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डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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धर्म को अपने जीवन में समाहित करना

अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन
बोक, पोलेंड, दिसम्बर 2002

जीवन की समस्याओं को हल करने में धर्म की उपयोगिता

आज शाम मैं दैनिक जीवन में धर्म के व्यवहार के बारे में चर्चा करना चाहूँगा। धर्म शब्द का अर्थ निवारक उपाय होता है। जीवन में समस्याओं से बचने के लिए हम यह उपाय करते हैं। धर्मपरायण बनने के लिए सबसे पहले तो हमें जीवन की विभिन्न प्रकार की समस्याओं को समझना होगा। दूसरी बात यह समझनी होगी कि धर्म का पालन हमें इन समस्याओं से छुटकारा दिलाता है।

धर्म के पालन का अर्थ स्वस्ति-भाव रखना, या कोई अच्छा रुचिकर कार्य करना, या फैशनेबल हो जाना या ऐसा ही कोई दूसरा कार्य करना मात्र नहीं होता है। धर्म के अनुशीलन का उद्देश्य हमें समस्याओं से मुक्ति दिलाना है। इसका अर्थ यह हुआ कि वास्तविक अर्थ में धर्म के अनुशीलन की डगर आसान नहीं होने वाली है। हमें दरअसल अपने जीवन की अप्रिय स्थितियों ─ कठिन परिस्थितियों का सामना करना होगा ─ हमें उनसे भागना नहीं है, बल्कि इस निश्चय के साथ उनका सामना करना है कि अब हम उन्हें हल करने के लिए प्रयास करेंगे।

हमारी समस्याएं अनेक प्रकार की हो सकती हैं। उनमें से अधिकांश से हम परिचित हैं ─ हम अपने आप को असुरक्षित महसूस करते हैं; दूसरो के साथ हमारे सम्बंधों में कठिनाइयाँ आती हैं; हम अपने आप को दूसरों से कटा हुआ पाते हैं; हमें अपने मनोभावों और भावनाओं को नियंत्रित रखने में दिक्कतें आती हैं ─ ये सभी सामान्य समस्याएं हैं जो हम सभी को पेश आती हैं। हमें अपने परिजनों और माता-पिता के साथ सम्बंधों में दिक्कतें पेश आती हैं; स्वजन बीमार और बूढ़े हो जाते हैं। हमें स्वयं अपनी बीमारियों और बुढ़ापे के कारण तकलीफें होती हैं। और, यदि हम युवा भी हों, तब भी हमें यह तय करने में कठिनाई होती है कि हम जीवन में क्या करें, कैसे आजीविका कमाएं, किस दिशा में आगे बढ़ें, आदि। हमें ऐसी सभी बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

भ्रम की स्थिति

बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण विचारों में से एक विचार यह है कि हम इस बात को समझें कि जिन समस्याओं से हम त्रस्त रहते हैं उन सबके पीछे कोई कारण होता है। ऐसा नहीं है कि ये समस्याएं अकारण उत्पन्न हो जाती हैं। इन समस्याओं का मूल कहीं न कहीं हमारे अपने भीतर है। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है और अधिकांश लोगों के लिए इसे स्वीकार करना आसान नहीं होता है। इसका कारण यह है कि हममें से अधिकांश लोगों की प्रवृत्ति अपनी समस्याओं का दोष दूसरे लोगों पर या बाहरी परिस्थितियों पर मढ़ने की होती है। हमें शिकायत होती है, “मैं तुम्हारे किए-धरे के कारण दुखी हूँ ─ तुमने मुझे बुलावा नहीं भेजा; तुमने मुझे तज दिया; तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं है। पूरा दोष तुम्हारा है।“ या हम अपने माता पिता को दोष देते हैं ─ जब हम बच्चे थे तब उन्होंने हमारे लिए क्या किया या क्या नहीं किया। या फिर हम आर्थिक स्थिति या राजनैतिक स्थिति या फिर सामाजिक स्थिति आदि को दोष देने लगते हैं। अब इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये सभी कारक हमारे जीवन के अनुभवों को प्रभावित करते हैं। बौद्ध धर्म इस तथ्य को नहीं नकारता है। लेकिन जो प्रमुख कारण है, हमारी समस्याओं का गहरा कारण है, वह तो हमारे अपने भीतर ही है ─ वह हमारा दृष्टिकोण है, हमारा भ्रम है।

यदि हम किसी एक ऐसे कारक का नाम लेना चाहें जो दैनिक जीवन में बौद्ध धर्म के पालन के अर्थ को परिभाषित करता है, तो मेरा उत्तर इस प्रकार होगा। जब हमारे सामने कठिनाइयाँ आती हैं तो हम अपने भीतर झाँक कर उनके मूल कारण को तलाश करते हैं, और एक बार जब हमें कारण मालूम हो जाता है तो फिर हम परिस्थिति को अपने भीतर से ही बदलने का प्रयत्न करते हैं। जब हम अपने भीतर झाँकने की और अपनी समस्या का स्रोत अपने ही भीतर तलाश करने की बात करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम यह नैतिक निष्कर्ष निकाल लें कि मैं एक बुरा व्यक्ति हूँ और मुझे स्वयं को बदलना चाहिए और अच्छा बनना चाहिए। बौद्ध धर्म नैतिक निष्कर्षों की बात नहीं करता है। हम अपनी समस्याओं का स्रोत अपने अन्दर सिर्फ इसलिए ढूँढने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि हम दुखी हैं और अपनी समस्याओं और दुखों से मुक्ति चाहते हैं, और हमारे दुखों का मुख्य स्रोत हमारे दृष्टिकोण में छिपा होता है। बुद्ध ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि हमारी समस्याओं और दुख का सबसे बड़ा कारण हमारा भ्रम है। इसलिए हमें यह पता लगाने की आवश्यकता है कि हम अपनी परिस्थितियों को लेकर किस प्रकार से भ्रमित हैं और किस प्रकार हम सही स्थिति का बोध प्राप्त करके इस भ्रम को दूर कर सकते हैं।

हमें किस बात को लेकर भ्रमित हैं? बहुत सी बातें हैं। एक तो व्यवहारजन्य कारण और कार्य को लेकर भ्रम की स्थिति है। हम सोचते हैं कि यदि हमने इस प्रकार का व्यवहार किया तो उसका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं होगा। उदाहरण के लिए, हम सोचते हैं, “मुझे देर हो सकती है, मैं तुम्हारी अनदेखी करूँगा, आदि, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।“ ऐसा सोचना गलत है; असंगत है। या हम सोचते हैं कि हम जो करेंगे या जैसा व्यवहार करेंगे उसका एक निश्चित प्रकार का प्रभाव होगा जो बेतुका है और सम्भवतः नहीं होगा। उदाहरण के लिए, “मैंने तुम्हारे साथ अच्छा बर्ताव किया और इसलिए बदले में तुम मुझसे प्रेम करोगे। मैंने तुम्हें सुन्दर उपहार खरीद कर दिया, तो फिर तुम मुझसे अब प्रेम क्यों नहीं करते हो? इस प्रकार के विचार रखते हुए हम कल्पना करते हैं कि हमारे कर्मों या व्यवहार का कोई अकल्पनीय प्रभाव होगा या हम बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना करते हैं कि हमारे कर्मों का जितना प्रभाव सम्भवतः होना चाहिए उससे कहीं बहुत अधिक प्रभाव होगा। हमारे मन में यह भी विचार आ सकता है कि कुछ बातों का एक निश्चित प्रकार का प्रभाव होगा; जबकि वास्तविकता में वे बातें उसके ठीक विपरीत प्रभाव उत्पन्न करने वाली हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, हम खुश होना चाहते हैं और इसलिए हम सोचते हैं कि खुश रहने का तरीका यह है कि हर समय शराब के नशे में धुत रहा जाए। लेकिन ऐसा करने से खुशी से ज़्यादा समस्याएं ही उत्पन्न होती हैं।

एक और भ्रम हमें इस बात को लेकर होता है कि हमारे अस्तित्व का क्या आधार है, दूसरों के अस्तित्व का क्या आधार है, और इस जगत के अस्तित्व का क्या आधार है। उदाहरण के लिए हम बीमार होने पर और बूढ़े होने को लेकर कष्ट भोगते हैं और दुखी होते हैं। लेकिन मनुष्य होने के नाते हम इससे ज़्यादा और क्या अपेक्षा कर सकते हैं? यदि युवावस्था में ही मृत्यु न हो जाए तो मनुष्य बीमार होते हैं और बूढ़े भी होते हैं ─ इसमें कोई बड़े अचरज की बात नहीं है। जब हम आइने में पहली बार अपने बाल सफेद होते हुए देखते हैं तो हम दुखी हो जाते हैं और यह देख कर हमें सदमा पहुँचता है, तो यह अयथार्थवादी नज़रिया है जिसमें इस बात को लेकर भ्रम है कि इस जगत के अस्तित्व का क्या आधार है और हमारे अपने अस्तित्व का आधार क्या है।

मान लेते हैं कि हमें बूढ़ा होना पसन्द नहीं है। लेकिन इस तथ्य के बारे में भ्रम होने के कारण ─ बुढ़ापे की वास्तविकता को स्वीकार न कर पाने के कारण हम परेशान करने वाले मनोभावों के प्रभाव में विनाशकारी ढंग से व्यवहार करना शुरू कर देते हैं। उदाहरण के लिए, युवा और आकर्षक दिखने की बाध्यता के वशीभूत होकर हम ऐसी चीज़ों को प्राप्त करने की उत्कट लालसा से प्रेरित होकर कार्य करने लगते हैं जो हमें लगता है कि हमें सुरक्षा दे सकती हैं ─ जैसे दूसरों का ध्यान खींचने और उनके प्रेम का पात्र बनने, विशेष तौर पर युवाजन का, जो हमें आकर्षक दिखाई देते हैं। इस संलक्षण के पीछे बहुधा यह भ्रामक भावना छिपी होती है कि मैं दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हूँ, इस समस्त सृष्टि का केन्द्र बिन्दु मैं ही हूँ। इसलिए सभी को अपना ध्यान मेरे ऊपर केन्द्रित करना चाहिए। मैं जैसा भी दिखाई देता होऊँ, सभी लोग मुझे आकर्षक कहें और मुझे पसन्द करें। यदि कोई हमें आकर्षक नहीं मानता है या पसन्द नहीं करता है तो हम बौखला जाते हैं। जब हम यह अपेक्षा रखते हैं कि लोग हमें आकर्षक समझें, यदि शारीरिक तौर पर नहीं, तो कम से कम किसी अन्य रूप में आकर्षक समझे, और यदि ऐसी स्थिति में लोग हमाही उपेक्षा करते हैं तो हमारी बौखलाहट और भी बढ़ जाती है। लेकिन, शाक्यमुनि बुद्ध तक को सभी लोगों ने पसन्द नहीं किया था; तो फिर हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि सभी हमें पसन्द करेंगे!

सभी के द्वारा पसन्द किए जाने की हमारी जो इच्छा है, यह एक अवास्तविक अपेक्षा है। यह अपेक्षा वास्तविकता पर आधारित नहीं है। बल्कि भ्रम, लालसा और आसक्ति की इस भावना पर आधारित है कि सभी हमें आकर्षक समझें और हमारे ऊपर ध्यान केन्द्रित करें। इसकी तह में हमारे भोलेपन की परेशान करने वाली प्रवृत्ति छिपी हुई है। हम समझने लगते हैं कि हम इतने महत्वपूर्ण और प्रेम करने योग्य हैं कि हर किसी को हमें पसन्द करना चाहिए, और ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति हमें पसन्द नहीं करता है तो ज़रूर उस व्यक्ति में ही कोई कमी होनी चाहिए। या इससे भी बदतर स्थिति तब होती है जब हम अपने ही बारे में संदेह करने लगते हैं: “अवश्य मुझमें ही कोई कमी है जिसके कारण वह व्यक्ति मुझे पसन्द नहीं करता है,” और नतीजतन हमें बुरा लगता है या हम खुद को दोषी मानने लगते हैं। यह सब भोलापन है।

तो फिर मुख्य बात यह है कि हम आत्म-सुधार करें। यही तो धर्म के अनुशीलन का मर्म है। चाहे जैसी भी स्थिति हो ─ चाहे हम मुश्किलों का सामना कर रहे हों, असुरक्षित अनुभव कर रहे हों, या जो भी हो, हमें अपने भीतर झांक कर देखना चाहिए कि हो क्या रहा है। मेरे इन मनोभावों के पीछे भ्रम किस बात को लेकर है? लेकिन जब हम किसी सम्बंध की बात करते हैं तो हमें इस बात को भी समझना चाहिए कि भ्रम अकेले हमको ही नहीं है। ज़ाहिर है कि सामने वाले व्यक्ति के मन में भी भ्रम होता है। कहने का अर्थ यह है कि हमें ऐसा नहीं कहना चाहिए, “तुम्हें अपने आप को बदलना चाहिए; मैं जो कर रहा हूँ वह सब एकदम ठीक है; तुम्हें अपना व्यवहार बदलने की ज़रूरत है।“ दूसरी ओर, हमें ऐसा भी कहने की आवश्यकता नहीं है कि मुझे ही अपने आप को बदलने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसा करने से अपनी शहादत देने जैसा बोध होने लगता है। हम सामने वाले व्यक्ति के साथ समस्या के बारे में खुलकर चर्चा करने का प्रयास करते हैं ─ हालाँकि सामने वाला व्यक्ति भी हमारे दृष्टिकोण को समझने और स्वीकार करने के लिए तैयार होना चाहिए। हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि हम दोनों ही भ्रमित हैं। हम दोनों को यह समझने में समस्या हो रही है कि हमारे बीच का सम्बंध किस दिशा में जा रहा है, इसलिए हम दोनों इस आपसी भ्रम को दूर करने के लिए प्रयास करें। समस्या को हल करने की दिशा में यह सबसे व्यावहारिक और धर्मसम्मत तरीका है।

व्यवहार में लाने से पहले धर्म को समझना

बौद्ध धर्म की साधना अनेक प्रकार से की जाती है। कोई करतब सीख लेने की तरह इन प्रक्रियाओं को करने सम्बंधी उपदेश हासिल कर लेना मात्र काफी नहीं है। कोई भी प्रक्रिया सीखने से पहले यह समझ लेना बहुत महत्वपूर्ण है कि यह प्रक्रिया समस्याओं पर विजय प्राप्त करने में हमारी किस प्रकार सहायता कर सकती है। हमें न केवल यह समझना चाहिए कि साधना कब और कैसे की जाए, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उसके पीछे की धारणा क्या है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमें उन्नत स्तर की साधनाओं से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। हमें प्रारम्भिक स्तर से शुरुआत करते हुए एक अच्छी नींव तैयार करनी चाहिए ताकि हम धर्म की शिक्षाओं के क्रमबद्ध ढंग से समझ सकें, और यह जान सकें कि कौन सी साधना किस प्रकार की जाती है।

यह बात सही है कि कभी कभी हमें ऐसी शिक्षाएं पढ़ने के लिए मिलती हैं जिनमें कहा जाता है, “जब तुम्हें कोई दवा दी जाए तो यह मत पूछो कि उसका क्या प्रभाव होगा, बस दवा खा लो!” हालाँकि यह अपने आप में एक अच्छी सलाह है लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि यह किसी प्रकार के अतिवाद से बचने के लिए चेतावनी भी है। अतिवाद से आशय है कि हम उपदेशों को परखने और उनकी आज़माइश करने में ही लगे रह जाएं, और व्यवहार में कुछ भी न उतार पाएं। लेकिन एक और प्रकार का अतिवाद है जिससे हमें बचना चाहिए। वह यह कि जब हमें किसी साधना के बारे में कोई धर्म सम्बंधी निर्देश दिया जाए तो हम बिना यह जाने कि हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं, आँख मूंद कर विश्वास करते हुए उसका अभ्यास शुरू कर दें। इस प्रकार के अतिवाद से प्रमुख समस्या यह उत्पन्न होती है कि हम कभी यह नहीं समझ पाते हैं कि हम उस साधना के ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में किस प्रकार लागू कर सकते हैं। यदि हम किसी साधना के निहितार्थ को समझ लें ─ यदि हम जान पाएं कि उसका क्या प्रभाव है और उसका प्रयोजन क्या है ─ फिर किसी अन्य व्यक्ति को हमें यह बताने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी कि हम उस अपनी दैनिक जीवनचर्या में कैसे शामिल करें। फिर हम स्वयं उसे लागू करने का गुर समझ लेंगे।

जब हम अपनी समस्याओं को दूर करने की बात करते हैं, तो हम केवल अपनी निजी समस्याओं के समाधान की बात नहीं कर रहे होते हैं, साथ ही हम दूसरों की सहायता करने में आ रही बाधाओं को दूर करने की भी बात कर रहे होते हैं। “मुझे आलस्य के कारण या स्वार्थवश या अतिव्यस्तता के कारण दूसरों की सहायता करने में मुश्किल होती है।“ या, “मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि तुम्हारी समस्या क्या है और मैं बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूँ कि मुझे तुम्हारी सहायता करने के लिए क्या करना चाहिए।“ हमारे सामने यह एक बड़ी समस्या है, है न? दूसरों की सहायता करने में पेश आने वाली ये परेशानियाँ भ्रम के कारण भी उत्पन्न होती हैं। उदाहरण के लिए हमें यह भ्रम होना कि मैं ईश्वर की भांति सर्वशक्तिमान हूँ और कुछ ऐसा कर सकता हूँ जिससे तुम्हारी सब समस्याएं हल हो जाएंगी; और यदि उससे तुम्हारी सब समस्याएं हल न हुईं तो इसका अर्थ है कि तुम्हारे अन्दर ही कोई खराबी है। तुमने यह ठीक से नहीं किया, इसलिए तुम दोषी हो। या, दोष मेरा है क्योंकि मुझे तुम्हारी समस्याओं का समाधान कर देना चाहिए था और मैं वैसा कर न सका, इसलिए मैं नाकारा हूँ। पुनः, यह कारण और कार्य के बारे में भ्रम की स्थिति है।

धर्म में दृढ़ विश्वास

एक और बात यह है कि धर्म को दैनिक जीवनचर्या में समझबूझ के साथ लागू कर पाने के लिए हमारे मन में यह दृढ़ विश्वास भी होना चाहिए कि समस्याओं से छुटकारा पाना वास्तव में सम्भव है। हमें इस बात का यकीन होना चाहिए कि इस बौद्ध पद्धति का पालन करने से हमारी भ्रम से मुक्ति सम्भव है: किसी समस्या से मुक्ति पाने के लिए हमें उन कारणों को समाप्त करना चाहिए जिनसे वह समस्या उत्पन्न होती है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इतना गहरा और दृढ़ विश्वास उत्पन्न करना बहुत कठिन है कि हमारे सारे भ्रम को इस प्रकार समाप्त कर पाना सम्भव है कि वह दुबारा उत्पन्न न हो, और यह दृढ़ विश्वास कि मुक्ति और ज्ञानोदय प्राप्त करना सम्भव है। ऐसा कर पाना तब और विशेष तौर पर कठिन होता है जब हमें यह समझ भी न हो कि मुक्ति और ज्ञानोदय का वास्तविक अर्थ क्या है। तो फिर हम किस तरह यह तय करें कि इन्हें हासिल कर पाना सम्भव है या नहीं? यदि हमें विश्वास नहीं है कि इन्हें प्राप्त कर पाना सम्भव है, तो क्या यह थोड़ा पाखण्डपूर्ण नहीं होगा कि हम किसी ऐसे लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास करें जिसका हमारे विचार से अस्तित्व ही नहीं है? ऐसी स्थिति में यह सब एक प्रकार के पागलपन का खेल बन कर रह जाता है; तब हमारा धर्म वास्तविक नहीं है।

हमें सचमुच अपने आप को यकीन दिलाना होगा, और ऐसा करने के लिए बहुत अध्ययन और ज्ञान, और साथ ही साथ गहरे विचार और चिन्तन की आवश्यकता है। हमें यकीन होना चाहिए कि मुक्ति और ज्ञानोदय प्राप्त करना न केवल सम्भव है; बल्कि यह यकीन भी करना होगा कि मैं इन्हें हासिल कर सकता हूँ। ऐसा नहीं कि इन्हें हासिल करना केवल शाक्यमुनि के लिए ही सम्भव था, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ। बल्कि यह यकीन होना चाहिए कि मैं इन्हें हासिल कर सकता हूँ, और प्रत्येक मनुष्य इन्हें हासिल कर सकता है। हमें इस बात की समझ होनी चाहिए कि हमें अपने भ्रम को दूर करने के लिए क्या करना होगा। वह क्या है जो हमें वास्तव में भ्रम से मुक्ति दिला सकता है? सही ज्ञान ही हमें भ्रम से वास्तव में छुटकारा दिलाएगा; और इसलिए हमें यह समझना होगा कि सही ज्ञान भ्रम को परास्त कर सकता है और उसे इस प्रकार से समाप्त कर सकता है कि वह दुबारा न लौट सके। इसके परिणामस्वरूप हम समझ पाते हैं कि धर्म का वास्तविक अनुशीलन हम अपने दैनिक जीवन में ही कर सकते हैं; दैनिक जीवन जो हमारी समस्याओं से जूझने, हमारे भ्रम, और कदम-कदम पर हमारे जीवन की कठिनाइयों से जुड़ा होता है।

धर्म के अनुशीलन के लिए आत्मविश्लेषण आवश्यक है

धर्म के अनुशीलन का अर्थ जीवन से कुछ समय के लिए कट जाना मात्र नहीं है, कि आप शांतिपूर्ण ध्यान साधना के लिए किसी गुफ़ा में चले जाएं, या अपने कमरे में जा कर ही आसन पर बैठ कर जीवन की वास्तविकताओं से पलायन कर जाएं। पलायन तो धर्म के अनुशीलन का केन्द्र बिन्दु नहीं है। जब हम किसी शांत स्थान में ध्यान लगाने के लिए जाते हैं तो उसका उद्देश्य उन क्षमताओं का विकास करना होता है जिनकी हमें जीवन की समस्याओं का सामना करने के लिए आवश्यकता होती है। हमारे ध्यान का केन्द्र बिन्दु तो जीवन होता है। ध्यान इस बात पर केन्द्रित नहीं होता है कि हम बैठ कर ध्यान लगाने का ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीत लें! धर्म को जीवन की स्थितियों में लागू करना ही धर्म के अनुशीलन का मर्म है।

और, धर्म के अनुशीलन की प्रकृति आत्मविश्लेषणात्मक होती है। इसकी सहायता से हम अपनी मनोदशाओं, अपनी प्रेरणाओं, और अपने व्यवहार के बाध्यकारी स्वरूपों के प्रति सचेत होने का प्रयत्न करते हैं। हमें अशांत करने वाले मनोभावों के प्रति विशेष रूप से सचेत रहने की आवश्यकता होती है। किसी अशांत करने वाले मनोभाव या दृष्टिकोण को पहचानने का लक्षण यह है कि जब वह उत्पन्न होता है तो हम और/या दूसरे असहज अनुभव करते हैं। हमारे चित्त की शांति भंग हो जाती है और हम उस पर अपना नियंत्रण खो बैठते हैं। यह परिभाषा बड़ी उपयोगी है क्योंकि इसे जानने से हमें यह पता लगाने में सहायता मिलती है कि कब हम किसी अशांत करने वाले मनोभाव के प्रभाव में व्यवहार कर रहे होते हैं। यदि हम बेचैनी अनुभव करते हैं तो हम पता लगा सकते हैं कि हमारे चित्त में कुछ अशांत करने वाली बात चल रही है। ऐसे अवसरों पर हमें जाँच करके देखना होता है कि हमारे भीतर क्या चल रहा है और उसे ठीक करने के लिए आवश्यक निवारक उपाय करने होते हैं।

इसके लिए अपने भीतर चल रहे विचारों के प्रति बहुत संवेदनशील होने की आवश्यकता होती है। और यदि हमें अपनी मनःस्थिति अशांत करने वाली लगे, तो उसे बदलने के लिए हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यदि हम अशांत करने वाले ढंग से आचरण करें तो स्वयं हमारे लिए और दूसरों के लिए भी बहुत दुख उत्पन्न होगा। और हम ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं; दुख तो हम बहुत भोग चुके हैं। यदि हम स्वयं अशांत होंगे, तो हम किसी और की क्या सहायता कर सकेंगे?

लचीलापन

धर्म के अनुशीलन के लिए स्वयं को एक-दो नहीं, अनेक विरोधी शक्तियों से भी परिचित होने की आवश्यकता होती है। कोई एक ऐसी प्रक्रिया नहीं है जो सभी स्थितियों में समान रूप से प्रभावी हो। धर्म के अनुशीलन को सच्चे अर्थ में जीवन में लागू करने के लिए बहुत लचीलेपन और विभिन्न प्रकार के तरीकों को अपनाने की आवश्यकता होती है। यदि यह तरीका कारगर न हो, तो हम वह तरीका अपनाएंगे; यदि वैसा करने से बात न बने, तो हम यह तरीका आज़माएंगे।

मेरे गुरु त्सेनझाब सरकाँग रिंपोशे कहा करते थे कि जब आप जीवन में कुछ करने का प्रयास कर रहे हों तो हमेशा दो या तीन वैकल्पिक योजनाएं तैयार रखनी चाहिए। वैसी स्थिति में यदि “क” योजना नाकाम हो जाती है, तो आप हार मान लेने के लिए विवश नहीं होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि आपके पास वैकल्पिक व्यवस्था “ख” या “ग” उपलब्ध होगी। अन्ततः उनमें से कोई योजना तो कारगर होगी। मुझे उनकी यह सलाह बहुत उपयोगी लगी। धर्म के मामले में भी यही बात लागू होती है: यदि किसी परिस्थिति विशेष में “क” विधि कारगर नहीं होती है तो आपके पास कोई दूसरी सहायक व्यवस्था उपलब्ध होती है। हम किसी और विधि को आज़मा सकते हैं। स्पष्ट है कि यह सब परिशीलन करने, विभिन्न विधियाँ और ध्यान साधनाएं सीखने से आता है जिनका अभ्यास हम अपनी तैयारी के समय करते हैं, जैसा कि कसरत के अभ्यास के दौरान करते हैं। हम स्वयं को इन विधियों का अभ्यस्त बनाने के लिए अभ्यास करते हैं ताकि हम इन्हें आवश्यकता पड़ने पर अपने दैनिक जीवन में लागू कर सकें। इसके लिए धर्म के अनुशीलन का अभ्यास किसी शौक के तौर पर नहीं करना चाहिए, बल्कि पूर्णकालिक प्रतिबद्धता के रूप में करना चाहिए।

अतिवादों से बचना

हम धर्म के व्यवहार को अपने परिवार में लागू करते हैं। अपने माता-पिता, अपने बच्चों, और अपने सहकर्मियों के साथ अपने व्यवहार में लागू करते हैं। ऐसा करते समय हमें विभिन्न प्रकार के अतिवादों से बचना चाहिए। पहले भी हम इसके बारे में थोड़ा उल्लेख कर चुके हैं। हमें अपनी समस्याओं का दोष दूसरों पर मढ़ने या पूरी तरह अपने ऊपर ले लेने से बचना चाहिए ─ दोनों ही पक्ष ज़िम्मेदार होते हैं। हम कोशिश करके दूसरों को बदल तो सकते हैं, लेकिन अपने आप को बदलना सबसे आसान होता है।

इसलिए आत्मसुधार पर हमारा ध्यान केन्द्रित होना चाहिए; लेकिन ऐसा करते समय हमें आत्ममुग्ध होने की अतिवादी स्थिति तक नहीं पहुँचना चाहिए। आत्मलीनता की स्थिति में केवल अपने ही बारे में सोचते हैं और किसी दूसरे के बारे में विचार नहीं करते। इससे हमारी यह भावना प्रबल होती है कि हम इस जगत के केन्द्र बिन्दु हैं और दुनिया में हमारी अपनी समस्याएं ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। न दूसरों की समस्याएं महत्वपूर्ण हैं, और न ही दूसरों को ठेस पहुँचती है।

अतिवाद का एक और उदाहरण यह सोच है कि हम सभी बुरे हैं या हम सभी अच्छे हैं। यह बात सच है कि हमें अपने व्यक्तित्व के जटिल पहलुओं, जहाँ हमें सुधार करने की आवश्यकता है, की पहचान करनी चाहिए। लेकिन हमें अपने सकारात्मक पहलुओं, सकारात्मक पक्षों को भी पहचानना चाहिए, ताकि हम उन्हें और विकसित कर सकें। हममें से बहुत से पाश्चात्य लोगों में आत्म सम्मान का भाव कम होता है। यदि हम अपनी समस्याओं और उलझनों पर बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित करें तो आत्म सम्मान कम हो सकता है। ऐसा करने का तो हमारा आशय ही नहीं है।

हमारे अन्दर के अशांत करने वाले मनोभावों पर ध्यान केन्द्रित करने के साथ ही साथ हमें अपने सद्गुणों को ध्यान करके प्रतिसंतुलन कायम करना चाहिए। यहाँ तक कि क्रूरतम मनुष्यों में भी कुछ अच्छे गुणों की अनुभूतियाँ होती हैं। निःसंदेह उन्होंने भी किसी कुत्ते या बिल्ली के छोटे बच्चे को अपनी गोद में उठाकर उसे दुलराया होगा, और उसके प्रति अपने भीतर कुछ प्रेम का भाव अनुभव किया होगा। तकरीबन सभी ने इस बात का अनुभव करके देखा होगा। इस तरह हमें पता चलता है कि हम भी दूसरों को थोड़ा स्नेह दे सकते हैं, और इस तरह हम अपने सकारात्मक पक्ष को भी देख पाते हैं। धर्म के आचरण का उद्देश्य सिर्फ हमारे नकारात्मक पहलुओं को ठीक करना ही नहीं है; बल्कि हमारा प्रयास संतुलित होना चाहिए। हमें अपने सकारात्मक पहलुओं को भी मज़बूत बनाने के लिए मेहनत करनी चाहिए।

ऐसा करने की कोशिश में, अपनी खामियों और अच्छाइयों पर ध्यान केन्द्रित करने में संतुलन कायम करने की प्रक्रिया में हमें एक और प्रकार की अतिवाद से बचना चाहिए। यह अपराध बोध भी अतिवाद है कि, “मैं बुरा हूँ। मुझे अभ्यास करना चाहिए, और चूँकि मैं अभ्यास नहीं कर रहा हूँ, इसलिए मैं और भी बुरा हूँ।“ हमें धर्म के अभ्यास के प्रति अपने दृष्टिकोण से चाहिए शब्द हटा देना चाहिए। यह कभी भी “चाहिए” का प्रसंग नहीं होता है। यदि हम अपनी समस्याओं से मुक्त होना चाहते हैं और भविष्य की समस्याओं से बचना चाहते हैं तो सबसे गुणकारी दृष्टिकोण यह है कि हम सोचें, “यदि मैं अपनी समस्या से मुक्ति चाहता हूँ तो यह अभ्यास मुझे मुक्ति दिलाएगा।“ अब, हम उस अभ्यास को करें या न करें यह हमारी अपनी इच्छा की बात है। कोई आपसे नहीं कह रहा है, “आपको ऐसा करना चाहिए और यदि आप वैसा नहीं करते हैं, तो आप बुरे हैं।“

लेकिन हमें एक और अतिवाद से बचने की आवश्यकता है, जो यह है कि “हम सब परिपूर्ण और दोषरहित हैं; सिर्फ़ अपने बुद्ध स्वरूप को देखो और बाकी सब एकदम ठीक है।“ यह एक बहुत ही नुकसानदेह प्रकार का अतिवाद है क्योंकि इससे हमारा रवैया यह बन सकता है कि हमें अपने आप को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है; हमें किसी सीमा पर रुकने या अपने किसी भी नकारात्मक तौर-तरीके को बदलने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम तो पहले से ही दोषरहित हैं। हमें अपने आप को बुरा समझने या अपने आप को परिपूर्ण समझने की इन दोनों अतिवादों से बचना चाहिए। दरअसल हमें अपने किए की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने की आवश्यकता होती है। धर्म को अपने दैनिक जीवन में समाहित करने का यही मुख्य सूत्र है। अपने जीवन की स्थिति को सुधारने के लिए हम अपनी ज़िम्मेदारी को स्वीकार करते हैं।

प्रेरणा

आत्मसुधार के लिए प्रयास करते समय हम आध्यात्मिक गुरुओं से प्रेरणा ग्रहण करने के अलावा अपने साथ अभ्यास करने वाले अन्य लोगों से भी प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं। लेकिन अधिकांश लोगों के लिए हवा में उड़ने के करतब दिखा सकने वाले कई शताब्दियों पहले के महान आचार्यों की कथाएं स्थायी प्रेरणा का स्रोत नहीं हो सकती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस तरह की बातों से अपने आप को जोड़ कर देखना कठिन होता है और इस तरह की बातें हमें एक तरह के जादुई सफ़र पर ले जाती हैं। वर्तमान उदाहरण सबसे अच्छे होते हैं क्योंकि उनके साथ हमारा किसी तरह का सम्पर्क होता है, चाहे वह सम्पर्क कितना ही कम क्यों न हो।

बुद्धजन या सच्चे अर्थ में योग्य शिक्षक हमें प्रभावित करने का प्रयास नहीं करते हैं, और न ही वे हमें प्रेरित करने का प्रयास करते हैं। वे तो सूर्य के समान होते हैं। सूर्य लोगों को ऊष्मा देने का प्रयास नहीं करता है; सूर्य की तो प्रकृति ही ऐसी है कि लोगों को सहज ही ऊष्मा प्राप्त होती है। महान आध्यात्मिक शिक्षकों के बारे में भी यही बात लागू होती है। उनका जीवन चरित्र और उनका व्यवहार स्वतः और सहज ढंग से लोगों को प्रेरित करता है। इसके लिए वे कोई जादुई करतब नहीं दिखाते हैं। जो सबसे अधिक प्रेरणादायी होता है वह अधिक यथार्थवादी और व्यावहारिक होता है।

मुझे दुदजोम रिंपोशे का स्मरण हो रहा है। उनका निधन हुए कई वर्ष बीत चुके हैं। वे निंग्मा परम्परा के मुखिया थे और मेरे शिक्षकों में से एक थे। उन्हें भयंकर दमा की बीमारी थी। मुझे भी दमा रोग है और इसलिए मुझे मालूम है कि इसमें श्वास लेने में कितनी कठिनाई होती है। मैं जानता हूँ कि जब आपको सामान्य ढंग से श्वास लेने में ही कठिनाई हो तो उपदेश देना कितना कठिन हो सकता है, क्योंकि आपकी पूरी ऊर्जा पर्याप्त श्वास अन्दर खींचने में लगी होती है। ऐसी स्थिति में आपकी ऊर्जा का बाहर निकलना बड़ा कठिन होता है। फिर भी, मैं देखते था कि दुदजोम रिंपोशे भयंकर दमा रोग होते हुए भी मंच पर जाते थे और उपदेश देते थे। वे दमा से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होते थे और अविश्वसनीय ढंग से रोग से लड़ते हुए अद्भुत उपदेश देते थे। और यह देखना अविश्वसनीय ढंग से प्रेरणादायी होता था, बहुत ही यथार्थ, जिसमें कोई जादुई करतब नहीं होता था। यही जीवन की वास्तविक स्थितियों का व्यवहार है और इसी से प्रेरणा मिलती है।

जैसे जैसे हम अध्यात्म के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं और प्रगति करते हैं, हम अपने आप से भी प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं। यह भी प्रेरणा ग्रहण करने का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता है। हम अपनी प्रगति से ही प्रेरणा ग्रहण करते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए हमें बहुत निपुण होने की आवश्यकता होती है। अधिकांश लोग भावनात्मक स्तर पर इस स्थिति को सम्भाल नहीं सकते हैं, क्योंकि जब हम कुछ प्रगति करते हैं तो हमारे अन्दर अहंकार और घमंड की प्रवृत्ति जन्म ले लेती है। इसलिए, हमें प्रगति की परिभाषा बहुत सावधानी से तय करनी होगी।

मार्ग पर प्रगति

सबसे पहले तो हमें समझना होगा कि प्रगति कभी रैखिक नहीं होती है; उसमें उतार चढ़ाव चलता रहता है। यही संसार की मुख्य विशेषताओं में से एक है, और यह बात सिर्फ़ उच्च या निम्न पुनर्जन्मों के बारे में नहीं है। उतार चढ़ाव हमारे दैनिक जीवन में भी चलता रहता है। कभी मैं खुशी अनुभव करता हूँ; कभी में दुखी होता हूँ। हमारी चित्तवृत्ति में उतार चढ़ाव होता है। कभी मेरी अभ्यास करने की इच्छा होती है, कभी इच्छा नहीं होती है ─ इसमें भी हर समय उतार चढ़ाव होता है, इसलिए चकित न हों। दरअसल यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक हम अर्हत, एक मुक्त जीवात्मा, जो संसार से मुक्त हो, नहीं बन जाते। उस स्तर तक पहुँचने तक, जो कि एक अविश्वसनीय रूप से उन्नत स्तर है, संसार का उतार-चढ़ाव का क्रम चलता रहेगा। इसलिए बहुत लम्बे समय तक अभ्यास करने के बाद हम किसी व्यक्तिगत रूमानी सम्बंध में कठिनाई में पड़ जाएं तो हमें निराश नहीं होना चाहिए। अचानक हम भावनात्मक रूप से परेशान हो जाते हैं ─ ऐसा होता है! इसका यह अर्थ नहीं है कि हम बुरे साधक हैं। हमारी सांसारिक स्थिति की वास्तविकता को देखते हुए यह तो स्वाभाविक है।

धर्म की साधना में सामान्यतया चमत्कार नहीं होते हैं। यदि हम धर्म के आचरण को अपने दैनिक जीवन में लागू करना चाहते हैं तो हमें चमत्कार की आशा नहीं करनी चाहिए, विशेष तौर पर अपनी प्रगति के मामले में तो नहीं। हम प्रगति को यथार्थपरक ढंग से कैसे माप सकते हैं? परम पावन दलाई लामा कहते हैं कि धर्म की साधना को एक या दो वर्ष की अवधि के पैमाने पर मत देखिए। पाँच या दस वर्ष की साधना के बाद जाँच कीजिए, “क्या मैं जैसा पाँच या दस वर्ष पहले था उसकी तुलना में अधिक शांत व्यक्ति बन पाया हूँ? क्या मैं परेशान या विचलित हुए बिना कठिन स्थितियों को सम्भालने में सक्षम बन पाया हूँ?” यदि ऐसा है, तो हमने कुछ प्रगति की है, और यह बात हमारे लिए प्रेरणादायी है। हमारी समस्याएं तो अभी भी बरकरार हैं, लेकिन इससे आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। कठिन स्थितियों में जब चीज़ें प्रतिकूल हों तो हम इतना अधिक विचलित नहीं होते हैं। हम अपने आप को जल्दी सम्भाल लेते हैं।

जब हम अपने आप को प्रेरणा के स्रोत के रूप में देखते हैं, तो मुख्य बिन्दु यह होता है कि इससे हमें अपने मार्ग पर आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है। ऐसा इसलिए सम्भव हो पाता है क्योंकि हमें यह विश्वास होता है कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं। और हमें अपने सही दिशा में बढ़ने का विश्वास तभी होता है जब हमें इस बात का यथार्थपरक अनुमान हो कि उस दिशा में बढ़ने का अर्थ क्या है ─ वह यह है कि उस सामान्य दिशा में बढ़ते हुए हमारे सामने उतार-चढ़ाव के दौर निरंतर आते रहेंगे।

ये कुछ सामान्य विचार हैं जो बताते हैं कि हम धर्म के आचरण को अपने दैनिक जीवन में कैसे समाहित कर सकते हैं। आशा करता हूँ कि ये आपके लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। धन्यवाद।