिंपोछे ने उन भिक्षुओं को यह कहते हुए फटकार लगाई कि एक घंटे पहले उन्होंने एक विषय की एकदम हास्यास्पद और गलत ढंग से व्याख्या की थी। फिर किसी ने भी इस प्रश्न को क्यों नहीं उठाया? उन्होंने भिक्षुओं से कहा, जैसा कि स्वयं बुद्ध ने अपनी शिक्षा में कहा था, गुरु जो कुछ कहे उसे आँख मूँद कर और गुण-दोष की विवेचना किए बिना कभी स्वीकार न करो। यहाँ तक कि बड़े से बड़े आचार्य भी कभी-कभी अपनी बात को कहने में गलती करते हैं; अनुवादक अक्सर गलतियाँ करते हैं; और शिष्य तो याददाश्त के लिए टिप्पणियाँ लिखते समय गलतियाँ करते ही हैं। यदि कोई बात असामान्य लगे तो शिष्यों को सदा इस सम्बंध में प्रश्न पूछना चाहिए और महान ग्रंथों की सहायता से प्रत्येक बिन्दु की सत्यता की जाँच करनी चाहिए।

व्यक्तिगत तौर पर रिंपोछे प्रामाणिक भाष्यों के बारे में भी प्रश्न उठाते थे। इस प्रकार वे त्सोंगखापा के उदाहरण का अनुसरण करते थे। चौदहवीं शताब्दी के इस सुधारक ने पाया कि भारतीय और तिब्बती आचार्यों के कुछ ग्रंथों में या तो परस्पर विरोधी विचार व्यक्त किए गए थे, या फिर अतार्किक बातें कही गई थीं। त्सोंगखापा ने ऐसे विषयों का पता लगाकर उनकी समीक्षा की और या तो उन मतों को अस्वीकार किया जिन्हें तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता था या फिर उन अंशों की नई व्यावहारिक व्याख्याएं दीं जिनका अर्थ पहले गलत समझा गया था। केवल ग्रंथों का व्यापक ज्ञान रखने वाले और गहन ध्यान साधना का अनुभव रखने वाले साधक ही लीक से हटकर इस प्रकार की नई पहल करने की योग्यता रखते हैं। रिंपोछे एक ऐसे ही साधक थे।

उदाहरण के लिए, अपने निधन से कुछ समय पहले रिंपोछे ने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे त्सोंगखापा के सबसे कठिन दार्शनिक ग्रंथ व्याख्येय तथा निश्चित अर्थों की उत्कृष्ट स्पष्टीकरण का सार का एक अंश मुझे दिखाया। अपने दैनिक अभ्यास के लिए रिंपोछे सैकड़ों पृष्ठ वाले इस ग्रंथ की अपनी स्मृति से हर दिन व्याख्या किया करते थे। वह अंश चित्त से भ्रम दूर करने के विभिन्न सोपानों, और विशेषतः भ्रम के “बीजों” अर्थात मूल के विषय से सम्बंधित था। मान्य टीकाओं में इन बीजों की व्याख्या ऐसी परिवर्तनशील दृश्य प्रपंचों के रूप में की गई है जिनका न तो कोई भौतिक अस्तित्व है और न ही जिनके माध्यम से किसी बात का बोध कराया जा सकता है। इस बिन्दु को अभिव्यक्त करने के लिए मैं “बीजों” के स्थान पर “प्रवृत्तियों” शब्द का प्रयोग कर रहा था। तर्क, अनुभव और ग्रंथ के अन्य अंशों का हवाला देते हुए रिंपोछे ने स्पष्ट किया कि चावल का बीज भी चावल ही होता है। इसी प्रकार भ्रम का बीज भी भ्रम का “अंश” ही होगा। यह क्रांतिकारक व्याख्या अवचेतन को समझने की दृष्टि से विभिन्न आयामों को दर्शाती है।

अपनी अभिनव प्रतिभा के बावजूद रिंपोछे सदैव स्वभाव की विनम्रता और ढोंग रहित आचरण पर बल देते थे। इसीलिए, मुंडगोड मठ के सबसे बड़े लामा होने के बावजूद उन्होंने अपने लिए किसी बड़े और आलीशान मकान का निर्माण नहीं कराया, बल्कि एक साधारण कुटिया में रहते थे। धर्मशाला में भी चार लोगों के लिए तीन कमरे वाला उनका मकान भी अत्यंत साधारण था जहाँ अतिथियों का ताँता लगा रहता था और उनके दो कुत्ते और एक बिल्ली भी इसी मकान में रहते थे।

रिंपोछे स्वयं तो अपनी महानता का प्रदर्शन करने से परहेज़ करते ही थे, साथ ही वे अपने शिष्यों को भी गुरु की शक्ति या प्रतिभा का बखान करने से रोकने का यत्न करते थे। उदाहरण के लिए अनेक साधना अभ्यास आध्यात्मिक गुरु के साथ शिष्य के सम्बंध पर केन्द्रित होते हैं यथा, गुरु-योग कहलाने वाली मानसिक दर्शन करने की विस्तृत प्रक्रिया और लामा के संस्कृत नाम से युक्त मंत्र का बार-बार उच्चारण करना। रिंपोछे सदैव अपने शिष्यों को यही शिक्षा देते कि वे गुरु-योग के अभ्यास के लिए परम पावन दलाई लामा का ही मानसिक दर्शन करें। अपने नाम के मंत्र के विषय में पूछे जाने पर वे सदा अपने पिता के नाम के उच्चारण का निर्देश देते। उनके पिता सेरकोँग दोर्जे-छांग बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ के समय के महानतम साधकों और गुरुओं में से एक थे। वे उस समय के कालचक्र परम्परा के धारक थे, अर्थात ─ वे कालचक्र सम्बंधी ज्ञान और साधना के अनुभव को अगली पीढ़ी के साधकों को अन्तरित करने के लिए सर्वमान्य आचार्य थे।

रिंपोछे की विनम्रता और भी कई रूपों में प्रकट होती थी। उदाहरण के लिए, यात्रा के मामलों में रिंपोछे महात्मा गाँधी का अनुसरण करते। जब तक कि अन्यथा व्यवहार करने के लिए कोई विशेष आवश्यकता न आ पड़ती, रिंपोछे भारतीय रेलों में तीसरी श्रेणी के थ्री-टियर डिब्बों में ही यात्रा करते थे। उन्हें बदबूदार शौचालयों के नज़दीक भी सोना पड़ता तब भी वे तीसरी श्रेणी में ही यात्रा करते थे। जब हम एक साथ पहली बार पश्चिम के दौरे पर निकलने के लिए धर्मशाला से दिल्ली के लिए यात्रा कर रहे थे तब भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई। रिंपोछे ने कहा कि इस साधारण रीति से यात्रा करना बहुत अच्छा है क्योंकि इससे करुणा का भाव जाग्रत करने में सहायता मिलती है। तीनों श्रेणियों के डिब्बे गंतव्य स्थान पर एक ही समय पर पहुँचते हैं, इसलिए नाहक पैसा खर्च करने से क्या लाभ? रिंपोछे को यह बात पसन्द नहीं थी कि लोग उनकी रेल यात्रा के लिए प्रथम श्रेणी के टिकट खरीद कर या उन्हें महँगे आलीशान रेस्तराओं में ले जा कर उन पर व्यर्थ पैसा खर्च करें।

एक बार रिंपोछे स्‍पीति से धर्मशाला लौट रहे थे और मैं तथा कुछ अन्य शिष्य बाज़ार में उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। बहुत सी कारें और बसें बाज़ार से गुज़र गईं लेकिन रिंपोछे उनमें सवार नहीं थे। फिर एक फटेहाल और पुराना ट्रक बाज़ार में दाखिल हुआ। हाथ में अपनी माला लिए रिंपोछे ट्रक के भीड़ भरे केबिन में सवार थे। अपनी सुविधा या दशा की परवाह किए बिना रिंपोछे अपने अनुचरों के साथ स्‍पीति से तीन दिन की यात्रा के बाद इस वाहन में बैठकर वहाँ तक पहुँचे थे।

जब रिंपोछे अपने अनुचरों और मेरे साथ महान मोनलाम महोत्सव के बाद मुंडगोड से लौट रहे थे तो हमें अपनी रेलगाड़ी के लिए दिन भर पूना में प्रतीक्षा करनी पड़ी। एक स्थानीय तिब्बती स्वेटर विक्रेता ने हमें एक होटल में ठहराने का प्रबंध किया। वे खुशी से उस कोलाहल और तपन भरे निम्न श्रेणी के कमरे में ठहर गए। वस्तुतः भारत में रात्रिकालीन बसों में यात्रा अपेक्षाकृत सस्ती और आसान होने के कारण रिंपोछे अक्सर यह सुझाव देते थे कि हम इन्हीं बसों से यात्रा करें। उन्हें भीड़-भाड़ वाले बस अड्डों पर प्रतीक्षा करने में कभी कोई आपत्ति नहीं होती थी। वे हमें बताते थे कि वे ऐसे साधना अभ्यास जानते थे जो उन्हें ऐसे समय में व्यस्त रखते थे। आसपास का कोलाहल, अव्यवस्था और गंदगी कभी उनकी एकाग्रता को भंग नहीं कर पाते थे।

रिंपोछे कभी किसी एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं रुकते थे, बल्कि अक्सर अपना स्थान बदलते रहते थे। उनका कहना था कि इससे आसक्ति पर विजय पाने में सहायता मिलती है। इसीलिए, जब हम दौरे पर होते तो किसी घर में कुछ दिनों से अधिक समय तक नहीं रुकते थे ताकि ऐसा न हो कि अधिक समय तक ठहरने के कारण हम अपने मेज़बानों के लिए बोझ बन जाएं। जब कभी हम किसी ऐसे बौद्ध विहार में ठहरते जहाँ के आचार्य कोई बुज़ुर्ग बौद्ध भिक्षु होते तो रिंपोछे उनके साथ अपने सबसे नज़दीकी मित्र जैसा व्यवहार करते। उन्होंने अपने हार्दिक सम्बंधों को कभी किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रखा।

रिंपोछे जहाँ भी जाते, दिन भर कड़ी साधना करते और रात के समय भी बहुत कम सोते थे। वे विभिन्न लोगों से मुलाकातों के बीच में तो मंत्रों का उच्चार करने और तांत्रिक साधनाओं में व्यस्त रहते ही थे, जब विदेशी आगंतुक आते तब भी जब मैं अनुवाद कर रहा होता उस अवकाश के दौरान भी उनकी साधना का क्रम जारी रहता। वे चलती कारों, रेलों और विमानों में भी साधना करते थे ─ बाहरी परिस्थितियों ने उन्हें कभी प्रभावित नहीं किया। वे इस बात पर बल देते थे कि हम जहाँ भी जाएं या जो भी करें, कठोर दैनिक साधना हमारे जीवन को निरंतरता प्रदान करती है। इससे हमारे अन्दर नम्रता, आत्मविश्वास और स्थायित्व का भाव जाग्रत होता है।

रिंपोछे ने कभी अपनी साधना का प्रदर्शन भी नहीं किया। वे कहते थे कि खाने से पहले भोजन के लिए धन्यवाद देने या उपदेश देने से पहले प्रार्थना करने जैसे कार्य चुपचाप और अकेले में करने चाहिए। यदि भोजन करने से पहले दूसरे लोगों के सामने लम्बे-लम्बे धार्मिक छंदों का उच्चार करने से दूसरों को असुविधा ही होगी, साथ ही उन्हें यह भी अनुभव हो सकता है कि हम उन्हें या तो प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं या फिर उन्हें शर्मिंदा करना चाहते हैं। वे कभी कोई प्रथा या परम्परा दूसरों पर नहीं थोपते थे, बल्कि अपने उपदेश से पहले और बाद में वही प्रार्थनाएं या कर्मकाण्ड करते जो उन्हें आमंत्रित करने वाले विहार में सामान्यतया प्रचलित होते थे।

हालाँकि रिंपोछे परम पावन को तथा तिब्बती और पाश्चात्य मठों को बड़े-बड़े चढ़ावे भेंट किया करते थे, लेकिन उन्होंने कभी शेखी नहीं बघारी और न ही कभी इस सम्बंध में कोई उल्लेख किया। उन्होंने दूसरों को भी ऐसा ही व्यवहार करने की शिक्षा दी। एक बार विलोरबा, इटली में अधेड़ उम्र का एक साधारण सा व्यक्ति रिंपोछे से मिलने के लिए आया। लौटते समय कमरे से बाहर जाते हुए वह कोने की मेज़ पर, कमरे के किसी महत्वपूर्ण स्थान पर नहीं, एक लिफ़ाफ़ा छोड़ गया जिसमें दान के लिए एक बड़ी राशि रखी थी। बाद में रिंपोछे ने कहा कि किसी लामा को चढ़ावा भेंट करने का सही तरीका यही है।

लेकिन रिंपोछे इस बात पर ज़ोर देते थे कि हमारी विनम्रता वास्तविक होनी चाहिए, दिखावटी नहीं। वे ऐसे लोगों को पसन्द नहीं करते थे जो विनम्र होने का दिखावा तो करते हैं लेकिन वास्तव में बड़े घमंडी और अहंकारी होते हैं या स्वयं को बहुत बड़ा योगी समझते हैं। वे खानाबदोश पृष्ठभूमि वाले एक अहंकारी साधक की कथा सुनाया करते थे जो किसी महान लामा से मिलने के लिए गया था। उसने इस प्रकार दिखावा किया जैसे मानव सभ्यता से उसका कभी कोई सम्पर्क न रहा हो और लामा से उनकी मेज़ पर रखे आनुष्ठानिक उपकरणों के विषय में पूछा कि वे सब क्या हैं। जब उसने लामा की बिल्ली की ओर इंगित करते हुए पूछा कि वह कौन सा जानवर है तो लामा ने उसे अपने घर से बाहर निकाल दिया।

रिंपोछे को उस समय विशेष तौर पर अरुचि होती जब कोई साधक अपनी साधना के बारे में दंभपूर्वक डींगें हाँकता। वे कहते कि यदि हम एकान्तवास में साधना के लिए जाना चाहते हैं, या एकान्तवास की साधना पूर्ण कर चुके हैं तो हमें दूसरों के सामने इसका ढोल नहीं पीटना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका तो यह है कि इस प्रकार की साधना की जानकारी हम अपने आप तक ही सीमित रखें और किसी को भी इसके बारे में न बताएं। अन्यथा जब लोग हमारे बारे में बातें करेंगे तो उससे अहंकार, या दूसरों के ईर्ष्या भाव और प्रतिस्पर्धा जैसी नाना प्रकार की बाधाएं उतपन्न हो सकती हैं। कोई नहीं जानता था कि त्सोंगखापा मुख्य रूप से कौन से बुद्ध स्वरूप की तंत्र साधना किया करते थे। वह तो उनके शिष्य खेद्रुबजे ने उनकी मृत्यु से ठीक पहले अपने गोपनीय चढ़ावा पात्र से बासठ आहुतियाँ देते हुए देख लिया तब जा कर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि त्सोंगखापा आंतरिक आनन्द को साकार करने वाले बुद्ध स्वरूप चक्रसमवर के साधक थे। इसी प्रकार, कालचक्र साधना के विशेषज्ञ के रूप में उनकी ख्याति के बावजूद सेरकोँग रिंपोछे की मुख्य निजी साधना के विषय में कोई नहीं जानता।

रिंपोछे अक्सर कदमपा गेशे गण का उल्लेख करते जो अपनी तंत्र साधना की जानकारी को इस प्रकार गुप्त रखते थे कि उनकी मृत्यु हो जाने के बाद उनके चोगों के कोने में बंधे छोटे से वज्र और घंटी को देख कर लोग जान पाते थे कि वे साधक थे। रिंपोछे ने अपने जीवन को इसी उदाहरण के आधार पर जीते थे। सामान्यतया रिंपोछे घर में बाकी सब लोगों के सोने के समय से आधा घंटे पहले सो जाया करते थे और सुबह बाकी लोगों के जागने के थोड़ी देर बाद जागते थे। लेकिन उनके अनुचरों और मैंने अक्सर यह पाया था कि जब उन्हें लगता कि घर के बाकी लोग सो गए हैं तो उनके कमरे की बत्ती जल जाती और घर के बाकी लोगों के जागने से कुछ समय पहले ही बंद होती थी।

एक बार जेगन्दॉर्फ, जर्मनी में रिंपोछे के वरिष्ठ परिचर छोंज़ेला को रिंपोछे के शयन कक्ष में ही सोने का अवसर प्राप्त हुआ। नींद में होने का दिखावा करते हुए छोंज़ेला ने देखा कि रिंपोछे आधी रात को उठे और नारोपद की साधना से सम्बंधित छह योगों की कठिन मुद्राओं का अभ्यास करने लगे। हालाँकि दिन के समय रिंपोछे को सामान्यतया उठने-बैठने और घूमने-फिरने के लिए सहायता की आवश्यकता होती थी, लेकिन वे आवश्यक लचीलेपन और शक्ति के साथ इन योगाभ्यासों को कर सकते थे।

रिंपोछे कभी भी अपने सद्गुणों का प्रदर्शन करने का प्रयास नहीं करते थे। यहाँ तक कि वे अजनबी लोगों से भी अपनी पहचान को छुपाते थे। एक बार एक बुज़ुर्ग इंडोनेशियाई दम्पत्ति ने उन्हें अपनी कार से पेरिस से एम्सटरडम तक यात्रा कराने का प्रस्ताव किया। एम्सटरडम पहुँचने पर उस दम्पत्ति ने रिंपोछे को अपने घर भोज पर आमंत्रित किया। बाद में, जब स्थानीय बौद्ध विहार के अधिकारियों ने टेलीफोन करके उस दम्पत्ति को रिंपोछे का उपदेश सुनने के लिए आमंत्रित किया तब जाकर उन्हें मालूम हुआ कि उनका अतिथि असल में कौन था। उन्होंने तो रिंपोछे को कोई साधारण, वृद्ध और स्नेहशील भिक्षु ही समझा था।

अपनी विदेश यात्राओं के दौरान रिंपोछे इसी भावना के साथ कभी-कभी बच्चों के साथ शतरंज खेलते, या अपने युवा अनुचर ङावंग को शतरंज खेलने के लिए कहते और स्वयं दोनों ओर के खिलाड़ियों की सहायता करते थे। बच्चे उनमें सिर्फ एक भद्र पितामह का रूप देखते थे। एक बार क्रिसमस के समय रिंपोछे जब म्यूनिख, जर्मनी की सड़कों पर घूम रहे थे, तो बच्चे उनके लाल चोगे को देखकर यह सोच कर उनके पीछे-पीछे चलने लगे कि वे सांता क्लॉस हैं।

रिंपोछे यह भी ज़ाहिर नहीं करते थे कि वे अच्छी-खासी अंग्रेज़ी भाषा जानते थे। रिंपोछे के निधन से एक महीना पहले, स्‍पीति में कालचक्र दीक्षा के बाद मैंने उनसे ताबो मठ से धर्मशाला लौटने की अनुमति ली। मैंने साथ लौटने वाले पश्चिम के लोगों के एक समूह के लिए एक किराए की बस की व्यवस्था की थी और अब चलने का समय हो चुका था। लेकिन एक विदेशी महिला आखिरी समय पर घाटी में बीस मील अन्दर क्यी मठ देखने के लिए गई थी और अभी तक वापस नहीं लौटी थी। जिस समय मैं उस महिला की खबर लेने के लिए क्यी मठ गया हुआ था तभी एक इतालवी शिष्य रिंपोछे से मिलने के लिए पहुँचा, लेकिन उसके पास कोई अनुवादक नहीं था। रिंपोछे, जिन्होंने इससे पहले कभी किसी विदेशी से अंग्रेज़ी भाषा में कोई बात नहीं की थी, पलट कर इतालवी शिष्य से एकदम सधी हुई अंग्रेज़ी में पूछा, “अलेक्स कहाँ है?” जब उस शिष्य ने चौंक कर कहा, “किन्तु रिंपोछे, आप तो अंग्रेज़ी नहीं बोलते,” तो रिंपोछे केवल हँस कर टाल गए।