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डॉ. अलेक्ज़ेंडर बर्ज़िन के बौद्ध लेखों का संग्रह

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धार्मिक सौहार्द के आधार के रूप में आपसी समझ और तालमेल

परम पावन चौदहवें दलाई लामा
क्लागनफर्त, ऑस्ट्रिया, 18 मई 2012
अलेक्ज़ेंर बर्ज़िन द्वारा प्रतिलिखित और अल्पतः सम्पादित

मुझे अधिकांशतः गैर-बौद्ध देशों से आए हुए लोगों के बीच बौद्ध दर्शन के विषय पर व्याख्यान देते हुए बहुत खुशी है। आपसी तालमेल और समझ को बढ़ाने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। आपसी तालमेल इसलिए आवश्यक है क्योंकि हम सभी इसी ग्रह के वासी हैं और इस ग्रह पर बहुत से धर्म प्रचलन में हैं। अब इनमें से बहुत सी परम्पराओं के बारे में जानकारी उपलब्ध है। पहले कभी जब लोग ज़्यादा अलग-थलग रहा करते थे, उस समय केवल किसी एक सत्य या किसी एक धर्म की अवधारणा को मानना काफ़ी था, और यही ठीक समझा जाता था। यह अवधारणा उस समय के अनुकूल थी। लेकिन अब, आज के युग में हमारे जीवन जीने के ढंग में ही यह बात अन्तर्निहित है कि हमें आपसी मेल-जोल की आवश्यकता है, और हम परस्पर मेल-जोल करते हैं। ऐसे युग में कभी-कभी किसी एक धर्म और एक सत्य में विश्वास रखना किसी व्यक्ति के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है; उस एक व्यक्ति के लिए एक विचारधारा विकसित करना बहुत उपयोगी होता है। लेकिन एक व्यपाक समाज की दृष्टि से हमें एकाधिक सत्यों की अवधारणा को विकसित करना होगा। यही वास्तविकता है। सदियों से बहुत से सत्यों की समझ विकसित होती आई है और अनेक धर्मों का विकास हुआ है। इसलिए, विभिन्न धर्मों और अलग-अलग सत्यों की अवधारणा को विकसित करने के लिए दूसरी धार्मिक परम्पराओं के विषय में जानना उपयोगी रहेगा।

जहाँ तक मेरी अपनी बात है, तिब्बत में मुसलमान, तिब्बती मुसलमान कई शताब्दियों से रहते आए हैं, और इसलिए हमें इस्लाम धर्म के अस्तित्व के बारे में जानकारी थी, लेकिन उनके विश्वासों के बारे में कोई बहुत गम्भीर चर्चा नहीं होती थी। हम मान लेते थे कि हमारी बौद्ध परम्परा ही सबसे अच्छी है। लेकिन भारत आ कर हमारा परिचय बहुत से धर्मों, बहुत तरह के लोगों के साथ हुआ, और इस प्रकार विभिन्न धर्मों के बारे में हमने गम्भीर चर्चाएं प्रारम्भ कीं। मुझे ईसाई धर्म और इस्लाम और हिन्दू धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म, पारसी धर्म, और सूफी मत आदि के विभेदों की जानकारी मिली, और इसलिए अब इन विभिन्न धर्मों लोगों के साथ और अधिक सम्पर्क सम्भव हो सका है। विभिन्न धर्मों के बारे में सीखने से उनके प्रति सम्मान का भाव विकसित करने में बड़ी मदद मिलती है। धार्मिक सौहार्द को बढ़ाने का यही आधार है। यही कारण है कि जब लोग मुझसे बौद्ध धर्म की बुनियादी शिक्षाओं के बारे में पूछते हैं, उस समय मेरा मंतव्य उनका धर्मांतरण करना नही होता, बल्कि उन्हें जानकारी देना होता है।

कुछ तिब्बती बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ ईसाई मठों में कई सप्ताह बिता चुके हैं जहाँ उन्होंने ईसाई परम्परा के महत्व के बारे में जानकारी हासिल की। मैं उनसे कहता हूँ कि हम बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों को समाज सेवा और शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जैसा कि ईसाई मठवासी करते हैं। इन ईसाई भाइयों और बहनों ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में बड़ा योगदान किया है, और इसी प्रकार हमें भी मानवता की सेवा करनी चाहिए। लेकिन दूसरी ओर कभी-कभी धर्म प्रचारकों के कार्य के कारण समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं। हम दूसरी परम्पराओं से बहुत कुछ सीख सकते हैं, और अलग अलग धर्मों से आने वाले आप लोग हम से बहुत सी चीज़ें सीख सकते हैं।

बौद्ध धर्म प्राचीन भारतीय धर्मों में से एक है। तीन हज़ार वर्षों से भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा विकसित होती आई है। इस धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का असम्मान करना नहीं है, बल्कि गैर-आस्तिकों सहित सभी धर्मों का सम्मान करना है। प्राचीन काल के शून्यवादी और चार्वाक के अनुयायी भविष्य के जन्मों के बारे में विश्वास नहीं करते थे; किसी प्रकार की आध्यात्मिकता में उनका विश्वास नहीं था; लेकिन धर्मनिरपेक्षता का अर्थ इन गैर-आस्तिकों का भी सम्मान करना है। बौद्ध धर्म इस प्रकार के वातावरण में विकसित हुआ, और इसलिए बौद्ध धर्म भी विविध विचारों वाले विभिन्न प्रकार के लोगों का सम्मान करता है। यही कारण है कि बुद्ध ने अलग-अलग दार्शनिक विचारों की शिक्षा दी, क्योंकि उनके अपने शिष्यों में विभिन्न प्रकार की मनोवृत्तियों वाले लोग शामिल थे। कुछ विचार और दार्शनिक मत परस्पर विरोधी प्रतीत हो सकते हैं क्योंकि उनके शिष्यों की मनोवृत्तियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की थीं, इसलिए किसी एक प्रकार का दार्शनिक मत उनके सभी शिष्यों के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होता। इसका अर्थ यह हुआ कि बुद्ध अपने शिष्यों के अलग-अलग दृष्टिकोणों का सम्मान करते थे और उन्हें उनकी मनोवृत्तियों के अनुकूल ढंग से शिक्षा देते थे। गैर आस्तिकों को भी अपने भाई-बहनों के समान इन्सान मानकर उनका सम्मान करने और उन्हें स्वीकार करने का यह स्पष्ट लक्षण है। इस प्रकार हमारे चित्त के विषय में, गैर आस्तिकों के लिए हमारे मनोभावों के विषय में कुछ बौद्ध धर्म का थोड़ा बहुत ज्ञान भी अशांत करने वाले मनोभावों को नियंत्रित करने के लिए उपयोगी हो सकता है। यही कारण है कि दूसरे धर्मों के अनुयायियों और गैर आस्तिकों के श्रोतावर्ग के बीच यहाँ बौद्ध धर्म के बारे में व्याख्यान देते हुए मुझे खुशी है।

हम मनुष्यों ने इस ग्रह पर अपने जीवन की शुरुआत की और अन्ततः हमारी बुद्धि इतनी विकसित हो गई कि हम जीवन की असहाय करने वाली मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर सकें। अब हमें कुछ विचार, कुछ अवधारणाएं विकसित करनी थीं जो लोगों को अपनी आशा को बनाए रखने में मदद कर सकतीं. और इस प्रकार धार्मिक विश्वास का जन्म हुआ: विश्वास कि मुश्किल परिस्थितियों में भी कुछ उम्मीद कायम है।

पिछले पाँच हज़ार वर्षों में लोगों ने अलग-अलग जगहों में अलग अलग किस्म के धर्म विकसित किए। हमारी आशा को बनाए रखने के लिए धर्म बहुत उपयोगी होता है; और फिर धर्म तर्कों के साथ मिलकर धीरे-धीरे कुछ दार्शनिक विचारों के रूप में विकसित हो गया जो उस विश्वास को बल प्रदान करते हैं। फिर इसी आधार पर विभिन्न दार्शनिक मतों वाले अलग अलग धर्मों की उत्पत्ति हुई। इसी परम्परा से हमें विश्व की प्रमुख धर्म व्यवस्थाएं मिलीं।

पिछले कुछ हज़ार वर्षों तक हमने अपनी पूरी आशा को धार्मिक विश्वास पर टिकाए रखा, लेकिन पिछले तीन सौ वर्षों की अवधि में एक बार फिर हमारी मानवीय बौद्धिक क्षमता ने वास्तविकता का और अधिक बुनियादी अन्वेषण करने के तरीके ईजाद कर लिए। इस प्रकार आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ और उस विज्ञान में से आधुनिक प्रौद्योगिकी का भी विकास हुआ। प्रौद्योगिकी हमारी इच्छाओं को हाथों-हाथ पूरा कर सकती है, इसी कारण मानवता का झुकाव भौतिकता की ओर हो गया। इसी भौतिकतावादी प्रवृत्ति के कारण ईश्वर के प्रति लोगों के भक्तिभाव में कमी आई, धर्म के प्रति आस्था घटी।

आजकल हम देखते हैं कि जो लोग ईसा मसीह को मानते है या किसी अन्य देवी-देवता के मानते हैं, यहाँ तक कि जो लोग बुद्ध को मानते हैं, वे स्वयं को आस्तिक कहते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उन्हें इस बात की कोई विशेष परवाह नहीं होती कि उनका अपना धर्म उन्हें क्या शिक्षा देता है। वे ज़्यादा से ज़्यादा धन-सम्पत्ति और सत्ता हासिल करने के लिए सांसारिक तौर-तरीके अपनाते हैं, और इसलिए वे झूठ का सहारा लेते हैं, दूसरों पर धौंस जमाते हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग अपने धर्म के प्रति बहुत गम्भीर नहीं हैं। ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती दिखाई देती है। और इसलिए, मैं ऐसे लोगों को जो इस रीति से धर्म के पालक होने का दावा करते हैं, गैर-आस्तिक मानता हूँ।

सच्चा आस्तिक वह है जो दिन के चौबीस घंटे प्रेम और करुणा का भाव रखता है। जहाँ तक अपने आप से प्रेम करने का सम्बंध है, यह भाव तो पशुओं में भी होता है। लेकिन सच्चा प्रेम तो वह है जिसमें दूसरों के क्षेम की भावना निहित हो। जब यह भाव हमारी सोच का आधार होता है तो झूठ बोलने, धोखा देने या दूसरों पर धौंस जमाने की गुंजाइश नहीं रह जाती है। फिर हम अपनी मनमानी करने के लिए अनुचित तरीकों का प्रयोग कैसे कर सकते हैं? ऐसा करने वालों को मैं गैर-आस्तिक मानता हूँ, या सच्चे अर्थों में आस्तिक नहीं मानता हूँ। कुछ लोग खुलकर धर्म की आलोचना तक करते हैं क्योंकि इतने सारे तथाकथित आस्तिक लोग वास्तविक अर्थ में धर्म की शिक्षाओं का पालन नहीं करते हैं। इसलिए, चाहे हम आस्तिक हों या गैर-आस्तिक, हमें अधिक वैज्ञानिक रीति से आन्तरिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करने चाहिए।

और ऐसा कर पाना सम्भव है। दो कारणों से ऐसा संकेत मिलता है। पहला तो यह कि ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें आराम का जीवन जीने के लिए हर सुविधा हासिल है, लेकिन मानव के रूप में, वे लोग अपने अंतःकरण में एक प्रकार का खालीपन अनुभव करते हैं। उनके मन में चिन्ता, भय और तनाव होता है, और इसलिए वे लोग दुखी रहते हैं, अपने आप को बहुत अकेला अनुभव करते हैं। अन्ततः ये लोग भौतिक मूल्यों की सीमाओं को पहचानने लगते हैं। उन्हें यह बात समझ में आती है कि केवल इतने मात्र से उन्हें मन की शक्ति, या चित्त का आनन्द, शांति प्राप्त नहीं हो सकती है।

दूसरी बात यह है कि पिछली दो-तीन शताब्दियों में विज्ञान ने बहुत प्रगति की है। वैज्ञानिक शोध सत्य की तलाश कर रहा है। वैज्ञानिक सत्य का परीक्षण कर रहे हैं। सच्चे वैज्ञानिक खुले मन से अन्वेषण करते हैं। वे संशयवादी होते हैं, वे जाँच करते हैं। बौद्ध धर्म भी संशयवाद पर बल देता है; संशय प्रश्न पूछने की प्रेरणा देता है और यह प्रेरणा अन्वेषण और उत्तर तलाश करने की प्रक्रिया को जन्म देती है। इसलिए संशयवाद उपयोगी है, बशर्तें कि वह निष्पक्ष हो। अतः वैज्ञानिक शोध वास्तविकता का अन्वेषण करता है।

इसके बाद बीसवीं शताब्दी के उत्तररार्ध में आधुनिक विज्ञान ने मस्तिष्क, कणों, पदार्थ जैसे विषयों पर और अधिक शोध करना शुरू किया, और मस्तिष्क विज्ञानी विशेष तौर पर इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि मनोभाव हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। हमारे मनोभावों और इस बात के बीच में बहुत गहरा सम्बंध है कि हमारा मस्तिष्क किस प्रकार काम करता है और हमारा शरीर किस प्रकार प्रतिक्रिया करता है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार जब हमारे मन में भय का भाव उत्पन्न होता है तो रक्त का संचार हमारे पैरों की ओर अधिक तेज़ी से होता है, जो हमें भाग जाने के लिए तैयार करता है। जब हमें क्रोध आता है तो रक्त संचार हाथों की ओर अधिक होता है, जिसके कारण हम लड़ने और अपनी रक्षा करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार मनोगत और जैविक कारक बहुत अन्योन्याश्रित होते हैं। कभी दैहिक पक्ष मनोगत प्रभाव उत्पन्न करता है तो कभी मनोभाव दैहिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इसी वजह से आजकल मस्तिष्क विशेषज्ञ मनोभावों और उनकी उत्पत्ति के कारणों के अध्ययन में अधिक रुचि ले रहे हैं।

मनोभाव चित्त का भाग होता है। कुछ वैज्ञानिक इस सम्बंध में प्रयोग कर रहे हैं: ये वैज्ञानिक लोगों को, यहाँ तक कि बच्चों को सचेतनता और करुणा के बारे में प्रशिक्षण देते हैं। यह प्रशिक्षण देने से पहले वैज्ञानिक रक्तचाप और तनाव उत्पन्न करने वाले हार्मोन के स्तर की जाँच करते हैं, और फिर तीन या चार सप्ताह बाद एक बार फिर यही जाँच की जाती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन अभ्यासों को करने से रक्तचाप ओर तनाव में कमी आई। छात्र भी यह महसूस करते हैं कि उनकी एकाग्रता बढ़ी है और उनके सामाजिक सम्बंधों में अधिक स्थिरता और अनुकूलता आई है। इसलिए कुछ विश्वविद्यालय, विशेष तौर पर अमेरिका में, और भारत में भी, इस सम्बंध में कुछ प्रायोगिक परियोजनाएं चला रहे हैं। इस प्रकार, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर और इक्कीसवीं शताब्दी के शुरुआत की अवधि में विज्ञान के क्षेत्र में मनोभावों और चित्त के विषयों पर अधिक शोध किया गया है।

कई हज़ार वर्ष की धार्मिक परम्परा ने भी अनेकानेक तरीकों से चित्त के बारे में विचार किया है। सभी धार्मिक परम्पराएं प्रेम, क्षमा, करुणा, और आत्म-विकास का संदेश देते है; ये सभी विषय चित्त से जुड़े हैं। धर्म का सम्बंध भी चित्त से है। अडिग धर्मनिष्ठा से आन्तरिक शक्ति और एक प्रकार के आनन्द की प्राप्ति होती है। प्रमुख धर्मों की दो श्रेणियाँ हैं। एक तो वे हैं जो एक सिरजनहार ईश्वर, एक परम और नित्य ईश्वर को मानते हैं; यह उदाहरण यहूदी, ईसाई, इस्लाम धर्म में देखा जा सकता है और बहुत से हिन्दू भी इस मत को मानते हैं। दूसरी प्रकार के जैन, बौद्ध और सांख्यों के एक समूह वाले ऐसे धर्म हैं सृजनकर्ता ईश्वर को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए इन धर्मों में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा नहीं है; जो होता है वह अपने ही कारण या परिस्थितिवश होता है। भारत के ये तीन धर्म डार्विनवाद की ही भांति कार्य-कारण के सिद्धान्त को मानते हैं: सब कुछ कारण और कार्य के अनुसार, और किसी सृष्टिकर्ता से स्वतंत्र रूप में घटित होता है।

ईश्वरवादी धर्म मानते हैं कि ईश्वर ने समस्त सृष्टि की रचना की, विशेषतः हमारी रचना की, इसलिए वही हमारा पिता है। वे अडिग विश्वास के साथ सृष्टिकर्ता के समक्ष स्वयं को समर्पित करते हैं। इससे आत्म-केन्द्रित अहंकार नियंत्रित होता है। “मैं ईश्वर की रचना हूँ, इसलिए मैं ईश्वर की सेवा में समर्पित हूँ।“ प्रार्थना ईश्वर की सेवा का ही भाग है, लेकिन ईश्वर की सेवा करने का मुख्य सिद्धान्त सभी साथी जीवों के प्रति प्रेम का भाव रखना है। इसलिए स्वार्थपरायणता को नियंत्रित करने और परोपकार की भावना को विकसित करने में ईश्वरवादी धर्मों का प्रभाव कमोबेश एक जैसा ही है।

बौद्ध धर्म और जैन धर्म भी आत्मकेन्द्रित होने की प्रवृत्ति और अहंकार को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं। बौद्ध किसी स्वतंत्र, मूर्त, अस्तित्ववान अहम् को न मानने पर बल देता है; “मैं” या “अहम्” तो बस एक नामोद्दिष्ट गुण है। यह आत्म-केन्द्रित होने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने की एक विधि है। इस प्रकार की विभिन्न विधियाँ हैं, किन्तु उन सभी का प्रभाव एक ही है: आत्म-केन्द्रित होने की प्रवृत्ति को कम करना और परोपकार के भाव को विकसित करना।

यदि हम प्राचीन भारतीय बौद्ध परम्परा, विशेषतः नालन्दा परम्परा को देखें तो हम पाएंगे कि उनके ग्रंथों में हमेशा विभिन्न दार्शनिक मतों का उल्लेख किया जाता रहा है। बाद के तिब्बती ग्रंथों में यह मान कर चला गया है कि उन्हें पढ़ने वाले अधिकांश लोग बौद्ध होंगे, इसलिए मुझे लगता है कि हमें एक बार फिर भारतीय परम्परा की ओर लौटना होगा। वहाँ अनेकानेक परम्पराएं थीं और इसलिए वे लोग विभिन्न विचारों का विश्लेषण किया करते थे और कभी-कभी अपने-अपने मतों के बारे में शास्त्रार्थ भी करते थे। लेकिन चूँकि तिब्बत में आठवीं या नौवीं शताब्दी के समय से अधिकांश तिब्बती बौद्ध बन चुके थे, इसलिए इन विभिन्न दार्शनिक मतों की चर्चा करना बहुत प्रासंगिक नहीं समझा गया था। लेकिन अब, तिब्बत के बाहर कितने ही धर्म और मत हैं, इसलिए हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम उन्हें जानें ताकि सही जानकारी के साथ हम आपसी समझ विकसित कर सकें, और आपसी समझ के आधार पर हम एक-दूसरे के लिए सम्मान का भाव और धार्मिक सौहार्द विकसित कर सकें।